स्टोर भूसे से भरा, गायों का पेट खाली

स्टोर भूसे से भरा, गायों का पेट खाली

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देश में गोवंश आस्था के साथ ही बहस का भी विषय है। सड़कों पर लावारिस घूमते गोवंश नागरिक समस्या का मुद्दा बन जाती है तो कभी उनकी हत्या व गोमांस पर सामाजिक से राजनीतिक लड़ाई तक तेज हो जाती है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों के दौर से इतर अगर गोवंश के संरक्षण के प्रति संजीदगी देखी जाए तो व्यवस्था पंगु नजर आती है। इसका नमूना देखना है तो आइए पतारा क्षेत्र के सागर राजमार्ग किनारे गांव भांट में संचालित धेनु गोवंशाला जहां स्टोर में भूसा तो रखा है लेकिन गायों का पेट खाली है।

पांच बीघा क्षेत्रफल में संचालित में सौ गायों की क्षमता वाले इस गोवंशाला में मौजूदा समय में 65 गायें हैं। टीन शेड के नीचे बनी नांदें खाली पड़ी हैं जिनमें अर्से से चारा नहीं डाला गया। गंदगी का अंबार भी कम नहीं। स्टोर में करीब दो कुंतल भूसा जरूर पड़ा है लेकिन गायें भूख से चिल्ला रही हैं। देखरेख के लिए तैनात चार सेवादार गंगा दयाल कश्यप, गिरधारी कछवाह, बब्लू यादव व चौधरी यादव स्वीकारते हैं कि गायों को भूसा नहीं दिया जाता है। परिसर में लगी घास चर कर ही उनका कम चलता है। सेवादारों के मुताबिक एक पखवारा पूर्व दो कुंतल भूसा आया था जो स्टोर में रखा है। वे किसी गाय के दूध देने की बात से भी इंकार करते हैं।

मौत पर रेलवे लाइन किनारे देते फेंक

सेवादार बताते हैं कि बीमार गायों के इलाज के लिए कभी कोई डाक्टर नहीं आते हैं। मौत होने पर पहले चमड़ा उतारने वाले ले जाते थे लेकिन बढ़े बवाल के बाद कोई नहीं आता। अब शव गौशाला के पीछे कानपुर-बांदा रेल लाइन किनारे फेंक दिया जाता है। हालांकि प्रबंधक अमित तिवारी चिकित्सक के आने व मृत गायों के दफनाए जाने का दावा करते हैं। प्रबंधक बताते हैं कि पुलिस पकड़े जाने वाले गाय-बैल गौशाला में छोड़ जाती है जिन्हें इच्छुक किसानों में भी बांट दिया जाता है। वह निजी धन से गौशाला संचालन का दावा करते हैं।

सेवादारों को भी आठ माह से वेतन नही

सेवादार बताते हैं उन्हें दिसंबर से वेतन नहीं मिला है और अब वे लोग काम छोड़ कर जाने वाले हैं। वहीं प्रबंधक उन्हें जल्द वेतन देने की बात कहते हैं।

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