सांसें थाम कर देखिए लेह-लद्दाख की खूबसूरत वादियां, 10 तस्वीरें

सांसें थाम कर देखिए लेह-लद्दाख की खूबसूरत वादियां, 10 तस्वीरें

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चंडीगढ़ से 3100 किलोमीटर दूर स्थित लेह-लद्दाख की खूबसूरत वादियां देखकर आपकी सांसें थम जाएंगी। देखिए 10 तस्वीरें।

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देश के एक कोने में बसी इस खूबसूरत दुनिया को कैमरे में कैद करके लाए चंडीगढ़ के जसपाल सिंह। 39 वर्षीय जसपाल सिंह सेक्टर 11 स्थित पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज में प्रोफेसर हैं। इन्हें फोटोग्राफी का इतना शौक है कि कैमरा उठाया, बुलेट दौड़ाई और पहुंच गए लद्दाख। यहां उन्होंने सबसे पहले रेड आर्यंस के गांव दारचिक का दौरा किया और इस गांव की सभ्यता, संस्कृति, प्रकृति के नजारों को अपने कैमरे में कैद किया।

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जसपाल ने गांव के साथ-साथ यहां जसपाल ने गोम्पा मठ, पांगोंग टीएसओ झील की भी फोटोग्राफी की। 13 दिन के इस रोमांचित कर देने वाले सफर में डॉ. जसपाल के तीन साथी डॉ. बलविंदर सिंह (42), मनजिंदर सिंह (28) और सुखजिंदर सिंह (26) भी साथ थे। पिछले वर्ष डॉ. जसपाल साइकिल ने अपने साथियों संग ही चंडीगढ़ से लेह तक का सफर साइकिल से ही तय किया था। इसमें उन्हें 27 दिन लगे थे।

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डॉ. जसपाल सिंह बताते हैं कि दारचिक गांव लद्दाख के कारगिल जिले में आता है। 1999 की कारगिल लड़ाई में यहां के लोगों को काफी संताप भोगना पड़ा। वहां मौजूद एक शख्स ने बताया कि कारगिल की लड़ाई में हमने इंडियन आर्मी की विशेष रूप से सहायता की। जब वे और उनके साथी गांव में दाखिल हुए तो वहां 250 के करीब लोग एक जगह पर महात्मा बुद्ध की पूजा कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि पूजा बारिश के लिए की जा रही है और 7 दिन तक यह पूजा चलती है।

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दारचिक गांव में ब्रोकपा जाति के लोग रहते हैं। वे लंबे कद-काठी और गोरे रंग के हैं। वे पंजाबियों की तरह ही खुशमिजाज थे। उनकी आंखों का रंग हरा था। घर आए अतिथियों के स्वागत के लिए ये जुले शब्द का प्रयोग करते हैं। इसका प्रयोग प्रणाम, धन्यवाद और बाय के लिए होता है।

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दारचिक गांव की औरतें मेटल, गोल्ड और सिल्वर के आभूषण पहनती हैं, जबकि आदमी कमरबंद के साथ मैरून कलर का गाउन पहनते हैं। दारचिक गांव के लोग प्रकृति से जुड़े हैं। फूलों का उनकी सभ्यता में विशेष स्थान है।

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दारचिक वासी सिर पर कलरफुल टोपी पहनते हैं, जिसे वहां टेपी कहा जाता है। टेपी पर वे मोंथों फूल लगाते हैं, जिन्हें शोकलों भी कहा जाता है। इस फूल की विशेषता यह है कि इसका केसरिया रंग हमेशा बना रहता है और यह फूल कभी मुरझाता नहीं। इसके टूटने केबाद ही लोग इसे उतारते हैं। इसकी खुशबू इत्र की भांति काफी समय तक बनी रहती है।

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दारचिक गांव के लोग बौद्ध शिक्षाओं का अनुकरण करते हैं और अपनी जन्मभूमि के प्रति वफादार और ईमानदार रहने में विश्वास रखते हैं। इंडस्ट्री न होने के कारण यहां के ज्यादातर लोग खेती पर निर्भर करते हैं। यहां कनक, जौ आदि फसलें उगाई जाती हैं। उत्सवों में बकरी का मास और साधारण दिनों में अंडा, मीट, दूध से बने व्यंजन खाते हैं।

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इसके अलावा लोग यहां किचन गार्डन में सब्जियां और फल उगाते हैं। यातायात की बात की जाए तो दारचिक की सड़कें पक्की बनी हुई हैं। वहां ज्यादातर टूरिस्ट गाड़ियां देखने को मिलती हैं। गांव के लोग एक जगह से दूसरी जगह टैक्सियों से आते जाते हैं। आय का स्रोत यहां का टूरिज्म ही है।

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यहां के लोग ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं। वहां औरतों की परिस्थिति काफी बेहतर है। वे अपनी इच्छा मुताबिक कहीं भी आ जा सकती हैं। यहां तक कि औरतें अपने स्तर पर घर की आर्थिक हालत सुधारने के लिए काम करती हैं। इस जाति के 80 प्रतिशत लोग अपने गांव में ही शादी करते हैं। यदि उनकी लड़की या लड़का दूसरी जाति में शादी करता है तो उसे गांव से बाहर निकाल दिया जाता है।

Courtesy: Amarujala

Categories: India
Tags: Ladakh, Leh

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