यू. पी. में 2013 से धीमी आँच पर पकाई जा रही है सांप्रदायिकता की खिचड़ी?

यू. पी. में 2013 से धीमी आँच पर पकाई जा रही है सांप्रदायिकता की खिचड़ी?

उत्तर प्रदेश में जो आज के दौर में संप्रदायिक घटनाए सामने आती हैं उनका स्वरूप 1992 की घटना से बहुत अलग है l उस समय जो नारा था “एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो” इस तरह का नारा अब सुनाई नहीं देता l आज कल के दौर की संप्रदायिक घटनाओं को करीब से देखा जाए तो समझ में आता है कि अब जो घटनाए होती हैं वह बहुत विशाल स्तर पर और बड़े नारों के साथ नहीं होती l इन घटनाओं को धीमी आँच पर पकाया जाता है जिसका असर काफ़ी लंबे समय तक रहता है चाहे वह एक विशाल रूप ना भी ले l

ऐसा लगता है कि अब इन घटनाओं को स्वरूप देने वाले शरारती तत्वों को यह भी समझ आ गया है कि शहरों में अपने मंसूबों को साकार करना बेहद मुश्किल है, इसीलिए इन घटनाओं का ज़्यादा प्रभाव अब ग्रामीण इलाक़ों में देखने को मिलता है l भले ही ऐसी कोशिश लगती है कि घटना का स्वरूप छोटा ही रहे और जान- माल का नुकसान इतना ना हो की वह पूरे देश का मुद्दा बने, पर कभी कभी यह छोटी घटनाओं का ताना- बना इतना गहरा रूप ले लेता है की उसे रोकना नामुमकिन हो जाता है, जैसे कि मुज़्ज़फरनगर (2013) में देखने को मिला l इसीलिए इस ख़तरे को समझना और चुनाव से पहले इस पर चर्चा करना बहुत ज़रूरी हो जाता है ताकि लोग पहले से सतर्क रहें और अपनी सोच- भूज से काम लें l

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प्रतिष्टित अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के हाल हीं में एक लेख में यू. पी. में पिछले कुछ सालों में होने वाली घटनाओं का विवरण किया है l पुलिस रेकॉर्ड के हिसाब से यू. पी. में संप्रदायिक घटनाओं में असाधारण तौर पर बदोतरि देखी गई है l शहरों में जहाँ लोग ज़्यादातर नौकरी की तलाश में पहुँचते हैं वह ऐसी घटना के बाद शहर छोड़ कर जा सकते हैं, पर अगर यह सांप्रदायिकता फैलने वाले ग्रामीण इलाक़ों में दंगा करवाने में कामयाब हो जाते हैं तो वह ना जाने कितनी पीडियों से बने हुए ताने बाने को नुकसान पहुचाते हैं और इसका खामियाज़ा आने वाली काई और पीडियों को उठना पड़ता है l यह आग ग्रामीण इलाक़ों मे काई ज़्यादा समय तक सुलगती है और रोज़ाना जीवन में आक्रामक प्रवृति को बड़वा देती है जो समय आने पर घातक रूप ले सकती है l

आँकड़ो की माने तो पश्चिमी यू. पी. में नाटाकिये रूप से इन घटनाओं की वृधि हुई है l 2011-2012 जब सपा ने यू. पी. मे सरकार बनाई थी तब से लेकर आज तक इस इलाक़े में संप्रादायक घटनाओं में तीन गुनाह वृधि देखी गई है और आज तक भी यह वृधि की रफ़्तार कायम है l इन घटनाओं में हर तरह के मुद्दे हैं l कुछ मुद्दे केवल छोटे सी बहस से शुरू हुए, कुछ सोच समझ कर बनाए गये जैसे मंदिर- मस्जिद में माँस के टुकड़ों का पाया जाना’ कुछ मुद्दे लव- जिहाद जैसे मुद्दों से बने जिसमे अपनी मर्ज़ी से शादी करने से लेकर छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे आरोप लगाना शामिल था l यह मुद्दे बड़ा रूप ना भी लें तो यह मुद्दे चुनाव में वोट के ध्रुवीकरण करने के लिए काफ़ी होते हैं l

हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत के दौरान एक राजनीतिक विशेषज्ञ ने बताया कि मुस्लिम समाज के प्रति संदेहवाद और हिंदुत्तवा के प्रति क़ौमपरस्ती, हिंदू समाज के वोट को एकत्रित कर देती है, जो साधारण हालत में जाती और क्षेत्रीय के आधार पर विभाजित हो सकते हैं l इसी तरह मुस्लिम समाज के कट्टरपंथियों को भी इसी तरह से फायेदा पहुँचता है l ऐसे में कट्टरपंथी पार्टियों के तथाकथित शरारती तत्वों के इन मुद्दों को हवा देने की संभावना बड़ जाती है l ऐसे में आम जनता को ही अपनी समझ से काम लेना होगा और अपने आप को विचारशील बनाना होगा l एक पुरानी कहावत है- “लम्हों ने खता की और सदियों ने सज़ा पाई!”

Graph by Hindustan Times (Source credit)