यूपी: कब आएंगे नेहरु की जन्मस्थली के अच्छे दिन ?

यूपी: कब आएंगे नेहरु की जन्मस्थली के अच्छे दिन ?

इलाहाबाद:  देवरिया से दिल्ली तक की किसान यात्रा के तहत कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बुधवार को अपने पुरखों के शहर इलाहाबाद आ रहे हैं. यहां वह नेहरू-गांधी परिवार के पैतृक आवास स्वराज भवन में ही रात बिताएंगे और अगले दिन शहर की सड़कों पर रोड शो करेंगे.

ज़ाहिर है दो दिनों तक यहां होने वाले कार्यक्रमों के दौरान राहुल इलाहाबाद से अपने पुरखों के रिश्तों की दुहाई देते हुए लोगों से वोट और स्पोर्ट की अपील भी करेंगे. राहुल गांधी का काफिला उस चौक इलाके से भी गुजरना है, जिसके मीरगंज मोहल्ले में उनके परनाना और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म हुआ था.

रेड लाईट एरिया में तब्दील हुआ मीरगंज मोहल्ला

लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि मीरगंज मोहल्ला अब रेड लाईट एरिया में तब्दील हो गया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी नेहरु की जन्मस्थली इलाहाबाद के मीरगंज मोहल्ले में चल रहे जिस्मफरोशी के बाजार को हटाने के लिए कोई पहल करेंगे ?

जिस्मफरोशी के बाजार में तब्दील नेहरु की जन्मस्थली

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 14 नवम्बर 1889 को इलाहाबाद के चौक इलाके की जिस मीरगंज की गली में जन्म लेकर अपने बचपन के दिन बिताए थे, उसकी पहचान अब उनकी जन्मस्थली के तौर पर नहीं, बल्कि यूपी में जिस्मफरोशी के सबसे बड़े बाजार के तौर पर होती है.

इस मीरगंज इलाके से गुजरना तो दूर, कोई भी शरीफ आदमी इस मोहल्ले का नाम तक लेना पसंद नहीं करता. नेहरू की जन्म स्थली किस कदर जिस्मफरोशी के बाजार में तब्दील हो चुकी है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे मीरगंज मोहल्ले में शायद ही कोई ऐसा घर हो, जहां गर्म गोश्त का कारोबार खुलेआम न होता हो.

मीरगंज की दर्जन भर से ज़्यादा गलियां और इसके आस-पास के दूसरे इलाके चौबीसों घंटे जिस्मफरोशी करने वाली तवायफों और उनके पास आने वाले ग्राहकों की भीड़ से गुलजार रहते हैं. अनुमान के मुताबिक़ मीरगंज मोहल्ले में दो-चार या दस बीस नहीं, बल्कि डेढ़ हजार से ज़्यादा महिलाएं जिस्मफरोशी का धंधा करती हैं.

किराए की हवेली में खोली थी नेहरू ने आंखें

जवाहर लाल नेहरू के पिता मोती लाल नेहरू 1886 में हाईकोर्ट में वकालत के सिलसिले में आगरा से कानपुर होते हुए इलाहाबाद शिफ्ट हो गए थे. तब उन्होंने चौक इलाके से सटे हुए मीरगंज मोहल्ले में किराए के एक मकान को अपना आशियाना बनाया. मीरगंज को उस वक्त मीर साहब की सरांय के तौर पर जाना जाता था.

मोतीलाल नेहरू ने जिस मकान को किराए पर लिया, वह हवेलीनुमा पुराना बंगला था. इसमें मकान मालिक समेत कुछ दूसरे किरायेदार भी रहते थे. 14 नवम्बर 1889 को मीरगंज इलाके के इसी मकान में पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म हुआ और उन्होंने अपने बचपन के दस बरस भी यहीं बिताए थे. बाद में 1899 में मोतीलाल नेहरू ने चर्चलेन इलाके में एक हवेली को खरीदा था, जो आज स्वराज भवन और आनंद भवन के नाम से नेहरू-गांधी परिवार की विरासत के तौर पर मौजूद है.

हालांकि मोतीलाल नेहरू पहले मीरगंज इलाके की उसी हवेली को खरीदना चाहते थे, जिसमें पंडित नेहरू का जन्म हुआ था, लेकिन उसके मालिक उसे बेचने को तैयार नहीं थे. 1931 में नेहरू की जन्मस्थली के जर्जर होने के बाद नगर पालिका ने उस इमारत को गिरा दिया तो उसके कई टुकड़े हुए और उसके हिस्से कई बार बेचे व खरीदे गए.

पहले मुजरे की शुरुआत हुई फिर सजने लगा जिस्मफरोशी का बाजार

चालीस और पचास के दशक में मीरगंज की एक हवेली में शाम के वक्त मुजरे का चलन शुरू हुआ. कुछ दिनों बाद इलाके की कई इमारतों में बाहर से आकर बसीं तवायफें मुजरा करने लगीं. यहां हर रोज़ शाम को महफ़िल सजती हैं, जिसमें तमाम रसूखदार लोग दिल बहलाने के लिए आते थे.

साठ के दशक में मुजरे की महफ़िल जिस्मफरोशी में तब्दील होने लगी और कुछ ही बरसों बाद इस मीरगंज की पहचान यूपी में जिस्मफरोशी के सबसे बड़े बाजार के तौर पर होने लगी. आज कोई भी शरीफ आदमी मीरगंज के आस-पास के इलाके से भी गुजरना पसंद नहीं करता.

ज़्यादातर वक्त सत्ता में रहे कांग्रेसी, फिर भी नहीं ली कोई सुध

आज़ाद भारत में ज़्यादातर वक्त कांग्रेस का ही राज रहा. शुरुआती चालीस सालों में यूपी में भी कांग्रेस की ही सत्ता रही. इतना ही नही इलाहाबाद में ज़्यादातर मेयर अब भी कांग्रेस पार्टी के ही होते हैं, लेकिन न तो नेहरू-गांधी परिवार के लोगों और न ही कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने कभी नेहरू की इस सबसे बड़ी पहचान पर लगे बदनुमा दाग को बदलने की कोई पहल की. जिस इलाके की पहचान आज़ादी की लड़ाई के नायक और देश के पहले प्रधानमंत्री की जन्मस्थली के तौर पर होनी चाहिए थी. जिस गली को राष्ट्रीय स्मारक के तौर पर घोषित होना चाहिए था, उसकी यह हालत उन लाखों कांग्रेसियों के मुंह पर भी ज़ोर का तमाचा है, जो खुद को नेहरू का फालोअर बताकर उनकी विरासत के नाम पर अपनी सियासी रोटियां चमकाते हैं.

पंद्रह सितम्बर को राहुल गांधी इलाहाबाद के जिन इलाकों में रोड शो करेंगे, उनमे उस मीरगंज मोहल्ले की सड़क भी शामिल है, जहां उनके परनाना का जन्म हुआ था. उनका बचपन बीता था और जिसकी पहचान अब नेहरू की जन्मस्थली के तौर पर नहीं बल्कि जिस्मफरोशी के बड़े बाजार के रूप में होती है.

सवाल यह उठता है कि मौके-बेमौके अपने पुरखों का नाम लेकर उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करने वाले राहुल गांधी क्या अब जिस्मफरोशी के इस बाजार को बंद कराने की पहल करेंगे.

Courtesy: ABP News

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