उरी हमला : मोदी सरकार की विफलताओ का अंजाम

उरी हमला : मोदी सरकार की विफलताओ का अंजाम

-अबिनाश चौधरी

उरी जैसे दुखद घटना के बाद सामाजिक और राजनीतिक दूरिया को मिटाते हुए कोई भी देश एक साथ खड़ा हो जाता है| लेकिन यह पहली बार हो रहा है की इस दुख की घड़ी में हमारे मतभेद सामने आ रहे है| लेकिन इस सबके लिए ज़िम्मेदार भी मोदी खुद है| मकड़ी का जाल और मोदी सरकार की चाल एक जैसी है| दोनों अपने ही बुने ताने बाने में फसते जाते है|

उरी हमले मे मोदी सरकार की प्रमुख 3 चूक रही है- विदेश नीति, कश्मीर नीति और सेना नीति|

विदेश नीति-

2014 मे  प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होने देश की सुरक्षा को ध्यान मे रखकर काम करने के बजाय बड़े बड़े नारे और विदेश यात्रा पर ध्यान दिया| Make In India के नारे देने से पहले उन्हे  Make India पर ध्यान देना चाहिए था- ये भाजपा के ही पूर्व विदेश और वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का कहना है| पिछले दो सालो मे विदेश नीति मुख्यतः स्वयम् प्रधानमंत्री और उनके सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल देख रहे है| ये बताना ज़रूरी है की अजीत डोवल एक  अच्छे IB के ऑफीसर थे लेकिन विदेश नीति मे उनकी कोई समझ नही है|

विदेश मंत्रालय और भारतीय विदेश सेवा केवल मूकदार्शक बन कर रह गयी है| इसका नमूना हमे दो बार देखने को मिला- प्रधानमंत्री जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के नवासी की शादी पर अचानक से लाहोर पहुचे तो विदेश मंत्रालय को कोई खबर नही थी| दूसरा मौका कल आया जब उरी के बाद CCS की अहम बैठक मे विदेश मंत्री को नही बुलाया गया| बाद मे प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से बतलाया गया की उन्हे लगा वो UNGA के मीटिंग के लिए विदेश जा चुकी है| लेकिन ये बात किसी को हजम नही होगी|  पिछले दो सालो मे हमने देखा है किस तरह प्रधानमंत्री अपने विदेश नीति मे विदेश मंत्री सुष्मा स्वराज को दरकिनार कर रखे है, और डोवल विदेश नीति चला रहे है उससे तो यही लगता है की सुषमा स्वराज की ज़रूरत ही नही है उनको, जबकि इस संकट की घारी मे सुषमा स्वराज मोदी सरकार मे सबसे अहम भूमिका निभा सकती थी|

कश्मीर नीति:

कश्मीर नीति मोदी सरकार की गले की फास बनती जा रही है| 1990 के बाद पहली बार इतनी खराब स्थिति कश्मीर मे है| 70 दिन से ज़्यादा हो गये कर्फ्यू लगे हुए| 1990 के बाद से पहली बार इतना लंबा समय कश्मोर मे कर्फ्यू लगा है| अलगाववादी हिंसा मे कई  जान जा चुकी है और हज़ारो की तादाद मे घायल है| लेकिन दिल्ली मे मानो इसका कोई असर ही ना हो| सर्वदलीय टीम को कश्मीर भेजना एक खानापूर्ति जैसी व्यवस्था थी|

लाल किले से अपने भाषण के दौरान जिस तरह मोदी ने बलूचिस्तान का ज़िक्र करके अपने ख़ुफ़िया तन्त्र का राज खोल करके राजनैतिक लाभ उठाने की कोशिश की वो काफ़ी दुखद है| कश्मीर की समस्या को यदि जल्द ही नही सुलझाया गया तो सेना या ख़ुफ़िया तन्त्र उरी जैसी घटना को रोकने मे असफल होगे| कसमीर मे अमन और शांति का माहौल पाकिस्तान और दहसतगर्दीयो की कमर तोर देता है| इसका उधारण आप 2010 से 2013 की कश्मीर मे मिल जाएगा| ये वो वक़्त था जब कांग्रेस की सरकार सिर्फ़ शांति कायम करने और कश्मीर के अवाम को तरक्की के रास्ते पर लाने की कोशिश कर रही थी| कश्मीर बदल रहा था, भारत, पाकिस्तान और दहसातगर्दियो के आतंक की नीति की कमर तोड़ रखी थी| युवा नौकरी और रोज़गार चाहते थे बंदूक सबने नीचे रख दिया था| लेकिन जब से भाजपा और पीडीपी की सरकार बनी है मानो कश्मीर पर ग्रहण सा लग गया है|

 

सेना नीति-

लेकिन जो सबसे ज़्यादा चौकाने वाली बात है और दबी ज़बान मे सेना के लोग बता रहे है वो है मोदी सरकार का लगातार रक्षा का बजट कम करना|  2016-17 के बजट मे वित मंत्री ने मात्र 1.65% जीडीपी का रक्षाको दिया है| ये 1962 के बाद सबसे कम रक्षा बजट है| भाजपा जो देस प्रेम का दंभ भूलना कभी नही भूलती उनका ये हाल है|

उरी हमले के दो दिन बीत चुके है लेकिन अभी तक तीनो सेना प्रमुख की बैठक नही हुई है| यदि आप पाकिस्तान और उनके द्वारा पाले गये आतंकवादी को मूहतोड़ जवाब देना चाहते है तो आपके सेना प्रमुख को रणनीति तैयार करनी पड़ेगी|

2002 के कलुचक हमले के बाद ये पहला मौका है जब सेना के जवान इतने तादाद मे मारे गये है| ये सोचने का विषय है की पिछले 14 साल मे जो नही हुआ वो अब फिर कैसे शुरू हो गया| पठानकोट मे जिस तरह हमारे सेना का मनोबल गिरा उससे हमने कोई सीख नही ली| सरकार ने जिस तरह ISI को भारत आकर पठानकोट जाने दिया वो काफ़ी दुखद था| मोदी सरकार और ख़ासकर अजीत डोवल की वो बिफ़लता का नमूना है|

(इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

Categories: Opinion