यूपी सरकार काम तो कर रही, लेकिन सुधार की गुंजाइश भी : राज्यपाल राम नाईक

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राज्यपाल राम नाईक ने विशेष बातचीत में यूं तो अखिलेश सरकार के कामकाज से सुंतिष्ट जताई, लेकिन कानून-व्यवस्था और गवर्नेंस के मोर्चे पर सुधार की जरूरत भी बताई। उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत में बेबाकी से अपनी राय रखी…

सवाल : अपने दो वर्ष के कार्यकाल का मूल्यांकन किस तरह करना चाहेंगे?
नाईक :
 यह काम तो प्रदेश के लोगों व मीडिया को करना चाहिए। मैं खुद अपना मूल्यांकन करता रहता हूं। 37 साल से हर वर्ष अपना रिपोर्ट कार्ड जारी करता हूं कि क्या किया और कैसा किया? मेरा मानना है कि सभी को अपने काम का खुद मूल्यांकन करके बताना चाहिए। यह जवाबदेही और पारदर्शिता का तरीका है। 22 जुलाई को दो साल पूरा हो रहा है। उसी दिन अपना रिपोर्ट कार्ड रखने का इरादा था, लेकिन प्रधानमंत्री के दौरे के कारण एक दिन पहले 21 जुलाई को अपने दो साल के कामकाज का लेखा-जोखा जारी करूंगा। फिर चाहूंगा कि लोग इस पर अपनी राय दें। दो साल काफी अच्छे रहे और तमाम तरह का अनुभव भी मिला।

सवाल : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत कुछ मुख्यमंत्रियों ने गवर्नर का पद खत्म करने की मांग उठाई है। आपकी क्या राय है?
नाईक :
 यह पॉलिटिकल विषय बन गया है। इस पर किसी तरह की राय व्यक्त करना उचित नहीं मानता हूं। हां, अस्वस्थ होने की वजह से प्रधानमंत्री द्वारा दिल्ली में बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शामिल नहीं हो सके। मेरा मानना है कि मुझसे उन्हें कोई शिकायत नहीं है। मेरे और उनके बीच स्नेहपूर्ण संबंध हैं।

उत्तराखंड व अरुणाचल में राज्यपालों की भूमिका पर दिया सवाल

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सवाल : उत्तराखंड और अरुणाचल में राज्यपालों के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद गवर्नर की भूमिका पर सवाल उठे हैं। आपका क्या कहना है?
नाईक:
 उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश का मामला राजनीतिक है। यह राष्ट्रपति और वहां के गवर्नर से जुड़ा मामला है। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया है। इस पर काफी चर्चा हुई और पढ़ा भी है। इतना ही कह सकता हूं कि यह मेरे लिए मार्गदर्शक है। इसका निचोड़ यही निकलता है कि राज्यपाल को क्या करना चाहिए क्या नहीं। इसी के अनुसार व्यवहार करूंगा। दोनों ही प्रदेशों में यह स्थिति राजनीतिक दलों की वजह से निर्मित हुई थी। यूपी में ऐसी स्थिति नहीं है। यहां स्थिर सरकार है। यहां ऐसी कोई स्थिति नजर भी नहीं आती है।

सवाल : राज्यपालों पर अति सक्रियता व राजनीतिक प्रतिबद्धता के आरोप लग रहे हैं। आपके  ऊपर भी ऐसे आरोप लगाए जाते हैं?
नाईक :
 मैं इस तरह के आरोप का कोई जवाब देना नहीं चाहता। रही सक्रियता की बात, तो संविधान और राष्ट्रपति ने जो दायित्व दिया है उसका ही निर्वहन कर रहा हूं। थोड़ा यह भी महसूस करता हूं कि यूपी में अभी तक मुझसे पहले जो दो-तीन राज्यपाल हुए हैं, वे ब्यूरोक्रेट थे। मै जनता से जुड़ा सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता रहा हूं। उनके और मेरे दृष्टिकोण में फर्क स्वाभाविक है।

मुझे लोगों से मिलने, उनकी समस्याएं सुलझाने में आनंद आता है। मेरी दृष्टि ऐसी है कि अगर लीक से हटकर भी कोई चीज नजर आती है, तो उसके  बारे में सरकार से कहता हूं। लखनऊ मेट्रो की रेलिंग की डिजाइन बदलने की बात हो या राजधानी में बनाए गए खतरनाक स्पीड ब्रेकर से लोगों को होने वाली कठिनाई या फिर एमबी क्लब में ड्रेस कोड की पाबंदी, इन विषयों पर भी मैंने हस्तक्षेप किया और इसके अच्छे नतीजे आए।

संघ के कार्यक्रमों में शामिल होने पर उठाते हैं उंगली

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सवाल : आप आरएसएस के स्वयंसेवक होने का जिक्र करते रहते हैं। संघ के कार्यक्रमों में शामिल होने पर विपक्षी दल उंगली भी उठाते रहे हैं? इस पर क्या कहेंगे?
नाईक :
 यह राजनीतिक मामला है। कोई उत्तर नहीं दूंगा। जहां तक स्वयंसेवक होने की बात है तो बचपन से हूं और अभी भी हूं। संघ ने समाजसेवा व राष्ट्रसेवा का जो पाठ पढ़ाया, उसी के तहत काम किया है। संघ के प्रचारक सुरेश राव केतकर का दो दिन पहले निधन हुआ। उनके और हमारे बीच 1952 से संबंध थे। उनकी शोकसभा में गया तो क्या गलत व्यवहार किया? जो भी अलग गुण हैं, वे आरएसएस से जुड़ाव के कारण ही हैं। ऐसे विषयों में राजनीतिक अस्पृश्यता समाज के हित में नहीं है। लोहिया जी को भी श्रद्धांजलि देने गया। वह कार्यक्रम समाजवादी पार्टी ने आयोजित किया और उसमें मुलायम सिंह यादव व प्रो. राम गोपाल यादव भी थे। हम तो राजनीतिक शिष्टाचार और सभ्यता का पालन करते हैं।

सवाल :  राजभवन व राज्य सरकारों में टकराव के हालात कई राज्यों में हैं। प्रदेश में भी विधेयकों, विधान परिषद में सदस्यों के मनोनयन आदि को लेकर आपका सरकार से मतभेद रहा है। इससे कैसे बचा जाना चाहिए?
नाईक :
 यह राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों पर निर्भर है। मेरे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ स्नेहपूर्ण संबंध हैं। मुझे जो करना है, वह करता हूं। विधान परिषद में मनोनयन, लोकायुक्त की नियुक्ति जैसे कई मुद्दों पर विवाद की चर्चा छिड़ी, लेकिन मैने संविधान के तहत काम करते समय कटुता नहीं आने दी। इसका श्रेय मुझे भी है और उन्हें भी। परस्पर सहयोग और सम्मान लोकतंत्र की आवश्यकता है।

आजम खां पर भी राज्यपाल राम नाईक ने दिया जवाब

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सवाल : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यपालों को विधानमंडल की कार्यवाही में दखल नहीं देना चाहिए। आपके खिलाफ नगर विकास मंत्री ने विधानसभा में काफी कुछ कहा है। इस बारे में क्या कहेंगे?
नाईक :
 (मुस्कुराते हुए कहा, आजम खां पर काफी घुमाकर सवाल पूछ रहे हैं) आजम खां संसदीय कार्य मंत्री हैं और समाजवादी पार्टी के महासचिव भी हैं। उनकी राजनीतिक टीका-टिप्पणी पर कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन जब उन्होंने राजनीतिक मर्यादा लांघी और विधानसभा में जिस तरह से राज्यपाल के खिलाफ बोले, उसके बाद मैने विधानसभा अध्यक्ष से कार्यवाही मंगाई। इसमें पता चला कि उनका एक तिहाई वक्तव्य संसदीय नहीं था, जिसे कार्यवाही से निकाल दिया गया था। उन्हें विधानसभा की मान-मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। इसलिए यह बात मुख्यमंत्री को भी बताई थी। इतना जरूर साफ कर देना चाहता हूं कि मैंने मुख्यमंत्री से उन्हें मंत्रिमंडल से निकालने के लिए कतई नहीं कहा था, क्योंकि राज्यपाल के नाते संविधान मर्यादा और अपनी लक्ष्मण रेखा जानता हूं।

सवाल : आजम खां ने कहा है कि उन्हें राजभवन आने में डर लगता है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया है कि उनकी हत्या करने की साजिश करने वालों को राजभवन संरक्षण दे रहा है? क्या कहेंगे?
नाईक :
 कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। इस बारे में मुख्यमंत्री व पार्टी नेताओं को विचार करना चाहिए।

सवाल : आपने मथुरा, कैराना व दादरी मामले पर राष्ट्रपति व केंद्र को अपनी विशेष रिपोर्ट भेजी है? क्या आप इन घटनाओं को खुफिया तंत्र व कानून-व्यवस्था की विफलता मानते हैं?
नाईक :
 हां, मैने विशेष रिपोर्ट भेजी है। मेरी नजर में तीनों ही कानून-व्यवस्था से जुडे़ अहम मामले हैं। राष्ट्रपति व केंद्र सरकार को यहां की स्थिति की जानकारी देना मेरा दायित्व है। हर महीने रिपोर्ट भेजता हूं, लेकिन इन तीनों मामलों की विशेष रिपोर्ट भेजी है। इसके तथ्यों का खुलासा करना उचित नहीं है।

राज्य सरकार को दिए सुझाव

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सवाल : राज्य सरकार के बारे में आपकी राय?
नाईक : सरकार काम तो कर रही हैं लेकिन मुझे लगता है कि कानून-व्यवस्था और गवर्नेंस के मोर्चे पर सुधार की जरूरत है।

सवाल : उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के  लिए अपनी मुहिम को कितना सफल मानते हैं?
नाईक : इस बार दीक्षांत समारोह समय पर हुए हैं। दीक्षांत समारोह के परिधान में बदलाव बड़ा परिवर्तन है। समय पर परीक्षा हुई और ज्यादातर नतीजे घोषित भी हो गए। नकल पर काफी हद तक अंकुश लगा है। प्रवेश की प्रक्रिया समय पर शुरू हो गई। काफी कुछ किया है, अभी कर रहे हैं और करना बाकी है। विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर के बहुत से पद खाली हैं। उन्हें भरने के  लिए सरकार को निर्देश दिया है। मैंने सरकार को कुलपतियों का कार्यकाल तीन से बढ़ाकर पांच वर्ष करने का सुझाव दिया है ताकि स्थिरता रहे। पहली बार राजभवन के बाहर कुलपतियों की बैठक हुई। जौनपुर के बाद अब 30 जुलाई को झांसी में बुंदेलखंड विवि में बैठक करने जा रहा हूं। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने और अनुसंधान की चुनौतियों को पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे।

सवाल : आगे की क्या योजना है?
नाईक : बस चलते रहना है। मेरा मानना है कि काम करते रहोगे तो काम करने लायक रहोगे। अगले महीने मराठी में मेरी पुस्तक चरैवेति! चरैवेति!! का हिंदी और उर्दू में अनुवाद आने जा रहा है। यही चाहता हूं कि प्रदेश को आगे बढ़ाने में ज्यादा से ज्यादा योगदान करूं।

Courtesy: Amarujala

Categories: Politics, Regional

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