पटना नाव दुर्घटना: नाव तो डूब गई, पर तैर रहे कई सवाल

पटना  गंगा घाट पर रोज लाशें दिखती हैं। रोज लाशें जलती हैं। आज असामान्य दिन था। गंगा घाट से 24 लाश पटना मेडिकल कॉलेज गई। फिर गंगा घाट आई। बच्चों के शव गंगा में प्रवाहित हुए। बड़ों के आग में समा गए।

इस दुखद घटना के बीच अस्पताल से घर और घर से श्मशान घाट तक सवाल उठे। जवाब में जो बात हर जगह सुनी गई, वह थी लापरवाही और बदइंतजामी। दोषी कौन? यह जानना अभी बाकी है। ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब आना जरूरी है;

सवाल : एक

छठ एवं कार्तिक पूर्णिमा जैसे मौकों पर पटना समेत आसपास के क्षेत्रों में गंगा में निजी नावों के परिचालन पर रोक लगा दी जाती है। पतंग महोत्सव में भी हाल के वर्षों में भारी भीड़ लगने लगी थी। फिर भी निजी नावों पर रोक नहीं लगाई गई। न ही अतिरिक्त सरकारी नावों की व्यवस्था की गई। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

सवाल – दो

नाविक का अता-पता नहीं है। अगर नावों का रजिस्ट्रेशन ठीक ढंग से होता, तो कम से कम प्रशासन को पता होता कि मंझधार में इतने लोगों की जान लेने वाला नाविक कौन है? यानी गंगा में बिना रजिस्ट्रेशन के नावें चल रहीं। कोई नियंत्रण नहीं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

सवाल- तीन

अधिकारियों को गांधी घाट छोडऩे के बाद पर्यटन निगम का बड़ा जहाज खराब हो गया। उसके बाद किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह क्यों नहीं समझ में आया कि जिन 30 हजार से अधिक लोगों को दियारा में पहुंचाया गया है, वे शहर कैसे लौटेंगे? पूरी व्यवस्था की निगरानी किसके जिम्मे थी?

सवाल – चार

कहा जा रहा है कि मंच से तीन बजे अचानक घोषणा कर दी गई कि शाम चार बजे के बाद नाव नहीं जाएगी। भीड़, नावों की संख्या, लोगों की मनोदशा और अफरातफरी को नजरअंदाज करते हुए ऐसी उद्घोषणा क्यों की गई, जिससे लोग घबरा गए और जान जोखिम में डालकर खतरनाक नावों पर चढ़ बैठे? आयोजन का प्रबंधक कौन था, जिसने भीड़ प्रबंधन के सामान्य नियमों की भी अनदेखी की?

सवाल पांच

छपरा और पटना दो जिला प्रशासन अब सामान्य अनुमति और सामान्य प्रबंधन को लेकर एक दूसरे पर दोष मढ़ रहे। प्रधान सचिव स्तर के अधिकारी जिस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे, उस कार्यक्रम को लेकर ऐसी स्थिति क्यों? चार दिन तक चलने वाले आयोजन को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के बीच ‘संवादहीनताÓ का जिम्मेदार कौन है?

सवाल – छह

प्रत्यक्षदर्शियों और हादसे में शिकार लोगों के बयान से आयोजन के प्रबंधन, भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा प्रबंधन, आपदा प्रबंधन की घोर लापरवाही स्पष्ट है। इस हादसे के बाद भी जांच कमेटी की सिफारिश का भी हश्र क्या छठ या दशहरा हादसे जैसा होगा? क्या किसी एक भी जिम्मेदार अधिकारी को निलंबन या स्थानांतरण से अधिक की ऐसी सजा मिलेगी, जो सबक बन सके? यह सवाल हादसे में शिकार एक जवान बेटे के बाप का भी था। इसका जवाब कौन देगा?

Courtesy: Jagran.com

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