जीएसटी के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत क्यों?

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नई दिल्ली
राज्यसभा बुधवार को संविधान (122वां संशोधन) (जीएसटी) बिल, 2014 पर विचार करेगी। यह बिल गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करेगा। इस बारे में ईटी आपको और जानकारी दे रहा है।

जीएसटी को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत क्यों है?
संविधान में टैक्सेशन को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। अभी केंद्र को इंटर-स्टेट सेल को छोड़कर सामानों की बिक्री पर टैक्स लगाने का अधिकार नहीं है और राज्य सेवाओं पर टैक्स नहीं लगा सकते। यह विभाजन संविधान के सातवें शेड्यूल के तहत आर्टिकल 246 में दिया गया है। सामान और सेवाओं पर सिंगल टैक्स, जीएसटी के संबंध में केंद्र और राज्यों दोनों को शक्ति देने के लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत है। इस वजह से बिल का पहला प्रावधान धारा 246 के बाद धारा 246A को जोड़ना है। इसमें कहा गया है कि संसद और प्रत्येक राज्य की विधानसभा के पास केंद्र या प्रत्येक राज्य की ओर से लागू किए गए गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स के संबंध में कानून बनाने की शक्ति होगी। गुड्स या सर्विस की इंटर-स्टेट सप्लाई या दोनों के मामले में केवल संसद के पास शक्ति होगी।

सेंट्रल टैक्सेज सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी अडिशनल एक्साइज ड्यूटी मेडिसिनल ऐड टॉइलट प्रिपेरेशंज (एक्साइज ड्यूटीज) ऐक्ट, 1955 सर्विस टैक्स अडिशनल कस्टम्स ड्यूटी स्पेशल अडिशनल ड्यूटी ऑफ कस्टम्स गुड्स और सर्विसेज की सप्लाई से संबंधित सेंट्रल सरचार्ज और सेस स्टेट टैक्सेज स्टेट वैल्यू एडेड टैक्स/सेल्स टैक्स एंटरटेनमेंट टैक्स (स्थानीय निकायों की ओर से लगाए जाने वाले टैक्स के अलावा) सेंट्रल सेल्स टैक्स (केंद्र की ओर से लागू और राज्यों की ओर से एकत्र किया जाने वाला) ऑक्ट्रॉय और एंट्री टैक्स परचेज टैक्स लग्जरी टैक्स लॉटरी, बेटिंग और गैंबलिंग पर टैक्स गुड्स और सर्विसेज की सप्लाई से संबंधित स्टेट सेस और सरचार्ज

जीएसटी बिल को लेकर राजनीतिक मुश्किल क्यों हुई?
संविधान संशोधन बिल को एक स्पेशल मेजॉरिटी से पास करना होता है। केंद्र की एनडीए सरकार के पास लोकसभा में बिल को पास कराने के लिए पर्याप्त सांसद थे, लेकिन राज्यसभा में उसके पास समर्थन की कमी थी। उसे बिल को पास कराने के लिए कांग्रेस और अधिकतर अन्य दलों की सहमति प्राप्त करनी थी। जीएसटी बिल को लेकर आम सहमति बनाना मुश्किल था और इसमें काफी समय भी लगा।

स्पेशल मेजॉरिटी से पास होने वाले ऐसे बिल के लिए वोटिंग राइट्स क्या होते हैं?
ऐसे मामलों में वोटिंग हमेशा एक विभाजन से होती है। प्रत्येक क्लॉज या शेड्यूल को अलग से सदन के वोट के लिए रखा जाता है और यह स्पेशल मेजॉरिटी से होता है। सदन की सहमति से क्लॉज या शेड्यूल के एक ग्रुप पर एक साथ वोटिंग हो सकती है। क्लॉज या शेड्यूल में संशोधन का फैसला किसी भी अन्य बिल की तरह साधारण बहुमत से होता है।

संसद की ओर से बिल पास होने के बाद क्या होगा?
इस बिल के जरिए सातवें शेड्यूल में संशोधन होना है जिससे केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण बदल जाएगा और इस वजह से इसे राज्यों की भी सहमति की जरूरत है। बिल के पास होने के बाद कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं को इसे मंजूरी देनी होगी। इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास उनकी अनुमति के लिए भेजा जाएगा। स्पेशल मेजॉरिटी के जरिए पास होने वाले इस तरह के बिल पर राष्ट्रपति अनुमति देने के लिए बाध्य होते हैं।

Courtesy : NBT
Categories: Finance, India, Politics

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