रिपोर्ट – UPA सरकार ने बनाया था नौकरियों का रिकॉर्ड

रिपोर्ट – UPA सरकार ने बनाया था नौकरियों का रिकॉर्ड

वर्ष 2003 – 2004 से 2011 – 2012 तक, जब मनमोहन सिंह सरकार सत्ता में थी वह समय देश की अर्थव्यवस्था के लिए सुनहरा दौर था। आज़ाद भारत ने पहली बार उत्पादन क्षेत्र (Manufacturing Sector) में रोज़गार की इतनी बढ़ोतरी देखि थी। इस दौरान उत्पादन क्षेत्र में रोज़गार की बढ़ोतरी रिकॉर्ड स्तर पर देखि गई। लगभग 7 प्रतिशत हर वर्ष देश में रोज़गार बड़ा जो अब तक का अधिकतम स्तर है।

इंडियन कॉउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकनोमिक रिलेशन के अध्यनकरता ने इसका अध्यन किया है जिसका डाटा उन्होंने एनुअल सेंट्रल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस से लिया है। आज के दौर में असली डाटा पर निर्धारित कम ही लेख मिलते हैं।  लेख तो बहुत दूर की बात है, आज के राजनीतिक दौर में भाषण में भी सटीक आंकड़ो पर बात नहीं होती, और अब तो हम ऐसे डिजिटल दौर से गुज़र रहे हैं जिसमे सरकार की ज़्यादातर नीतियां और योजनाए तक केवल वाहवाई लूटने के लिए बनाई जाने लगी है। अब राजनीतिक मंत्र है “जो दिखता है वह बिकता है”। वह ज़माने चले गए जब कोई योजना को आम आदमी महसूस करता था जब वह उसके जीवन का हिस्सा बनती थी, अब वो ज़माना है जब योजना लागू होने से पहले ही लोगो के बीच उसको डिजिटल तरीके से फेंक दिया जाता है और उसी पर लोग चर्चा करने लगते है।  इसमें कुछ गलत नहीं है, पर गलत यह हो जाता है जब लोग ये ध्यान ही नहीं देते कि  योजना वास्तविकता में उनके जीवन में उतरी या नहीं, या फिर उसका देहांत ज़मीन पर उतरने से पहले ही हो गया।  लोग योजनाओं को भी चुनावी भाषणों में ढूंढने लगे है और उसकी जानकारी संसद से ज़्यादा चुनावी रैलियों और लैपटॉप की दुनिया में ढूंढने लगे हैं।  इसीलिए हम देख सकते हैं कि  कैसे चुनाव हर बढ़ते दिन के साथ महंगे होने लगे है, चुनावी रैलियां एक मॉल की तरह हो गई है जहाँ योजनाओ की अच्छी पैकिंग कर लोगों को बेच जाता है। आज योजना बनाने के लिए विशेषज्ञ से ज़्यादा मार्केटिंग एक्सपर्ट्स की ज़रुरत ज़्यादा पड़ने लगी  योजना को बेहद खूबसूरत डिब्बे में दाल कर रंग बिरंगा बना  कर लोगो को लुभा सके।

अब अगर हम इस समय की सरकार पर ध्यान दें तो यही लगता है कि सरकार का ज़्यादा ध्यान पैकिंग पर है और नयी योजनाए बनाने में नहीं। सत्ता हासिल करने के बाद जितनी भी नयी नीतियां या योजनाए सर्कार की आयी हैं वह ज़्यादातर पिछली सरकार की दी हुई योजनाओं की नयी पैकिंग है। प्रधानमंत्री मोदी ने पुर्व प्रधानमंत्री के ख़राब रिकॉर्ड को अपने चुनाव का मुद्दा बनाया था और बेहतर विकास का वादा कर के वह सत्ता तक पहुचे।  सोचने वाली बात यह है की क्या जनता सच में उनके किये वादों की रंग बिरंगी पैकिंग देख कर उनकी बातों में आ गई? क्योंकि अगर जनता सच में भाषण में किये वादों की तह तक जाती और जांच करती तो शायद चुनाव का नतीजा इतना एक तरफ़ा नहीं होता जैसा हमने 2014 में देखा। अपने पहले स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधान मंत्री मोदी ने लाल किला से “मेक इन इंडिया” को लॉन्च किया। उन्होंने इसके ज़रिये कम वेतन या मजदूरी पाने वाले नागरिकों को बेहतर नौकरी का अफसर देने का वादा किया था। मोदी के अनुसार जिस समय भारतीय अर्थव्यवस्था अपने चरम पर पहुच रही थी उस समय उनके अनुसार देश नुकसान में जा रहा था। तब भी लोग बिना तथ्यों की जानकारी के अच्छे भाषण से बहल गए।

अध्यन के अनुसार उत्पादन क्षेत्र ने 1970 के दशक में अच्छी बढ़ोतरी देखि थी जब यह बढ़ोतरी 4.6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से दर्ज की गयी थी। 1980 के दौरान यह बढ़ोतरी स्थागित हो गई थी, और उसी समय मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्रालय संभाला और कुछ समय के बाद नरसिम्हा रो की सर्कार के दौरान मनमोहन सिंह ने नए रिफॉर्म्स लागु किये जिसका मकसद उत्पादन क्षेत्र में रोज़गार के अफसर को बड़ाना था। मनमोहन सिंह के इन्ही रिफॉर्म्स की बदौलत देश ने पहली बार 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से रोज़गार की बेहतरीन बढ़ोतरी देखि। रिफार्म के बाद भी यह रोज़गार की दर हर क्षेत्र में बढ़ती रही।

पिछले 22 सालों में निर्यात के बेहतर अफसरों के कारण 37 लाख नौकरियों के अफसर खुले।  इसी बढ़ोतरी का फायदा खुद  प्रधानमंत्री मोदी ने भी सत्ता में आने के बाद उठाया है पर कभी इसको स्वीकार नहीं किया। और अब नोटबंदी का फरमान सुना कर वह जिस पेड़ पद बैठ काट फल खा रहे थे उसकी जड़ें भी खुद ही हिला दी। पिछले एक ही महीने में सर्कार की इसी नीति के कारण नाटकीय दर से लोगो का रोज़गार गया है। उनका यह निर्णय, मेक इन इंडिया के लॉन्च के समय किये हुए अपने ही वादे के विरूद्ध है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हो सकता है की देश को इसका खामियाज़ा एक दशक तक उठाना पड़े।

 

 

 

 

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