क्या 27 साल बाद लखनऊ लौटेगी कांग्रेस?

क्या 27 साल बाद लखनऊ लौटेगी कांग्रेस?

Overview

  • R Pandey

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजकल बदलाव की बयार है। एक हफ्ते के अंतराल में कांग्रेस ने दो बार प्रदेश की राजनीति को हिला दिया है पर सवाल यह है कि क्या लखनऊ और फिर बनारस में कांग्रेस का प्रदर्शन केवल एक संयोग था या सचमुच एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत है।

इस बदलाव की शुरुआत 2014 के लोकसभा चुनाव में हुई थी जब प्रदेश की जनता ने सारे पुरानें बंधनों को तोडकर भाजपा का समर्थन किया था। दो साल बाद, भाजपा ने विकास का दामन छोड, धार्मिक उनमाद का सहारा लेने कि एक बड़ी भूल की है। सपा और बसपा, दोनो ही विकास के मामले में पहले ही फेल साबित हो चुके थे, इसलिए कांग्रेस के पास विकास कार्ड़ के भरोसे चुनावी वैतरणी पार करनें का सुनहरा मौका है।

उत्तर प्रदेश काफी समय से एक नई राजनीति का इंतेजार कर रहा है। माया-मुलायम के चक्रव्यूह में फंसा उत्तर प्रदेश ने नौजवान अखिलेश यादव पर दाव लगाया पर चाचाओं से घिरे अखिलेश कुछ खास नहीं कर पाए। कागज पर भले ही वो सरकार के मुखिया रहें हों पर सबको मालूम था कि चलती उनके चाचाओं की ही थी।

 

लोकसभा चुनाव आते-आते अखिलेश का जादू उतर चुका था और चाचाओं के चक्कर से बचकर 2014 में उत्तर प्रदेश नरेन्द्र मोदी की शरण में गया। मोदी प्रचार के मामले में इतना आगे थे कि चुनाव शुरु होने से पहले ही सबको मालूम था कि दिल्ली में भाजपा की सरकार बनना लगभग तय था।

लोक सभा चुनाव में मोदी नें आगरा में एक जनसभा में कहा था कि उनकी सरकार हर साल 2 करोड़ युवाओं को नौकरी देगी। विकास को तरस रहे उत्तर प्रदेश के युवा को मोदी जी में एक ऐसा विकास पुरुष नज़र आया जिसने उनकी मूल समस्या को उठाया।

एक के बाद एक तूफानी दौरों में मोदी जी नें मंहगाई, बेरोजगारी, जरजर शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा उठाया और पूरा प्रदेश उनके पीछे हो लिया। जाति और संप्रदाय के बंधन तोड़, लोग विकास की तलाश में मोदी जी को पीछे हो लिए और भाजपा और उनके सहयोगी 80 में से 73 सीटों पर काबिज़ हो गए।

 

Categories: Opinion