बीजेपी काे रोकने के लिए मुलायम का प्‍लान: महागठबंधन से 2017 ही नहीं, 2019 भी है टारगेट पर

बीजेपी काे रोकने के लिए मुलायम का प्‍लान: महागठबंधन से 2017 ही नहीं, 2019 भी है टारगेट पर

लखनऊ. सपा के रजत जयंती प्रोग्राम में एक बार फिर ‘जनता परिवार’ परिवार इकट्ठा हुआ। यहां यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में सपा को मजबूत करने और बीजेपी को सत्‍ता में आने से रोकने की शपथ ली गई। साथ ही 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने की बात कही गई। कहा जा रहा है कि इस तरह से मुलायम की नजर यूपी में होने वाले चुनाव के साथ 2019 लोकसभा चुनाव पर भी है। 2019 के लिए एक होने की जरूरत…

इस मौके पर आरएलडी चीफ अजित सिंह ने कहा, ‘हमें 2017 के साथ ही 2019 के लिए भी एक होने की जरूरत है।’

‘बीजेपी जैसी सांप्रदायिक ताकतें धर्म के नाम पर लोगों को बांटने का काम करती हैं। मुजफ्फरनगर और कैराना में हम ये देख चुके हैं।’

मुलायम ने क्‍या कहा?

बीजेपी को हराने के लिए महागठबंधन की ओर सं‍केत देते हुए मुलायम ने कहा, ‘मैंने व्‍यर्थ में इन राजनीतिक मित्रों को यहां नहीं बुलाया है।’
‘जिस तरह की समस्‍या से देश इस समय जूझ रहा है, उसके लिए हमारा एक होना जरूरी था। इसी वजह से मैंने सबके एक साथ आने का फैसला किया।’

बता दें, रजत जयंती समारोह में बिहार के सीएम नीतीश कुमार शामिल नहीं हुए थे।
इस प्रोग्राम में आरजेडी चीफ लालू प्रसाद, जेडीयू नेता शरद यादव, आईएनएलडी नेता अभय चौटाला और पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा मौजूद रहे।

2017 के साथ 2019 भी है टारगेट
रजत जयंती समारोह में सभी बड़े नेताओं का एक मंच पर साथ आना महागठबंधन की ओर ही इशारा करता है।
जानकारों का कहना है कि सपा इसलिए भी महागठबंधन की वकालत कर रही है, क्योंकि ये उसकी मजबूरी है।
मुलायम सिंह खुद कॉन्फिडेंट नहीं हैं कि वे अकेले दम पर फिर से यूपी की सत्ता में वापसी कर लेंगे।
यही वजह है कि वो वोटों के बिखराव को रोकने के लिए महागठबंधन चाहते हैं।
2017 के साथ उनका टारगेट 2019 लोकसभा चुनाव है, जिसकी रुपरेखा वे अभी से बनाना चाहते हैं।

कॉन्‍फिडेंट नहीं हैं मुलायम
पॉलिटिकिल एक्सपर्ट प्रोफेसर एके वर्मा कहते हैं, ‘महागठबंधन करना सपा की मजबूरी है। पार्टी विधानसभा चुनाव के लिए उत्साहित तो है लेकिन अभी भी उहापोह की स्थिति में है।’
‘पिछले लोकसभा चुनाव में 5 सीटों पर सिमटने के बाद मुलायम अभी भी कॉन्फिडेंट नहीं हैं, इसलिए वो महागठबंधन करके वोटों का बिखराव रोकना चाहते हैं।’
‘हालांकि, रजत जयंती के मौके पर जो भी नेता मंच पर थे, उनका यूपी में बहुत ज्यादा जनाधार नहीं है। लेकिन फिर न होने से कुछ होना तो अच्छा ही है।’
‘मुलायम सिंह अभी से 2019 के लोकसभा चुनाव के बारे में भी सोच रहे हैं। वे अभी से इसकी रुपरेखा तैयार करना चाहते हैं, क्योंकि अभी नरेंद्र मोदी का दूसरा कोई ऑप्‍शन दिख नहीं रहा है।’

अजित सिंह कहां जाएंगे, अभी तय नहीं
एक्‍सपर्ट एके वर्मा का कहना है कि अजित सिंह मंच पर जरूर आए हैं, लेकिन वो महागठबंधन में आएंगे, ये तय नहीं है। वो कभी भी पाला बदल सकते हैं।
सपा का जन्म राष्ट्रीय लोकदल से तब हुआ, जब चौधरी चरण सिंह की विरासत की सियासत को लेकर दोनों आमने-सामने हो गए।
हालांकि, अजित सिंह का वेस्‍ट यूपी में जनाधार है, लेकिन लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को एक भी सीट नसीब नहीं हुई थी।
ऐसे में वो भी चाहते हैं कि अगर गठबंधन से कुछ हासिल हो जाए तो इसमें कुछ बुरा नहीं है।
वहीं, मुलायम भी अजित सिंह के साथ मिलकर वेस्‍ट यूपी में खुद को मजबूत करना चाहते हैं।

सपा के बजाए कांग्रेस में जा सकते हैं अजित सिंह
सीनियर जर्नलिस्‍ट दिलीप सिन्हा का कहना है कि गठबंधन सपा की मजबूरी है क्योंकि सबसे बड़ी पार्टी वही है। अगर महागठबंधन की जीत होती है तो सीएम भी उन्हीं का होगा।
ऐसे में कई पार्टियों को लेकर सपा वोटों का बिखराव रोककर सत्ता में आना चाहती है।
इन पार्टियों का यूपी में कोई ज्‍यादा जनाधार नहीं है, ऐसे में उन्हें यूपी में अपने पैर फैलाने का मौका मिलेगा।
सिन्‍हा कहते हैं कि अजीत सिंह सपा के साथ जाएंगे, ये निश्चित नहीं है। उनकी कांग्रेस से भी बात चल रही है। वो सपा के बजाए कांग्रेस के साथ ज्यादा कम्‍फर्टेबल रहते हैं।
अगर महागठबंधन में कांग्रेस शामिल नहीं होती है तो अजित सिंह के कांग्रेस में जाने के ज्यादा चांसेज हैं।

गठबंधन में शामिल होने वाली पार्टियों का यूपी में अब तक ये रहा है हाल
राष्ट्रीय लोकदल ने 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।
रालोद ने 46 सीटों पर अपने कैंडिडेट उतारे थे, जिनमें 9 सीटों पर उसे जीत मिली थी।
वहीं, 2007 के चुनाव में पार्टी को 10 सीटें ही नसीब हुई थीं, तब उसने बीजेपी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था
वहीं, 2007 में ही जेडीयू ने एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, जिसमें उसने 17 सीटों पर अपने कैंडिडेट उतारे थे।
इसमें जेडीयू को केवल जौनपुर जिले की एक सीट पर जीत नसीब हुई थी।
2012 में जेडीयू ने अकेले दम पर 220 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई।
उधर, लालू की पार्टी आरजेडी की बात करें तो उनकी पार्टी ने अब तक यूपी में जीत का स्वाद नहीं चखा है।

Courtesy: Bhaskar.com

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