रियो के हीरो और ज़ीरो: 34 पैसे में 2 मेडल क्या बुरे हैं

रियो के हीरो और ज़ीरो: 34 पैसे में 2 मेडल क्या बुरे हैं
  • अबिनाश चौधरी

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रक्षाबंधन के पावन पर्व की सुबह, हम सब ने आँख खोला एक सुखद समाचार से| सदियों से चली आ रही रक्षाबंधन की परंपरा, जिसमें भाई अपने बहन की रक्षा करने की कसम ख़ाता, वो टूट गया| 120 करोड़ की आबादी वाले भारत वर्ष के भाईयो की रियो के ओलिंपिक मे एक बहन ( Sakshi Malik) ने पदक दिलाकर रक्षा किया| इतना ही नही शाम होते होते दूसरा पदक भी पी भी सिंधु ने दिलाया|
साक्षी मलिक और सिंधु की जीत बहुत मायने मे महत्वपूर्ण है| साक्षी जो हरियाणा के रोहतक से आती है, ये अपने आप मे एक सीख है| हरियाणा मे किन मुश्किलों में वो आगे बढ़ी होगी, ये हम सब के कल्पना से बाहर की बात है| जिस राज्य मे लड़कियो के जन्म लेते ही मार दिया जाता है, वहां साक्षी की ये जीत किसी वीरगाथा से कम नही है|
लेकिन कहानी अभी बाकी है- साक्षी और सिंधु ने जहाँ पदक जीता वही अदिति, करमाकर, बाबर, और दुती चंद ने पूरे हिन्दुस्तान का दिल जीत लिया| अपने अपने खेलों मे उन्होने भारत का नाम रौशन किया|
खेल कूद का महाकुंभ ओलिंपिक खेल 2016 कल रियो मे समाप्त हो गया| भारत पदक तालिका मे 2 पदको के साथ अपना 2012 का प्रदर्शन भी दोहरा नही पाया| खेलों में हमारे दयनीय प्रदर्शन की वजह मंत्रियों-अफ़सरों की मटरगश्ती ही नहीं है, खिलाड़ियों के साथ सौतेला बरताव भी है। इसका प्रमाण हमे संसद के उस रिपोर्ट से मिल जाता जहा ये बाते गया है की हम अपने प्रति खिलाड़ियो पर  34 पैसे से भी कम प्रति दिन खर्च करते है| (http://164.100.47.5/newcommittee/reports/EnglishCommittees/Committee%20on%20HRD/281.pdf) इस से भी ज़्यादा गंभीर बात है 2012 के अच्छे प्रदर्शन के बाद एक उम्मीद जागी थी, शायद हमारी सरकार खेलों पर ध्यान देगी| हुआ ठीक इसका उल्टा पिछले तीन सालो मे केंद्र की सरकार ने सभी खेलो मे पैसा घटा दिया| क्या ये एक बड़े अर्थव्यवस्था वाले देश की कहानी है?
खेल और खिलाड़ियो के प्रति हमारी उदासीनता का इसी से पता चल जाता है- छत्तीस साल बाद ओलंपिक की 100 मीटर रेस में क्वालीफाइ करने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट दुती चंद ने क्या ट्वीट किया| उन्होने लिखा -“मैंने अपना सफ़र हैदराबाद से शुरू किया है। मैनेजर और अन्य (अधिकारियों) को बिज़नस क्लास का टिकट दिया गया है, पर हम खिलाड़ियों को इकॉनमी (अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का तीसरा दरज़ा) क्लास का। रियो का सफ़र 36 घंटे का था, न नींद पर्याप्त हुई न आराम। अगर खिलाड़ियों के साथ यह सलूक किया जा रहा है तो ओलम्पिक में वे भला कैसा प्रदर्शन कर पाएँगे?” जो उन्होने लिखने की हिम्मत नही दिखायॉई वो ये की सारे नेता बिजनिस क्लास मे सफ़र किए|
जब नेता की बात चली है तो भला खेल मंत्री का व्यवहार कैसे जिक्र मे नही आएगा| जो अपरिपक्वता विजय गोयल ने दिखाया रियो मे वो हम सबको शर्मसार कर दिया| मुश्किल है नेताजी खेल ओर नेतागिरी का फ़र्क नही समझते| जिस तरह पीछले दो सालो मे उन्होने अपने पार्टी दफ़्तर के सामने पोस्टर लगा कर नेता से एंपी और फिर मंत्री का सफ़र तय किया उसी तरह वो रियो मे सेल्फी लेकर अपने देशभक्ति और समर्पित नेता होने का प्रमाण दे रहे थे| बस फ़र्क इतना था उनकी इस लड़कपन की वजह से हमारे अधिकारी को डाट डपट खानी पड़ी|
ये तो देश के खेल मंत्री का हाल है| हरियाणा के मंत्री अनिल विज तो उनसे भी दो कदम आगे निकले- खुद तो जनता के पैसे पर  गये ही लेकिन अपने साथ 8 अधिकारी को भी रियो भ्रमण पर  ले गये| पूछने पर  तपाक से बोल पड़े- “मई तो खिलाड़िओ के हौसले अफज़ाई के लिए गया था| उन्हे रहने मे कोई दिक्कत ना हो” सच्चाई ये है की मंत्री जी जिन खेलो को देखने गये उस खेल के वक़्त वो नदारद थे|
हर बड़े खेलो के बाद ऐसे कितने संपादकिए लिखे जाते है लेकिन फिर “धाक के तीन पात” वाली स्थिति हो जाती है| यदि हमे अपनी स्थिति बदलनी है तो हमे एक अलग खेल के लिए ट्रिब्यूनल बनाना चाहिए| खेलो के फंडिंग मे पारदर्शिता लानी पड़ेगी| हर साल आमद और खर्च का पूरा हिसाब का ऑडिट कर खेल मंत्रालय के वेबसाइट पर  लगा देना चाहिए| खेलो मे खिलाड़ी और प्रोफेशनल स्पोर्ट्स मॅनेज्मेंट के लोगो को लाना पड़ेगा| नेता देश की नीति बनाए ना की खेल संस्थाओ पर कुंडली मारकर बैठे|
ये देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की commonwealth games के समय इतना बेहतर व्यवस्था Delhi मे बनायीं गयी  था| लेकिन उसे खेल यूनिवर्सिटी और हॉस्टिल घोषित करने के वजय हमारी सरकार ने 3600 करोर उसपर  लगे खर्च को वापस करने के लिए सारे घरो को बेच डाला|
जीतना एक आदत होती है| और अगले ओलिमपिक्स मे यदि हमे जीतना है तो हमे खेल और खिलाड़ी का आदर करना सीखना होगा| उन्हे आगे लाने के लिए सेल्फी नही इनफ्रास्ट्रक्चर देना होगा और सबसे ज़रूरी एक सॉफ- सुथरी खेल संस्था की स्थापना करना होगा|

(इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.)

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