पीएम मोदी को वोट देने वाले वाराणसी के लोग अब कोस रहे हैं खुद को

पीएम मोदी को वोट देने वाले वाराणसी के लोग अब कोस रहे हैं खुद को

वाराणसी। 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी पर 500 और 1000 के नोटों को बंद करने की अचानक घोषणा कर दी। तब से लेकर आज तक पूरे देश में बैंकों के आगे लंबी लाइनें लगी हैं। 44 दिन बीत जाने के बाद भी बैंकों की लाइनों में लोगों का मरना जारी है। हद तो तब हो गई जब कई स्थानों पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठियां भी भांजी।

नोटबंदी का एलान करने के 44 दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंच रहे हैं। वो यहां न केवल ‘बूथ कार्यकर्ता’ सम्मेलन को संबोधित करेंगे, बल्कि और भी कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। मोदी को सांसद बनाने के बदले उनको वोट देने वाले शहर वाराणसी को नोटबंदी के रूप में जबरदस्त प्रहार मिला है। नोटबंदी के फ़ैसले के बाद से प्रधानमंत्री के इस दौरे तक वाराणसी में बैंकों के सामने लंबी कतारें लगी हैं जहां लोग खुद को कोसते दिखाई दे रहे हैं।

वाराणसी के गोलघर स्थित यूनियन बैंक की शाखा पर कतार में लगे दीपक मालवीय ने बताया कि मोदी का फैसला जनता के लिए परेशानी भरा रहा है। कई लोगों ने केंद्र सरकार की तुलना उस शासक से की जो देश की राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद और फिर दौलताबाद से दिल्ली ले गए थे।

नोटबंदी के जुए ने वाराणसी के एक खरब रुपए की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। यह रकम इंडोनेशिया जैसे देश के जीडीपी से भी ज्यादा है। आज हालत यह है कि वहां हैंडलूम के जरिए होने वाला समूचा कारोबार ठप पड़ा है और बुनकरों के बड़े तबके के साथ-साथ मशहूर रेशमी कपड़े बनाने वाले कारीगरों के सामने खाने तक के लाले पड़ गए हैं।

वाराणसी में यह अफवाह फैली है कि अगर किसी ने भी नोटबंदी के खिलाफ बोला तो उसके घर आयकर विभाग का छापा डलवा दिया जाएगा, इसलिए यहां के बुद्धिजीवी और बड़े व्यापारी अपनी नाराज़गी ज़ाहिर नहीं कर पा रहे हैं।

भारत में सर्दी आम तौर पर पर्यटन का मौसम होता है। वाराणसी में भी विदेशी पर्यटकों की एक बड़ी संख्या आती है। इन दिनों यहां के घाटों पर चहल-पहल व मंदिरों में काफी भीड़ रहती है। विदेशी पर्यटकों के आने से यहां के बाज़ारों में भी काफी रौनक रहती है। स्थानीय कारोबारियों का व्यापार भी ज़ोरों पर रहता है। लेकिन, नोटबंदी के बाद यहां घाटों पर पर्यटकों की संख्या कम हो गई है। मंदिरों में भी लोगों की भीड़ में कमी आई है। स्थानीय व्यापार बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। बनारस का व्यापार और व्यवसाय कैश पर आधारित हैं, इसलिए यहां व्यापारियों से लेकर डॉक्टर तक सब परेशान हैं।

लोगों का यहां तक कहना है कि रिक्शे वाले भी खाली घूम रहे हैं। फ़िलहाल शादी का मौसम है। इस मौसम में बाज़ारों में आम तौर पर चहल-पहल रहती है। लोग खरीदारी करते हैं लेकिन नोटबंदी के बाद लोगों के हाथ खाली हैं और बाज़ारों से रौनक गायब है।

जहां तक व्यापार के प्रभावित होने का प्रश्‍न है तो यहां सबसे अधिक मुसीबत बनारसी साड़ी उद्योग से जुड़े लोगों को उठानी पड़ रही है। बनारसी साड़ी का कारोबार पहले से ही खस्ता हालत में था। लोकसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में इस उद्योग में नई जान फूंकने की बात की थी। पिछले दिनों सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इंडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड की ओर से देश के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शनी लगा कर बनारसी साड़ी उद्योग को संभालने की कोशिश की गई थी। लेकिन हैंडलूम से जुड़ी एक ट्रेड यूनियन राष्ट्रीय चेनेता जन समाख्या के रिसर्च में यह बताया गया था कि बनारस के बुनकरों की हालत बद से बदतर होती जा रही है।

आरसीजेएस के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में वाराणसी के 50 बुनकरों ने आत्महत्या की और बहुत सारे बुनकर पलायन करने पर मजबूर हो गए। साड़ियों की डिमांड कम होने से यहां के बुनकर बेहद परेशान हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहां से बाहर जाने वाली साड़ियों की मांग में 80 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है।

वाराणसी की सब्जी मंडियों में आलू सड़ने लगे हैं और व्यापारी उन्हें मवेशियों को खिला रहे हैं। उनका कहना है कि इस मौसम में पूर्वांचल के इलाकों में आलू की बुआई होती है और आसपास के किसान यहां से आलू खरीद कर ले जाते हैं। यह व्यापार कैश में होता है, इसलिए यहां कोई खरीदार नहीं और आलू यहां पड़े-पड़े सड़ रहे हैं। ख़बरों के मुताबिक वाराणसी की मंडी में रोजाना 30-40 गाड़ियां आती थीं, लेकिन नोटबंदी के बाद ये संख्या मुश्किल से 8-9 तक रह गई है।

वाराणसी से एक और हैरान करने वाली खबर यह है कि बैंकों में चूंकि नोटों की कमी थी, इसलिए नोट बदलवाने गए किसानों को 2000 रुपए के सिक्के दे दिए गए। आज कल सोशल मीडिया पर और कुछ अख़बारों में दस रुपए के नकली सिक्कों की चर्चा भी जोरों पर है। लिहाज़ा बीज खरीदते समय दुकानदार इन सिक्कों को लेने से इंकार करने लगे हैं।

वाराणसी के तमाम कारीगरों में साठ फीसद से ज्यादा के पास बैंक अकाउंट नहीं हैं और उन्हें उपदेश दिया जाता है कि कैशलेस लेनदेन करो, पेटीएम करो। क्या इस हालत में कैशलेस या पेटीएम का की बात करने वालों की समझ में सवाल उठाया जाए या फिर उनकी नीयत पर शक किया जाए।

Courtesy: National Dastak

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