गुजरात में गाय की खाल का “1200 करोड़ का कारोबार

गुजरात में गाय की खाल का “1200 करोड़ का कारोबार

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उना की घटना और गोरक्षकों की मार-पिटाई और उत्पीड़न के बाद गुजरात में आंदोलनकारी दलितों ने मृत गायों की खाल निकालने और उसे दफनाने से इनकार कर दिया है। 15 फीसदी गुजरात के रोहित समुदाय की रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया अब भी गाय की खाल निकालना और उसे बेचना है, लेकिन गुजरात में 18 जुलाई के बाद से मृत गायों को दफनाने का काम बंद है। सौराष्ट्र में सुरेंद्रनगर के रहने वाले हीरा भाई चावडा बताते हैं कि गाय की चमड़ी निकालने का कॉन्ट्रैक्ट 6 से 7 लाख में दिया जाता है। मृत गाय की खाल निकालने का कारोबार 1200 करोड़ का है।

12 हजार रुपये तक आमदनी

हीरा भाई ने बताया कि रोहित समुदाय के कुछ सदस्य मिलकर भम बनाते हैं। भम समुदाय एक दिन में 6-7 मरी हुई गायों की चमड़ी निकालता है, जिनके लिए पहले पंजरापोल्स (गोशाला) से अनुमति ली जाती है। इससे इस काम में शामिल हरेक सदस्य को महीने में 10 से 12 हजार रुपये की आमदनी होती थी। हीराभाई का कहना है कि अब इस काम में बड़े खिलाड़ी शामिल हो चुके हैं। अब गुजरात के दलित सिर्फ गाय की चमड़ी निकालते हैं। नमक लगाकर रखने के बाद उसे कानपुर, कोलकाता, चेन्नै और हापुड़ के कारखानों में भेजा जाता है।

दलितों की पिटाई क्यों?

मृत गायों का मांस 40 रुपये किलो तक बेचा जाता है। काटकर सुखाया गया मांस 100 रुपये किलो तक बिकता है। हीराभाई कहते हैं कि लोग चमड़े से बनी वस्तुओं का उपयोग तो करना चाहते हैं, लेकिन मृत जानवरों की खाल निकालने वालों की पिटाई करने से नहीं चूकते। हीराभाई ने बताया कि गाय की चमड़ी 500 से 800 रुपये के बीच बेची जाती है। मृत गाय की हड्डियों को 10 रुपये किलो के हिसाब से बेचा जाता है।

Courtesy: Navbharat Times

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