क्या फिर ग़रीब को ही मारा सरकार ने? अमीर खुश और ग़रीब दहशत में?

क्या फिर ग़रीब को ही मारा सरकार ने? अमीर खुश और ग़रीब दहशत में?
  • निशांत

परसो आधी रात को सरकार ने 500- 1000 के नोट पर पाबंदी लगा दी l कल एक प्रतिष्टित अँग्रेज़ी अख़बार उठाया तो यह पाया कि एक बड़ी कंपनी जो कॅश-लेस बॅंकिंग की सुविधा देती है उसने प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ अपना एड दिया है l पहले तो यह समझ में नहीं आया कि Paytm कंपनी के पास यह खबर पहले से कैसे आई जो इतनी जल्दी एड दे दिया? पर फिर सोचा कि इसके बारे में ज़्यादा सोच कर अपना ही दिन खराब करने वाली बात है l पर यह सोचने वाली बात तो है कि प्रधानमंत्री की तस्वीर इस्तेमाल करने की अनुमति पाने के लिए कम से कम एक दिन का समय तो लगता ही होगा ? रातों रात यह काम कैसे हो गया ? खैर ज़्यादा सोचने से तबीयत बिगड़ जाती है तो इस पर ध्यान ना हीं दें l ध्यान देने वाली बात यह है कि twitter पर हुए ट्विट्स पढ़ कर ऐसा लग रहा है कि इस फ़ैसले से सभी खुश हैं, बड़े बड़े उद्योगपति भी, कुछ अभिनेता जिनका नाम पीछे काले धन के पनामा पेपर्स में आया था वह भी, बड़े बड़े राजनेता भी, तो फिर परेशन कौन है? अगर कला धन इनके पास नहीं है तो है किसके पास ?
क्या वह किसान चोर है जिसकी फसल तयार है पर वह बेच नहीं पा रहा ? क्या हस्पताल की लाइन मे खड़ा वह बुज़ुर्ग चोर है जो दावा नहीं ले पा रहा ? क्या वो गर्भवती महिला चोर है जो डेलीवरी नहीं करवा पा रही जिसकी वजह से जच्चा- बच्चा दोनो की ही जान ख़तरे में है? अगर सभी खुश हैं तो चोर क्या यह लोग हैं ? अगर हां तो कितना काला धन हम इन लोगों से निकाल सकते हैं ? क्या कोई बड़ा चोर 500 के नोट करोड़ो की तादात में अपने बिस्तर के नीचे रख कर सोएगा ? या वह किसी ज़मीन मे या कहीं और इनवेस्ट कर देगा ? मोदी के द्वारा लिया गया यह कदम बड़ा ज़रूर है पर क्या इस कदम की दिशा ग़लत है? असली चोरों को आराम देने वाला यह फ़ैसला सिर्फ़ ग़रीब किसान और मज़दूर जिनके पास बैंक ख़ाता नहीं है उन्हे दुखी करने वाला है l विदेशों में छुपा काला धन और उद्योगपतियों के द्वारा पैसा ग़लत तरीके से सफेद किया हुआ वहीं का वहीं है l देश भर के नेताओं जिनका सरकारी बैंकों पर प्रभाव है उनके पास अपने नोटों को बदलने के लिए पर्याप्त समय होगा। वित्त और नीति के राष्ट्रीय संस्थान के अध्ययन से पता चला है कि राजनीतिक पार्टीयों का 80 प्रतिशत धन 20,000 रुपये या उससे कम की रकम में तोड़ कर चंदा लिया जाता है जिसे वह अनामित दिखाते हैं l इसलिए मोदी का यह ‘परिवर्तनकारी कदम’ चुनावों में हो रहे काले धन के बड़े हेर फेर के करीब तक नहीं पहुँच पा रहा है l
वास्तव में, उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात में अगले एक साल में चुनाव के समय आते हैं, हम 2000 के नोटों से भरी बोरिया बड़ी बड़ी कंपनियों से राजनीतिक पार्टियों के लिए जाते हुए देखेंगे l क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या वित्त मंत्री अरुण जेटली यह वचन देंगे कि आगामी चुनावों में कॉरपोरेट जगत से नकदी पैसा नहीं लेंगे ? यह समस्या की जड़ है।
छोटे छोटे व्यापार मलिक, बैंकों के सामने बड़ी संख्या मे खड़े हैं और कई लोग बैंक जाने से डर भी रहें हैं कि अधिकारी क्या पूछेंगे ? गरीब अक्सर कुछ ग़लत किए बिना ही दोषी महसूस करने लगता है और सरकार ऐसा महसूस उसे करवाती भी है l ग्रामीण इलाक़े और भारत के छोटे शहरों से काफ़ी कहानिया सामने आई है जहाँ गृहिणियों ने रज़ाई में पैसा बचा बचा के छुपा कर जमा किया था l इन लोगों को अब विभिन्न बैंक शाखाओं जहां क्लर्क इन्हें इज़्ज़त तक नहीं देता, उनके सामने लाइन लगा कर खड़े होना पड़ेगा l दुर्भाग्य से गरीब को सरकारी दफ़्तरों या बैंको में कभी गरिमा नही मिलती l यह काले धन पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक इन ग़रीबों पर एक आपदा के समान गिरी है l
वास्तविक सर्जिकल स्ट्राइक तब होती अगर यह पता लगाने की कोशिश की जाती कि कितना काला धन पिछले कुछ सालों में बड़े उद्योगपतियों ने सरकार के साथ गहरे सम्बंधों की वजह से कमाया है l क्या वर्तमान व्यवस्था और सरकार के पास इस पर कदम उठना तो दूर, पर केवल चर्चा करने तक का भी साहस है ?

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