70 की हुईं सोनिया गांधी, देशभर से लगा बधाईयों का तांता

70 की हुईं सोनिया गांधी, देशभर से लगा बधाईयों का तांता

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का आज 70वां जन्मदिन है। उनके जन्मदिन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनको ट्वीट कर बधाई दी है। पीएम मोदी ने लिखा है कि वो सोनिया गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हैं। भगवान उन्हें लंबी आयु और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करें।

भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा
सोनिया गांधी भारतीय राजनीति का एक अहम हिस्सा हैं। वो संसद में उत्तर प्रदेश के रायबरेली संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व करती हैं। सोनिया गांधी देश की ऐसी पॉलिटिशयन है जिन्होंने विदेशी होते हुए भी देश की सत्ता संभाली। इटली से भारत आकर यहां की परिस्थितियों में खुद को ढालकर, सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बनने तक का सोनिया का सफर काफी रोचक रहा है। या यूं कहें कि कई अपनों को खोकर सोनिया यहां तक पहुंची हैं। जब उनका जन्म हुआ तो किसी ने नहीं सोचा होगा कि ये लड़की आगे चलकर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की कमान संभालेंगी।

इटली के लूसियाना में हुआ था जन्म
दरअसल, सोनिया गांधी का असल नाम एडविग एंटोनिया अलबिना मायनो है। उनका जन्म वैनेतो, इटली के क्षेत्र में विसेन्ज़ा से 20 किमी दूर स्थित एक छोटे से गांव लूसियाना में 9 दिसंबर, 1946 को हुआ था। उनके पिता स्टेफ़िनो मायनो एक भूतपूर्व फासिस्ट सिपाही थे जिनका निधन 1983 में हुआ। उनकी माता पाओलो मायनो हैं। उनकी दो बहनें हैं। उनका बचपन टूरिन, इटली से 8 किमी दूर स्थित ओर्बसानो में व्यतीत हुआ।

राजीव गांधी से शादी कर बनीं सोनिया
देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बहू व पूर्व पीएम राजीव गांधी की पत्नी बन सोनिया का पर्दापण भारत में हुआ। राजीव गांधी से शादी करके इटली की एडविग एंटोनिया भारत की सोनिया गांधी बनीं। राजीव से उनकी मुलाकात कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान हुई थी। दोनों के बीच प्यार हुआ और 1968 में दोनों शादी के बंधन में बंध गए। शादी के बाद सोनिया गांधी को 1983 में भारत की नागरिकता मिली।

राजनीति से नहीं था मोह
सोनिया को कभी भी राजनीति से मोह नहीं था, आज कांग्रेस के सर्वोच्च पद पर आसीन सोनिया गांधी ने कभी इस पद को ठुकरा दिया था। पति राजीव की हत्या होने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया से पूछे बिना उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने की घोषणा कर दी लेकिन सोनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया और राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति अपनी घृणा और अविश्वास को इन शब्दों में व्यक्त किया कि, “मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूँगी, परंतु मैं राजनीति में कदम नहीं रखूँगी।” काफी समय तक राजनीति में कदम न रखकर उन्होंने अपने बच्चों के पालन-पोषण पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

दवाब में राजनीति में आईं सोनिया
उधर पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल के बाद कांग्रेस 1996 का आम चुनाव हार गई, जिससे कांग्रेस के नेताओं ने फिर से नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य की आवश्यकता अनुभव की। उनके दबाव में सोनिया गांधी ने 1997 में कोलकाता के प्लेनरी सेशन में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की और उसके 62 दिनों के अंदर 1998 में वो कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं। उन्होंने सरकार बनाने की असफल कोशिश भी की।

विदेशी होने के मुद्दा उठाया गया
राजनीति में कदम रखने के बाद उनका विदेश में जन्म हुए होने का मुद्दा उठाया गया। उनकी कमज़ोर हिन्दी को भी मुद्दा बनाया गया। उनपर परिवारवाद का भी आरोप लगा लेकिन कांग्रेसियों ने उनका साथ नहीं छोड़ा और इन मुद्दों को नकारते रहे।

बेल्लारी-अमेठी से साथ लड़ा चुनाव
सोनिया गांधी अक्टूबर 1999 में बेल्लारी, कर्नाटक से और साथ ही अपने दिवंगत पति के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी, उत्तर प्रदेश से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ीं और करीब तीन लाख वोटों की विशाल बढ़त से विजयी हुईं। 1999 में 13वीं लोकसभा में वे विपक्ष की नेता चुनी गईं।

2004 में कांग्रेस को मिली अप्रत्याशित जीत
2004 के चुनाव से पूर्व आम राय ये बनाई गई थी कि अटल बिहारी वाजपेयी ही प्रधानमंत्री बनेंगे लेकिन सोनिया ने देशभर में घूमकर खूब प्रचार किया और सबको चौंका देने वाले नतीजों में यूपीए को अनपेक्षित 200 से ज़्यादा सीटें मिली। सोनिया गांधी स्वयं रायबरेली, उत्तर प्रदेश से सांसद चुनी गईं। वामपंथी दलों ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर रखने के लिये कांग्रेस और सहयोगी दलों की सरकार का समर्थन करने का फ़ैसला किया जिससे कांग्रेस और उनके सहयोगी दलों का स्पष्ट बहुमत पूरा हुआ।

सभी चाहते थे सोनिया बनें प्रधानमंत्री
16 मई, 2004 को सोनिया गांधी 16 दलीय गठबंधन की नेता चुनी गईं जो वामपंथी दलों के सहयोग से सरकार बनाता। सबको उम्मीद थी कि सोनिया गांधी ही प्रधानमंत्री बनेंगी लेकिन एनडीए के नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर आरोप लगाए। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने घोषणा की कि यदि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगीं और भूमि पर ही सोएंगीं।

मनमोहन सिंह को बनाया उम्मीदवार
18 मई को उन्होंने मनमोहन सिंह को अपना उम्मीदवार बताया और पार्टी को उनका समर्थन करने का अनुरोध किया और प्रचारित किया कि सोनिया गांधी ने स्वेच्छा से प्रधानमंत्री नहीं बनने की घोषणा की है। कांग्रेसियों ने इसका खूब विरोध किया और उनसे इस फ़ैसले को बदलने का अनुरोध किया पर उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बनना उनका लक्ष्य कभी नहीं था। सब नेताओं ने मनमोहन सिंह का समर्थन किया और वे प्रधानमंत्री बने पर सोनिया को दल का तथा गठबंधन का अध्यक्ष चुना गया।

लाभ के पद पर होने का लगा आरोप
राष्ट्रीय सुझाव समिति का अध्यक्ष होने के कारण सोनिया गांधी पर लाभ के पद पर होने के साथ लोकसभा का सदस्य होने का आक्षेप लगा जिसके फलस्वरूप 23 मार्च 2006 को उन्होंने राष्ट्रीय सुझाव समिति के अध्यक्ष के पद और लोकसभा का सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया। मई 2006 में वे रायबरेली, उत्तरप्रदेश से फिर से सांसद चुनी गईं। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने फिर यूपीए के लिए देश की जनता से वोट मांगा। एक बार फिर यूपीए ने जीत हासिल की और सोनिया यूपीए की अध्यक्ष चुनी गईं।

सोनिया का रहा नेतृत्व, कांग्रेस ने 10 साल संभाली कमान
सोनिया गांधी की इसी जीत के बाद कांग्रेस ने फिर से दस साल तक भारत की कमान संभाली। 2014 में देश में बीजेपी ने जीत हासिल की और सोनिया गांधी विपक्ष में आ गईं। सोनिया गांधी आज भी कांग्रेस की अध्‍यक्ष हैं। अटकलें हैं कि कुछ समय बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद सोनिया के बेटे और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को मिलने वाला है। इसके पीछे सोनिया की गिरती सेहत भी वजह बतायी जा रही है।

 

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