सबकुछ तो है सानिया मिर्जा के पास सिवाय एक ओलंपिक मेडल के

सबकुछ तो है सानिया मिर्जा के पास सिवाय एक ओलंपिक मेडल के

455661-sania-mirza-smiling-700

नई दिल्लीः 2005 का ऑस्ट्रेलिया ओपन चल रहा था. एक टेलीविजन चैनल के न्यूज रूम में स्पोर्ट्स डेस्क के आस पास माहौल बड़ा गर्म था. गर्म इसलिए नहीं कि कोई भारतीय जीत रहा था बल्कि इसलिए क्योंकि एक भारतीय खिलाड़ी अपने से कहीं बड़ी टेनिस स्टार सेरेना विलियम्स को छका रही थी. टूर्नामेंट में वो तीसरे राउंड का मैच था और हम सभी जानते थे कि वो खिलाड़ी अपने से कहीं ज्यादा रैंकिग्स वाली खिलाड़ी को हरा नहीं पाएगी, लेकिन उसका जज्बा देखने लायक था. सर्विस और रिटर्न के वक्त लगने वाली ‘एक्सट्रा’ ताकत और उस ‘एक्सट्रा’ ताकत के साथ मुंह से निकलने वाली आवाज स्पोर्ट्स डेस्क के आस पास से गुजरने वालों को थोड़ा चौंका भी रही थी. सवाल भी पूछे जा रहे थे, क्योंकि स्पोर्ट्स डेस्क पर खड़े होकर या यूं कहें कि झुंड बनाकर क्रिकेट मैच देखने की बात तो आम थी लेकिन इतने गौर से टेनिस मैच देखा जा रहा हो, ऐसा पहली बार हो रहा था. आखिर में वो भारतीय खिलाड़ी सीधे सेटों में हार गई, लेकिन पूरे मैच के दौरान उसने बीच बीच ये एहसास करा दिया कि वो आने वाले वक्त की टेनिस स्टार है. पिछले करीब 10 साल में उस खिलाड़ी ने इस बात को बखूबी साबित किया. उस खिलाड़ी का नाम है सानिया मिर्जा.

करियर का पहला ग्रैंडस्लैम

अगले करीब 3-4 साल तक सानिया मिर्जा दुनिया भर के तमाम बड़े टेनिस टूर्नामेंट्स में कोर्ट पर उतरती रहीं. इसी दौरान वो किसी ग्रैंडस्लैम में ‘सीड’ पाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी भी बनीं. कुछ WTA टूर्नामेंट्स में उन्हें जीत भी मिली. इसके अलावा तमाम टूर्नामेंटस के तीसरे या चौथे राउंड तक पहुंचना उनके लिए आम बात हो गई. एकाध मौकों पर उन्हें ‘सीरियस इंजरी’ भी हुई. लेकिन एक खिलाड़ी का करियर जिन रास्तों से गुजरना चाहिए उस रास्ते पर उनका सफर चलता रहा. इसके बाद सानिया ने अपने ‘पॉवरफुल’ खेल से आगे बढ़ने का सफर जारी रखा. उनके ‘फोरहैंड’ और ‘वॉली’ के शानदार अंदाज से उनका खेल निखरता चला गया. जल्दी ही वो देश की नई ‘स्पोर्टिंग आइकन’ बन गईं. 2006 आते आते वो पद्मश्री सानिया मिर्जा बन चुकी थीं. सानिया के नाम पर लोगों ने अपनी लड़कियों के नाम रखने शुरू कर दिए. उनकी ‘नोस पिन’ भी एक फैशन स्टेटमेंट बन गया. उसके बाद साल 2009 का साल था. नतीजों के लिहाज से उनका पसंदीदा टूर्नामेंट ऑस्ट्रेलियन ओपन चल रहा था. महेश भूपति के साथ उनकी जोड़ी मिक्सड डबल्स के फाइनल में पहुंच चुकी थी. फाइनल में मुकाबला नैथाली डेसी और एंडी राम से था. सानिया और महेश भूपति की जोड़ी ने फाइनल मैच में एकतरफा जीत हासिल की. स्कोरलाइन पर 6-3,6-1 का स्कोर था और सानिया के हाथ में अपने करियर का पहला ग्रैंडस्लैम टाइटल.

Sania-hingis

सानिया का ओलंपिक सफर

सानिया मिर्जा ने पहली बार बीजिंग ओलंपिक में भारत की नुमाइंदगी की थी. सिंगल्स मुकाबले के पहले ही दौर में वो कलाई में चोट की वजह से बाहर हो गई, डबल्स में उन्हें पहले दौर में ‘बाई’ मिला लेकिन उनका सफर दूसरे दौर से आगे नहीं बढ़ पाया. इसके बाद 2012 में लंदन ओलंपिक्स में भी उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा. 2012 में टीम के सेलेक्शन को लेकर भी खूब बवाल हुआ. महेश भूपति और रोहन बोपन्ना ने जब लिएंडर पेस के साथ खेलने से मना कर दिया तो टेनिस एसोसिएशन ने सानिया को पेस के साथ मिक्सड डबल्स खेलने के लिए कहा. सानिया खेलने को तैयार तो हो गईं लेकिन उनकी नाराजगी भरे बयान बीच बीच में आते रहे. उन विवादों का नतीजा पिछले ओलंपिक में टेनिस में भारत को कोई मेडल नहीं मिला. रियो सानिया मिर्जा का तीसरा ओलंपिक है.

सानिया आगे आगे, विवाद पीछे पीछे

वैसे 2012 ओलंपिक्स में टीम के सेलेक्शन को छोड़ भी दिया जाए तो विवाद सानिया मिर्जा के साथ साथ चलते रहे हैं. टेनिस कोर्ट में उनकी ड्रेस पर शुरू हुआ विवाद कहां कहां पहुंच चुका है सोचना मुश्किल है. एक हाई प्रोफाइल सगाई के बाद उसका टूटना और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ उनकी शादी भी खूब विवादों में रही. आए दिन कोई उनकी राष्ट्रीयता पर सवाल उठाता है, कोई उनके कपड़ों और बयानों पर. ओलंपिक की मार्च पास्ट में उनकी ड्रेस पर भी विवाद हो चुका है. हाल ही में सानिया मिर्जा ने अपनी आटोबायोग्राफी ‘Ace against Odds’ लॉन्च की है, जिसमें इन सारे विवादों का जिक्र है. हालांकि इन विवादों का सबसे बड़ा सच ये है कि सानिया ने हर विवाद का जवाब अवॉर्ड से दिया है.

sania-bopannaकितना मजबूत है सानिया का दावा

सानिया मिर्जा अब सिंगल्स नहीं खेलती हैं. 2013 के आस पास उन्होंने सिंगल्स खेलना छोड़कर अपना पूरा ‘फोकस’ डबल्स और मिक्सड डबल्स पर लगाया. इन दिनों मार्टिना हिंगिस के साथ उनकी जोड़ी लगातार कमाल करती आई है. इस समय वो वूमेंस डबल्स में विश्व की नंबर एक खिलाड़ी भी हैं. रियो में वो प्रार्थना थंबारे के साथ वूमेंस डबल्स और रोहन बोपन्ना के साथ मिक्सड डबल्स खेलने के लिए कोर्ट में उतरेंगी. उनके पास दो ओलंपिक का अनुभव है और ओलंपिक मेडल जीतने की भूख भी. उन्हें ये भी पता है कि ये उनका आखिरी ओलंपिक है, ऐसे में उनसे उम्मीद करना गलत नहीं है. ओलंपिक मेडल ही उनके चमकते दमकते करियर की एक बड़ी कमी भी है.

Courtesy: ABPNews

 

Categories: India, Sports

Related Articles