सियासी और इकोनॉमिक मिजाज की झलक दिखा रही ब्रशनगरी शेरकोट (बिजनौर)

सियासी और इकोनॉमिक मिजाज की झलक दिखा रही ब्रशनगरी शेरकोट (बिजनौर)

शेरकोट (बिजनौर).  दिल्ली से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर बिजनौर जिले का एक बड़ा कस्बा शेरकोट यहां से गुजरने वाले लोगों की नजर को रोक लेता है, क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कस्बा शुरू होने के पहले और इसके बाहर निकलने के एक किलोमीटर दूर तक जिस तरह से एलईडी स्ट्रीट लाइट सलीके से लगी हैं वह इस तरह के कस्बों में नहीं दिखती हैंं। असल में शेरकोट देश में पेंट ब्रश की मैन्‍युफैक्‍चरिंग का हब है और इस मार्केट के करीब 70 फीसदी हिस्से पर शेरकोट का कब्जा है। इसके चलते इसे देश में ब्रशनगरी का दर्जा भी हासिल है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और नोटबंदी का असर इन चुनावों पर होगा या नहीं, इसकी झलक यहां दिखती है। यहां अभी भी बैंकों के बाहर लंबी लाइनें लगती हैं और 30 दिसंबर के बाद हालात नहीं बदलने से हर रोज लोगों की नाराजगी बढ़ रही है।

 

 

बैंकों के सामने नहीं कम हो रही लाइन

 

इस संवाददाता ने देखा कि यहां के बीरथला मोहल्‍ले के करीब बैंक ऑफ बड़ौदा की पहली मंजिल पर स्थित शेरकोट ब्रांच के बाहर सुबह करीब 9 बजे सैकड़ों पुरुषों और महिलाओं की लंबी लाइन लगी है। ब्रांच के साथ ही बैंक का एटीएम भी है। पास के बालकिशनपुर गांव से आए केशव सिंह अपनी बैंक पासबुक दिखाते कहते हैं कि 9 नवंबर के बाद से यही हालत बनी हुई है। बैंक कभी दो हजार रुपए देता है तो कभी यह एक हजार और 1500 रुपए ही देता है। साथ का एटीएम 9 नवंबर के बाद पहली बार 11 जनवरी को चालू हुआ है। साथ में खड़े अमरपुर गांव से एक अन्य बुजुर्ग का कहना है कि हम गांव से नौ लोग चार दिन से आ रहे हैं लेकिन पेमेंट अभी भी नहीं मिला है।

 

वहीं, पंजाब नेशनल बैंक की ब्रांच में भी भीड़ का यही हाल है लेकिन उसके एटीएम का शटर अभी भी डाउन है। आसपास के दर्जनों गांव इस कस्बे के बैंकों पर ही निर्भर हैं। कई लोग कह रहे हैं कि गरीब परेशान हैं आप ही देख लीजिए गरीब लोग लाइन में हैं औरतें लाइन में लगी हैं लेकिन कोई अमीर नहीं दिखता है। इसका मतलब है कि लोग बैंकों के कामकाज पर लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा है। हालांकि यहां एचडीएफसी बैंक ब्रांच में जरूर स्थिति कुछ बेहतर है।

 

600 यूनिट में करीब 30 हजार लोग करते हैं काम

 

असल में शेरकोट मुस्लिम बहुल कस्बा है और यहां पर पेंट ब्रश बनाने की करीब 600 यूनिट हैं। एक यूनिट में में आधा दर्जन से लेकर 200 लोग तक काम करते हैं। लगभग सारा काम हाथ से होता है इसलिए यह लेबर इंंटेंसिव मैन्‍युफैक्‍चरिंग है।  यह काम केवल शेरकोट स्थित यूनिट्स के साथ ही आसपास के गांवों के लोग अपने घरों में भी करते हैं और इसके लिए कंपनियों से कच्चा माल लेकर जाते हैं। करीब तीस हजार लोगों को यहां इस ब्रश बनाने वाले कारोबार में काम मिला है और अधिकांश मजदूर हैं। शेरकोट की सबसे बड़ी ब्रश बनाने वाली इकाई बढ़ापुर के निवर्तमान विधायक मोहम्‍मद गाजी के परिवार की है। गाजी अभी धामपुर विधानसभा सीट के बसपा के प्रत्याशी हैं और शेरकोट धामपुर सीट के तहत आता है।

 

गाजी के पिता मोहम्‍मद खर्शीद यहां 1976 में सहारनपुर के गंगोह कस्बे से आए थे और उन्होंने यहां पेंट ब्रश का कारोबार शुरू किया। इसके पहले भी यहां से कारोबार चल रहा था। साजन और चारमीनार ब्रांड के ब्रश बनाने वाले खुर्शीद कहते हैं कि शेरकोट ब्रश बनाने की मंडी बन गया। यहां पर कारीगर हैं और कच्चा माल भी एक जगह मिल जाता है इसलिए यह एक बड़ा मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब बन गया है। गाजी के चारमिनार और साजन ब्रांड के अलावा विल्सन, सनराइज, एवन, जैनको और टाटा समेत दर्जनों ब्रांड नाम यहां पेंट ब्रश बनाए जाते हैं।

 

चीन से कच्चे माल का बढ़ा है आयात

 

पेंट ब्रश में लकड़ी या प्लास्टिक का हैंडल होता है। यह हैंडल कानपुर और दिल्ली से आता है। एक टिन का फैरुल होता है जो ज्यादातर काशीपुर में  बनता है। लेकिन सबसे अहम कच्चा माल बाल होते थे। यह बाल सूअर, बैल की पूंछ और घोड़े की पूंछ के होते हैं। बाद में सूअर के बाल चीन से आने लगे, लेकिन अब इनकी जगह नाइलॉन ने ले ली है और इससे तैयार फिलामेंट अधिकांश चीन से आयात होता है। जहां बाल 1991 में चीन से आना शुरू हुए वहीं हालो के नाम से फिलामेंट साल 2000 से चीन से आना शुरू हुआ।

 

इस कारोबार की खासियत यह है कि करीब 90 फीसदी काम हाथ से होता है और कारीगर ज्यादातर दलित हैं जबकि कारोबार में ज्यादा हिस्सेदारी मुस्लिम परिवारों की है। लेकिन कारोबारी मोर्चे पर आगे बढ़ रहे इस कस्बे को नोटबंदी से बड़ा झटका लगा है। खुर्शीद कहते हैं कि नोटबंदी से 75 फीसदी यूनिट बंद हैं। कारीगरों को मजदूरी देने के लिए पैसे नहीं हैं। वहीं सप्लायरों के पेमेंट भी अटक गए हैं। कारीगर को हर रोज पैसा चाहिए, जब बैंक से कैश नहीं मिल रहा है तो उसे कैसे भुगतान होगा। बीरथला क्षेत्र के सतीश कुमार चौहान और कमल किशोर भी इसी बात से इत्तेफाक रखते हैं।

 

गन्ना ढुलाई की पेमेंट के लिए पैसा नहीं, इससे बढ़ी दिक्कत

 

वहीं, धामपुर चीनी मिल के यार्ड में गन्ना लेकर आए हादकपुर गांव के किसान पुष्पराज का कहना है कि मजदूरों और गन्ना ढुलाई के पेमेंट के लिए पैसा नहीं है इससे दिक्कत बढ़ रही है। खासतौर से 30 दिसंबर के बाद हालात नहीं सुधरने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। चीनी मि‍ल के बाहर धामपुर शुगर मिल ट्र्क ओनर एसोसिएशन के दफ्तर में बैठे सईदुल हसन का कहना है कि हमारा ट्रांसपोर्ट कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। नोटबंदी ने अधिकतर कारोबार ठप  कर दिए हैं क्योंकि कैश की किल्लत है और धामपुर में अधिकांश एटीएम बंद हैं। वहीं, बैंकों में लंबी लाइनों के बावजूद हजार दो हजार रुपए ही मिलते हैं। नींदरू गांव के दिलशाद अली कहते हैं कि नोटबंदी का चुनावों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

 

जहां तक जिले की आठ विधानसभा सीटों की बात है तो बसपा ने यहां नहटौर और नगीना रिजर्व सीट को छोड़कर छह पर मुसलमान प्रत्याशी उतारे हैं। दिलशाद अली कहते हैं कि हम तो समाजवादी पार्टी के पक्ष में हैं लेकिन अगर पार्टी में विभाजन होता है तो उसके बावजूद यहां लोगों को अखिलेश यादव पर भरोसा ज्यादा है। ऐसे में मुुसलमान वोट बंटने से बसपा को नुकसान हो सकता है। लेकिन वहीं बढ़ापुर विधानसभा के मुरलीवाला गांव के अनिल राठी कहते हैं कि हमारे यहां बसपा का विधायक था उसके चलते यहां माहौल उनके खिलाफ है और इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। हालांकि, लहर किसी के पक्ष में नहीं है। असल में यहां की चीनी मिल में गन्ना आपूर्ति करने आए किसान भी कहते हैं, लेकिन नोटबंदी से उनको नुकसान हुआ है यह बात वह बहुत ही नाराजगी से कहते हैं और इसका नुकसान भाजपा को होने की बात करते हैं।

Courtesy: Bhaskar

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