वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा- भारत के सब्र का इम्तहान न ले PAK, मोदी की बात ठुकराई तो अछूत देश बनकर रह जाएगा

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा- भारत के सब्र का इम्तहान न ले PAK, मोदी की बात ठुकराई तो अछूत देश बनकर रह जाएगा

वॉशिंगटन. उड़ी हमले के बाद पाकिस्तान को दुनियाभर में क्रिटिसाइज किया जा रहा है। अब अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने कहा है कि पाक, भारत की स्ट्रैटजिक पॉलिसी को लेकर उसका लंबे समय तक सब्र का इम्तहान नहीं ले सकता। अगर इस्लामाबाद, नरेंद्र मोदी का सहयोग करने का ऑफर ठुकराता है तो वह एक अछूत देश की तरह अलग-थलग पड़ जाएगा। ये भी लिखा कि नरेंद्र मोदी अभी संयम रखे हुए हैं लेकिन ये हमेशा नहीं रह सकता। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने और क्या लिखा…
– वॉल स्ट्रीट जर्नल ने मंगलवार को लिखा, ‘मोदी लगातार सुलह की कोशिशें कर रहे हैं लेकिन पाक आगे बढ़ने को तैयार नहीं है।’
– ‘अगर पाक मोदी के सहयोग के ऑफर को ठुकराता है तो वह वैश्विक बिरादरी में अलग-थलग पड़ जाएगा। अभी भी उसकी हालत कुछ ऐसी ही है।’
– ‘अगर पाकिस्तानी मिलिट्री सीमा पार से भारत में हथियार और आतंकी भेजती रहती है तो मोदी को कड़ी कार्रवाई करनी होगी।’
– जर्नल ने अपने ओपिनियन में ये भी लिखा, ‘आतंकवाद के मुद्दे पर भारत ने हमेशा अपना मॉरल ऊंचा रखा है। लेकिन पिछली कांग्रेस और बीजेपी सरकारें इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख रखने में नाकामयाब रहीं।’

‘पाक कभी भी प्रॉक्सी वॉर को लेकर जवाबदारी नहीं लेगा’
– वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, ‘पाक की हमेशा से रणनीतियों को खारिज करने की पॉलिसी रही है। इसका मतलब है कि पाकिस्तान कभी भी प्रॉक्सी वॉर को लेकर जवाबदेह नहीं होगा। उसके लिए ये मायने नहीं रखता कि आतंकी हमले कितने घातक होते हैं।’
– मोदी की तारीफ करते हुए जर्नल ने लिखा, ‘पाकिस्तान पर हमला करने की जगह उन्होंने उसे इंटरनेशनल लेवल पर अलग-थलग करने की पॉलिसी अपनाई। उन्होंने कहा कि ये तब तक चलता रहेगा जब तक पाक मिलिट्री आतंकी गुटों को समर्थन देना बंद नहीं कर देतीं।’
– ‘मोदी एक तरफ 1960 में हुए सिंधु जल समझौते को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए हैं वहीं दूसरी तरफ भारत, पाकिस्तान को दिया सबसे पसंदीदा मुल्क का दर्जा भी वापस ले सकता है।’

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
– स्टिमसन सेंटर के साउथ एशिया प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर समीर लालवानी का भी फॉरेन अफेयर्स में आर्टिकल छपा है। इसके मुताबिक, ‘उड़ी हमले के बाद भारतीय नेताओं में एक नाराजगी है। वे मिलिट्री कार्रवाई को लेकर भी स्ट्रैटजी बना रहे हैं। इसको लेकर लंबी बहसें हो सकती हैं।’
– ‘भारत बदले की कार्रवाई के चलते एक बड़ा हमला कर सकता है लेकिन ये साफ नहीं है कि सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता, इमेज और हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?’
– ‘2009 के इलेक्शन और हाल के एनालिसिस बताते है कि भारत के प्रधानमंत्रियों को बड़े हमलों के बाद मिलिट्री कार्रवाई को लेकर कोई बड़ी राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी पड़ी।’
– ‘भारत ने अपने विरोधियों को सजा देने के कई मौके गंवाए। इसके बजाय उसने आसान रवैया अपनाया और दुश्मन के एक्टिविटीज को क्रिटिसाइज किया।’

Courtesy: Bhaskar

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