जजों के चयन के लिए ऑटोनोमस बॉडी बनाने की मांग सुप्रीम कोर्ट से खारिज

जजों के चयन के लिए ऑटोनोमस बॉडी बनाने की मांग सुप्रीम कोर्ट से खारिज

नई दिल्ली: जजों के चयन के लिए एक ऑटोनोमस बॉडी बनाने की मांग सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. याचिका में एक ऐसी संस्था बनाने की मांग की गई थी, जिसमें सरकार या न्यायपालिका का कोई दखल न हो. याचिका को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना संविधान को बदलना होगा. कोर्ट ऐसा नहीं कर सकती.

नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ट्रांसपेरेंसी एंड रिफॉर्म्स नाम की संस्था ने मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था को खत्म करने की मांग की थी. इस व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ जज हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लिए जजों का चयन करते हैं.

संस्था की दलील थी कि कॉलेजियम सिस्टम में सिर्फ जजों के रिश्तेदार और वरिष्ठ वकील ही जज बनते हैं. तमाम काबिल वकीलों के नाम पर विचार तक नहीं किया जाता.

गौरतलब है कि संविधान में जजों की नियुक्ति ‘चीफ जस्टिस की सलाह से सरकार द्वारा’ करने का प्रावधान है. 90 के दशक तक सरकार अपनी तरफ से जज का चयन करती थी. नियुक्ति से पहले चीफ जस्टिस को सूचना देकर उनकी सहमति ली जाती थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने दो फैसलों के जरिए चीफ जस्टिस की मंजूरी को सर्वोच्च करार दिया.

इन फैसलों का असर ये हुआ कि चयन का काम सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ जजों की कॉलेजियम करने लगी. सरकार की भूमिका कॉलेजियम की तरफ से चुने हुए उम्मीदवार को नियुक्त करने भर की रह गई.

पुरानी व्यवस्था सरकार की बड़ी भूमिका के चलते बुरी मानी जाती थी. जबकि, कॉलेजियम व्यवस्था बड़े पैमाने पर जजों के रिश्तेदारों के चयन और पारदर्शिता की कमी के चलते सवालों के घेरे में रहती है.

नेशनल लॉयर्स कैंपेन की याचिका में जजों और सरकार के दखल से अलग स्वायत्त संस्था बनाने की मांग की थी लेकिन इस मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है.

इससे पहले संसद ने जजों, कानून मंत्री और दो स्वतंत्र व्यक्तियों वाले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के गठन का कानून पारित किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपलिका की स्वतंत्रता में दखल मानते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया था. इस वजह से कॉलेजियम व्यवस्था फिर से लागू हो गई है.

 Courtesy: ABP
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