उत्तरप्रदेश चुनाव- क्या फिर से मोदी के कंधो से चलेगी भाजपा की बंदूक? किस पार्टी की है कितनी तैयारी?

उत्तरप्रदेश चुनाव- क्या फिर से मोदी के कंधो से चलेगी भाजपा की बंदूक? किस पार्टी की है कितनी तैयारी?
  • निशांत

बाकी पार्टियों की धीमी शुरुआत होने के बाद भी राहुल गाँधी की खाट सभा ने यू. पी. के आगामी चुनाव का बिगुल तो बजा ही दिया है l अगले साल 2017 मे होने वाले यू. पी. विधानसभा चुनाव को 2019 मे होने वाले लोकसभा चुनाव के सेमिफाइनाल की तरह देखा जा रहा है l कॉंग्रेस ने यह बात अच्छे से समझते हुए ज़ोर-शोर से चुनाव की तायारी शुरू कर दी हैl
पिछली लोकसभा चुनाव के नतीजों से यह तो साफ हो गया था की यू. पी. की राजनीति में ऊँट किस करवट बैठेगा इसका अनुमान पहले से लगाना काफ़ी मुश्किल हैI जिस प्रदेश में बरसों से जातिवाद की राजनीति होती आई है वहाँ भाजपा का काफ़ी अंतर से जीतना बहुत लोगों के लिए आश्चर्यजनक था l राजनीतिक जानकारों का तो यह भी मानना था की यू. पी. की जनता लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव का अंतर अच्छे से समझ चुकी थी और जातिवाद की राजनीति से हटकर जनता ने मोदी के नाम पर मोहर लगाई थी, पर बिना ये वादा किये कि वो 2017 के यू. पी. विधानसभा के चुनाव में फिर से भा. जा. पा. को वोट देंगेl मोदी के विकास के वादे की लहर पर सवार यू. पी. की जनता ने वोट भा. जा. पा. को नहीं, मोदी को दिया था I यह बात पार्टी प्रमुख अमित शाह के लिए एक सिर दर्द का कारण बन सकती है क्योंकि लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद भी 2017 का चुनाव भाजपा के लिए बहुत आसान नहीं होगाI
किसी भी पार्टी को पहले से विजेता के रूप मे देखना मुश्किल होगा पर किस पार्टी की कितनी तैयारी है यह समझने की कोशिश की जा सकती हैl इसे समझने की पहली कड़ी में सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टियों के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और पार्टी के द्वारा प्रस्तावित किए चहरों पर चर्चा करना ज़रूरी हैI
सपा की तैयारी का जायज़ा लिया जाए तो यह साफ दिख रहा है की सत्ता मे होने के बावजूद भी पार्टी में थोड़ी बेचैनी दिख रही है l जल्दबाज़ी मे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विद्यार्थियों को फ्री स्मार्ट-फ़ोन देने का वादा तो कर दिया पर यह वक्त ही बताएगा कि फ्री लैपटॉप और फ़ोन वाली राजनीति पार्टी को वापस सत्ता मे ला सकती है या नही I ध्यान देने वाली बात यह है की 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के बहतरीन प्रदर्शन के बाद भी 2014 लोक सभा चुनाव में पार्टी केवल वही 5 सीट जीत पाई थी जहाँ पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव खुद या उनके परिवार के ही सदस्य चुनाव लड़े थे I सपा का अपना पारंपरिक वोट बैंक माने जाने वाला यादव वोट भी विभाजित हुआ था I अभी की स्थिति पर गौर किया जाए तो सपा की मुश्किले पार्टी में आज़म ख़ान को लेकर चल रहे तनाव को देखते हुए भी बड़ती दिख रही हैंl पिछले साप्ताह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का राहुल गाँधी से दोस्ती बढ़ाने का बयान भी उनके कमज़ोर हुए आत्मविश्वास की ओर इशारा करता हैl यह बात ज़ाहिर है की पार्टी को अपनी सत्ता बचाने के लिए अभी काफ़ी मेहनत करने की ज़रूरत है और इस सब के बीच पार्टी परिवार में मुलायम-अखिलेश- शिवपाल यादव के बीच में चल रही खींचातानी भी पार्टी के लिए इस समय किसी झटके से कम नहीं हैl चुनाव से ठीक पहले इस तरह की खींचतान ग़लत संदेश भेजने के साथ-साथ पार्टी की कार्यकर्ताओं का भी उत्साह कम करती हैl रही बात आगामी चुनाव के लिए पार्टी के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी की, तो पार्टी ने अभी तक नाम की घोषणा तो नहीं की है परंतु अखिलेश यादव के अलावा किसी और का नाम आगे आने की संभावना ना के बराबर ही हैI
दूसरी तरफ अगर बसपा की तरफ ध्यान दिया जाए तो उधर भी मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हर बार की तरह मायावती ही मानी जा रही हैं, हालाँकि पार्टी ने अभी घोषित नहीं किया हैI देखा जाए तो बस्पा की हालत सबसे ज़यादा नाज़ुक मानी जा रही हैl भले ही सपा की गलतियों का सबसे अधिक लाभ बसपा को ही मिलता हुआ दिख रहा है पर बसपा को यू. पी. की राजनीति में अपनी वापसी के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगीl लगातार दो चुनाव मे बेहद खराब प्रदर्शन करने के बाद बसपा को हर हाल में वापसी कर अपनी साख यू.पी. में फिर से जमानी होगी l 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे ज़्यादा नुकसान बसपा का ही हुआ था l पिछले लोकसभा चुनाव मे पार्टी अपना ख़ाता भी नही खोल पाई थी और अगर वोट-शेयर के हिसाब से भी देखें तो मोदी की जीत का सबसे अधिक नुकसान बसपा को ही उठाना पड़ा था l बसपा के अपने पारंपरिक वोट बैंक माने जाने वाले जाटव और अन्य दलित वोट में पिछले चुनाव के मुक़ाबले कुल 16 प्रतिशत (जाटव वोट) और 35 प्रतिशत (अन्य दलित वोट) में गिरावट दिखी और आँकड़ो की माने तो यही वोट सीधे तौर पर मोदी की यू. पी. में जीत का कारण बना l राजनीतिक जानकारों की माने तो पार्टी प्रमुख मायावती ने मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर पानी फेरने के लिए सोच समझ कर अपनी तैयारी कम की थी ताकि दलित वोट भाजपा. के पक्ष में जाकर मुलायम सिंह के दावे को और कमज़ोर कर देl पर वजह कुछ भी रही हो,बसपा को अपना वोट बैंक वापस पाने के लिए बहुत तैयारी करनी पड़ेगी, केवल सपा की ग़लतियों का फायदा पाने के भरोसे बैठ कर काम नहीं चलेगा l कॉंग्रेस के मुक़ाबले देखा जाए तो बसपा चुनाव की तैयारी में पीछे ही दिख रही है l यदि ब.स.पा. इस चुनाव में भी खराब प्रदर्शन करती है तो यू.पी. की राजनीति में अपना अस्तित्व बनाए रखने में बसपा को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा l
अगर कॉंग्रेस की तरफ ध्यान दिया जाए तो 2019 की दृष्टि से यह चुनाव पार्टी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है l इस चुनाव का सीधा असर अगले लोक सभा चुनाव पर पड़ने वाला है l सभी पार्टियों के मुक़ाबले कॉंग्रेस ने सबसे पहले इस बात को समझा है और अभी से चुनाव की तैयारी में पूरी जान लगा दी है l इस चुनाव की ज़िम्मेदारी पार्टी की बड़े नेता राहुल गाँधी ने स्वयं अपने कंधो पर ली है और यू. पी. के जिलों में जाकर खाट-सभा की शुरुआत कर दी है l यू.पी. के इस महाभारत में राहुल गाँधी नये नहीं हैं l वह 2009 के लोक सभा चुनाव में भी शानदार जीत हासिल कर चुके हैंl 2012 के विधानसभा चुनाव में भी अच्छी शुरुआत होने के बाद भी कॉंग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था, पर इस बार कॉंग्रेस वही ग़लती दोहराती नहीं दिख रही है I कॉंग्रेस 27 साल के बाद शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़ रही है l शीला दीक्षित के आने से कांग्रेस को यू.पी. प्रदेश स्तर पर एक साफ सुथरी छवि का नेता मिल गया है l शीला दीक्षित भी यू. पी. की राजनीति में नयी नहीं हैं l पड़ोसी प्रदेश दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रहने से पहले वह राजीव गाँधी की काबिनेट में मंत्री भी रह चुकी हैं l काफ़ी लोगो को यह जानकारी नहीं है की वह यू. पी. के कन्नौज की सीट से लोकसभा का चुनाव भी जीत चुकी हैं l जिस प्रदेश मे बरसों से जातिवाद की राजनीति चली आ रही है वहाँ यू.पी. के दिग्गज ब्राह्मण नेता उमा शंकर दीक्षित की बहू शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार चुनना कॉंग्रेस के लिए हुकुम का इक्का साबित हो सकता है l देखना यह होगा की क्या शीला दीक्षित का पड़ोसी प्रदेश दिल्ली में किया हुआ विकास का कार्य यू. पी. में मोदी के फीके पड़ते हुए विकास के चेहरे पर हावी हो पाता है या नहीं l
भाजपा की तरफ देखा जाए तो भाजपा के लिए भी यह चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण रहने वाला है l 2014 के चुनाव में यू. पी. मे शानदार प्रदर्शन के बाद भाजपा की आन का सवाल यू. पी. बन चुका है l यह बात इसीलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी भी यू. पी. के बनारस से चुनाव जीते हैं l 2012 विधानसभा चुनाव के मुक़ाबले 2014 लोकसभा चुनाव में अपना 24.8 प्रतिशत वोट शेयर बड़ाने के बाद भी भा. जा. पा. के लिए यू. पी. यह सफ़र आसान नहीं रहेगा l सबसे बड़ी मुश्किल सरकार के लिए मुख्यमंत्री पद का दावेदार चुनने मे होगी l पार्टी के पास ऐसा कोई प्रदेश स्तर का नेता नहीं है जिसे वह विकास के चहेरे की तरह पेश कर सके l ऐसे मे भाजपा की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं l राजनीतिक जानकारों की माने तो यू. पी. में फिर से मोदी के ही चेहरे पर चुनाव लड़ेगी भाजपाl ऐसा करना पार्टी के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है l बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ना पार्टी के लिए भारी साबित हुआ था l ऐसे में यदि 2019 के चुनाव से पहले यू. पी. चुनाव भाजपा हार जाती है तो इससे मोदी के चहेरे पर काफ़ी असर पड़ेगा l भाजपा ऐसा कभी नही चाहेगी की उसके 2019 के लोकसभा चुनाव के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की छवि यू.पी. चुनाव की वजह से फीकी पड़ जाए l परंतु भाजपा के लिए अभी इसका विकल्प ढूंढना मुश्किल ही लग रहा है l
इस महाभारत के बीच यू.पी. की जनता अपनी मुट्ठी बंद करके बैठी है और हर पार्टी की हरकत पर नज़र बनाए हुए है l देखना यह है की जब जनता की मुट्ठी खुलेगी तो किस पार्टी के पक्ष में मतदान होगा l पिछले 27 सालों में यू. पी. की राजनीति ने बहुत उतार- चढ़ाव देखे हैं और चार बार बसपा को, तीन बार सपा को और एक बार भाजपा को मौका दिया है l यह देखना दिलचस्प होगा की क्या कॉंग्रेस को यू.पी. की जनता एक मौका देती है या नहीं l

(इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

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