राहुल गाँधी की किसान यात्रा और उत्तर प्रदेश का चुनावी दंगल|

राहुल गाँधी की किसान यात्रा और उत्तर प्रदेश का चुनावी दंगल|

 

पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनाव जैसे जैसे नज़दीक आ रहे किसान का मुद्दा चर्चा का विषय बनता जा रहा है| गरीब किसानों के लिए ऋण माफी, स्वामीनाथन रिपोर्ट, उच्च एमएसपी और स्वतंत्र और सस्ती बिजली के पुराने चुनावी वादों को दोहराया जा रहा है| कांग्रेस की तरफ से पार्टी उपाध्यक्ष ने देवरिया से दिल्ली तक 47 दिन की किसान यात्रा कर राजनीति मे हड़कंप मचा दिया| बाकी सभी पार्टी को मज़बूर कर दिया की वो किसान की बात करे|

किसान कांग्रेस के परंपरागत वोटर माने जाते है| 2004 और 2009 की सफलता इसका गवाह है| 2009 की चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने जिस तरह किसानो का ऋण माफ़ किया उससे किसानो का लगाव कांग्रेस के प्रति और बढ़ा| लेकिन इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात थी केन्द्र की 10 साल की कांग्रेस सरकार द्वारा समर्थन मूल्य मे बढ़ोतरी हर साल| किसानो को इसका खूब लाभ मिला| ग्रामीण भारत की औसतन खर्च करने की ताक़त बढ़ी 10 साल मे|

इसके उलट जिस तरह से केंद्र की मोदी सरकार समर्थन मूल्य को कम किया है पिछले 3 सालो मे वो उसका ख़ामियाजा भुगत सकती है| किसानो के लिए कोई नयी योजना अभी तक नही आई है| काँग्रेस की सरकार आधार से किसान और खेती से जूरे सब्सिडी को जोड़ना शुरू किया था उसे अभी तक पूरा नही किया गया| किसानो के फसल की खरीद नही के बराबर हो रही है| कुल मिलाकर मोदी सरकार के पास कुछ भी नही है बताने को|

जहा तक अखिलेश यादव की उत्तर प्रदेश  सरकार की बात की जाए  तो उनकी भी हालत पतली नज़र आती है।

उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति गन्ना के खेतो से होकर गुजरती है| गन्ना मुख्यतःपश्चिम उत्तर प्रदेश के 9 ज़िलो की खेती है। यहाँ ये याद दिलाना बहुत ज़रूरी है की पश्चिम उत्तर प्रदेश को चीनी का कटोरा माना जाता है| लेकिन 2013 के बाद से इसे दंगा का कटोरा RSS-BJP ने बना दिया| ये SP और BSP को भी फ़ायदा पहुचता| इस इलाक़े मे मुख्यतः लोकदल पार्टी का दबदबा रहा है| यहा की घटना का सीधा असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पड़ता है लेकिन इसकी छति सिर्फ़ यहाँ के लोग खास कर किसान को होती है| 2014 के दंगो का नुकसान यहा के लोग ने उठाया लेकिन प्रदेश भर में राजनीतिके ध्रूवीकरण  का फ़ायदा भाजपा और सपा ने उठाया| सपा सरकार की दंगे ना रोकने की विफलता आज  गले की हड्डी बन गयी है| 2013 से लेकर अभी तक गन्ना- गुर के व्यपारी दंगे की मार से उबर नही पाए|

बार बार कोशिश के बावजूद यहा लोग अभी संयम बरते है| लेकिन भाजपा की मुश्किल इससे ज़्यादा है- 2014 की चुनावी जुमले| मोदी के वादे, चीनी मिल का बकाया देना और जाट आरक्षण| दोनो ही मुद्दे पे विफल रही है मोदी सरकार| जाट जाति के लोग काफ़ी नाराज़ है मोदी सरकार से| लेकिन उससे भी ज़्यादा नाराज़गी है चीनी मिल का बकाया पैसा वापस नही करना| एक नज़र दे तो सिर्फ़ 2015-16 मे 2276.95 करोड़ बाकी है किसान का पैसा चीनी मिलों के मलिक के पास| 2012 मे अखिलेश की सरकार जब आई थी उसके बाद से गन्ना का समर्थन मूल्य आज तक नही बढ़ाया गया है| सिर्फ़ शामली ज़िले मे 300  करोड़ से ज़्यादा बकाया है 3 चीनी मिलो के उपर किसानो का पैसा|

यद इसलिए राहुल गाँधी की किसान यात्रा जहा काँग्रेस के लिए खुशखबरी है वही भाजपा और सपा को काफ़ी जवाब देना पर रहा है| काँग्रेस अपनी खोई हुई ज़मीन किसान के सहारे खोज रही है तो मोदी सरकार और अखिलेश अपनी ज़मीन किसानो के बीच खो रहे हैं।