स्वच्छ भारत अभियान पर मोदी सरकार ने खुद फेरा झाड़ू

स्वच्छ भारत अभियान पर मोदी सरकार ने खुद फेरा झाड़ू

निशांत

जब प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता संभालते ही महात्मा गाँधी को श्रधांजलि देते हुए उनके नाम पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की तब ऐसा प्रतीत होने लगा था कि शायद मोदी जी ने अपनी राजनीति से ऊपर उठ कर महात्मा गाँधी को अपनाया है l पर आज की स्थिति पर गौर किया जाए तो हालात कुछ और ही बयान करते हैं l
स्वच्छ भारत अभियान को करीब से समझा जाए तो यह पता चलता की यह अभियान कॉंग्रेस के समय पर गाँव- गाँव मे चलने वाला निर्मल भारत अभियान का ही विस्तार है l निर्मल भारत अभियान वही अभियान है जिसका चहेरा मशहूर अभिनेत्री विद्या बालन रहीं हैं l इसी अभियान के तहत हर ग्राम में शौचालय बनाने की मुहीम चलाई गई थी और ग्रामवासियों को खुले में शौच ना करने के लिए प्रेरित किया गया था l मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इसी अभियान को स्वच्छ भारत अभियान के नाम से 2 अक्टूबर 2014 को फिर से लौन्च किया गया l इस बार इस अभियान को ग्राम के साथ साथ शहरों मे भी फैलने की कार्यनीती बनाई गई l यह इस अभियान की ख़ासियत थी की इसका विस्तार शहरों में किया जा रहा था और इस अभियान में जनता की भागीदारी पर और लोगों की ज़िम्मेदारी पर ख़ासा ज़ोर डाला जा रहा था l यह सोच सही मायने में महात्मा गाँधी के स्वराज के विचारों से ही मेल खाती थी l
पर अगर ज़मीनी हक़ीक़त पर गौर किया जाए तो हालात कुछ और ही बयान करते हैं l पिछले दिनों ऐसी कई तस्वीरें चर्चा में थी जिसमे भाजपा और केंद्र सरकार के दिग्गज नेता सड़क पर झाड़ू लगाते हुए दिखे थे l इन्हीं तस्वीरों के साथ वह तस्वीरें भी चर्चा में थी जिसमें यह साफ दिख रहा था की यह सब केवल एक आयोजित कार्यक्रम था जो फोटो निकालते ही ख़त्म हो गया l उदाहरण के तौर पर यह तस्वीर देखें l

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इन तस्वीरों से यह साफ़ ज़ाहिर होता है की यह अभियान केवल एक ‘सेल्फी अभियान’ बन के रह गया है l महात्मा गाँधी स्वच्छता को ही भगवान मानते थे l उनकी लिखी किताब हिंद स्वराज में यह उल्लेख किया हुआ है की जब भी वह किसी स्कूल के दौरे पर जाते थे तब वह सबसे पहले स्कूल के शौचालय का दौरा करते थे l शौचालय की स्थिति खराब होने पर वह खुद उसकी सफाई में लग जाते थे l इसके विपरीत अगर आज के नेताओं को देखा जाय तो वह अपना प्रचार करने के लिए पहले कर्मचारियों से थोड़ा कूड़ा मँगवाते हैं और उसको साफ करते हुए तस्वीर निकलवाते हैं l यह बात इन तस्वीरों से साफ प्रकट होती है l
पूरे देश का हाल जानने की ज़रूरत नही है, सिर्फ़ राजधानी दिल्ली जो विकास का केंद्र माना जाता है, उसी का हाल- बेहाल जान कर हम पूरे देश का हाल समझ सकते हैं l दिल्ली और आसपास के प्रदेशों में जिस तरह आज डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का कहर फैला हुआ है, यह साफ बताता है की दिल्ली प्रदेश जो की राजधानी है उसकी सफाई का क्या हाल है l प्रतिदिन दिल्ली में डेंगू और चिकनगुनिया से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है l स्वच्छ भारत अभियान की सफलता नगर पालिका के हाथों से हासिल की जा सकती थी l अच्छा होता अगर प्रधानमंत्री मोदी ने इस अभियान जिसमें उन्होने खुद जान डालने का प्रयास किया था, इसके तहत नगर पालिकाओं को मज़बूत किया होता l हालाँकि अमेरिका और भारत के हालात बहुत अलग हैं और किसी भी तरह से दोनो देशों की आपस में तुलना नही की जा सकती, पर अमेरिका से कुछ बातें सीखी जा सकती हैं l जब न्यू यॉर्क सिटी में 9/11 आतंकवादी हमला हुआ था, उस समय वहाँ के मेयर ने वहाँ हालात संभाले थे l वहाँ की नगर पालिका ने अपने कंधों पर सारी ज़िम्मेदारी ली थी l अमेरिका जैसे देश में नगर पालिका एक अहम भूमिका निभाती है पर यहाँ का हाल देखा जाय तो नगर पालिका के काम में अभी बहुत कमियाँ देखी जा सकती हैं l इसीलिए इस अभियान के तहत नगर पालिका को सशक्त करना बहुत फयदेमंद होगा l इसे और करीब से देखा जाए तो समझ में आता है की ज़ि.एस.टी. बिल लागू होते ही नगर पालिका और कमज़ोर होने वाली है l जी. एस. टी. के आने से नगर पालिका को जो टेक्स लेने का अधिकार था वह अधिकार अब प्रदेश सरकार के पास चला जाएगा l यू. पी. ए. सरकार ने अपने समय पर नगर पालिका को सशक्त करने के लिए संविधान में 72 और 73 संशोधन लाकर नगर पालिका को और ज़्यादा मज़बूत किया था, पर अब जी. एस. टी के आते ही प्रदेश सरकार और नगर पालिका में फंड को लेकर खींचतान और ज़्यादा बड़ जाएगी l वैसे तो भारत में ज़्यादातर नगर पालिकाएँ खराब स्थिति में हैं, चाहे वो पुणे हो या मुंबई, पर राजधानी दिल्ली की नरपालिका तो कमज़ोर होने के साथ साथ मुख्यमंत्री और एल. जी. की सियासत में भी पिसती नज़र आ रही है l
सरकार की तरफ से इन खामियों को समझते हुए हम नागरिकों को भी इसकी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी और इसका भागीदार बनना पड़ेगा l जनता के रवैये के बदलने से ही सरकार की बनाई नीतियों की सफलता सुनिश्चित की जा सकती है l जो नागरिक अपने घर की सफाई रख सकता है वह अपने मोहल्ले की सफाई सुनिश्चित करने का बेड़ा भी उठा सकता है l दिल्ली का जो नागरिक दिल्ली मेट्रो में पान-गुटका आदि नहीं थूकता वही नागरिक क्यों बिना किसी चिंता के सड़क और अन्य सार्वजनिक स्थान पर थूकने पर या कूड़ा डालने में संकोच नहीं करता? इन सवालों पर विचार और चर्चा करना बहुत ज़रूरी है, तभी महात्मा गाँधी के विचारों को फिर से जीवित किया जा सकता है l और इन सवालों पर विचार की शुरूआत स्कूल के स्तर पर ही की जानी चाहिए, तभी यह एक इंसान के व्यक्तित्व का हिस्सा बनेगा l दंड देना अलग बात है और मानसिकता बदलना अलग बात है l मानसिकता तभी बदली जा सकती है जब बचपन में ही इसकी शुरूआत की जाए l फिलहाल अगर आज की स्तिथि को देखा जाए तो सही मायनों में यह अभियान केवल एक प्रचार का पैंतरा बनकर रह गया है, और यह पैंतरा गाँधी और उनके विचारो के साथ धोखा है l

(इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.)

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