फिल्म समीक्षा/बुधिया सिंह: सिनेमा का गोल मेडल

फिल्म समीक्षा/बुधिया सिंह: सिनेमा का गोल मेडल

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निर्माताः सुभामित्रा सेन

निर्देशकः सौमेंद्र पाधी
सितारेः मनोज वाजपेयी, मयूर पटोले, श्रुति म्हात्रे, तिलोत्तमा शोम
रेटिंग ****

बुधिया सिंह ने भारत को ओलंपिक में दिलाया एथलेटिक्स का पहला गोल्ड मैडल! रियो में आज से शुरू हुए खेलों के महाकुंभ में आने वाले दिनों में शायद यह अखबार के पहले पन्ने की खबर बनती। मगर ऐसा नहीं होगा। 2016 के ओलंपिक खेलों के लिए बुधिया को तैयार कर रहे उसके कोच बिरंची दास की 2008 में हत्या कर दी गई थी। उसके पीछे क्या कारण थे, उन पर आज भी धुंध के बादल हैं। लेकिन इससे भी पहले बुधिया और बिरंची के सुनहरे भविष्य की तरफ बढ़ते कदमों को रोकने के लिए बहुत सारी राजनीतिक कीलें बिछा दी गई थीं, जिन्होंने उनके पैरों को लहूलुहान किया।

बुधिया के लंबी दूरी तक दौड़ने पर जो पाबंदी लगी वह आज तक जारी है। बुधिया खिलाड़ी है लेकिन सिर्फ रिकॉर्ड दर्ज करने वाली किताबों में। लेखक-निर्देशक सौमेंद्र पाधी की यह पहली फिल्म है। जो बुधिया के साथ बिरंची की भी सच्ची दास्तान है। यह भाग मिल्खा भाग और मैरी कॉम की तरह स्पोर्ट्स फिल्म है। यह अलग बात है कि इसे 2016 की सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। जूडो कोच बिरंची ने कैसे गरीब बुधिया की प्रतिभा को पहचाना, उसे गोद लेकर अपना बेटा बनाया और रात-दिन तराशा।

मात्र पांच साल की उम्र के बुधिया को बिरंची ने दुनिया का सबसे नन्हा मैराथन धावक बना दिया। मगर बच्चों, औरतों, गरीबों के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेकने वालों ने इन्हें रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। क्या यह सच नहीं कि सत्ता निजी प्रयासों से उभरते किसी व्यक्ति को इतना ऊंचा उठते देखना नहीं चाहती कि लोग व्यवस्था को दोयम मानने लगें? इसीलिए खेल, संस्कृति, सिनेमा और साहित्य से राजनीति का कद ऊंचा है।

कहानी सीधे दर्शक के दिल तक पहुंचती है

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देश के खेल संघों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष को छूने वाले खिलाड़ी पैदा नहीं किए। जो अपने दम पर बन सके, उन्हीं की जय-जयकार हुई। हां, कई बनते खिलाड़ियों को मिटा देने के काम जरूर खेलों में होने वाली राजनीति ने किया। बुधिया की कहानी भी वही है। बुधिया सिंहः बॉर्न टू रन औसत बॉलीवुड फिल्म नहीं है। सिनेमा का अगर कोई गोल्ड मैडल होता, तो वह अवश्य इसे मिलता। यह फिल्म झकझोरने वाली हकीकत है।

सौमेंद्र ने स्क्रिप्ट और फिल्मांकन दोनों के साथ न्याय किया। उन्होंने न तो भावुकता पर बहुत जोर दिया और न फिल्मी ड्रामा रचने की कोशिश की। उनकी बात सीधे दर्शक के दिल तक पहुंचती है। फिल्म में नन्हें मयूर ने सहजता से बुधिया के जूतों में अपने पैर डाले और किरदार के साथ उड़ान भरी। वहीं मनोज वाजपेयी ने एक बार फिर खूबसूरती से अपना रोल निभाया।

खेल के लिए जुनून, बच्चे के संग तटस्थता और लगाव, बाल विकास के नाम पर बनी व्यवस्था से लड़ाई और मीडिया के साथ तल्खी के हर दृश्य में वह जमे हैं। वह ऐसे व्यक्ति के रूप में हैं जो हर पल जीतने से कम कुछ नहीं चाहता। इसलिए वह सख्त और सनकी भी नजर आता है। मनोज की पत्नी के रूप में श्रुति म्हात्रे और बुधिया की मां की भूमिका में तिलोत्तमा शोम के हिस्से में भी अच्छे दृश्य आए हैं। बुधियाः बॉर्न टू रन के बारे में आप निःसंदेह किसी से भी कह सकते हैं कि यह फिल्म अवश्य देखें।

Courtesy: Amarujala

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