कैपिटल टैक्सेशन: आम निवेशकों की बजट से अपेक्षाएं

कैपिटल टैक्सेशन: आम निवेशकों की बजट से अपेक्षाएं

नई दिल्ली
आम बजट आ रहा है और इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म है। पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन सामान्य करदाताओं, निवेशकों और बचतकर्ताओं को लेकर तो अनुमान लगा ही सकते हैं। इस हफ्ते मेरा फोकस कैपिटल टैक्सेशन पर है। उसमें आम निवेशकों के लिए क्या होगा? कैपिटल टैक्स पर वित्त मंत्री का क्या रुख होगा? इसके बारे में बता रही हैं

कैपिटल टैक्सेशन
कैपिटल गेंस और इनकम पर टैक्स अलग हिसाब से लगता है। ज्यादातर देशों में कैपिटल गेंस टैक्स का रेट इनकम टैक्स से कम होता है। ऐसे में लेबर और कैपिटल जैसे फैक्टर ऑफ प्रॉडक्शन को अलग-अलग तरह से लेने पर विवाद की स्थिति बनती है।

कैपिटल को तरजीह क्यों?
मेहनती सुपर स्पेशियलिस्ट साइंटिस्ट अपनी इनकम पर 30 पर्सेंट टैक्स देती है जबकि सुस्त इक्विटी होल्डर को टैक्स फ्री डिविडेंड और कैपिटल गेन मिलता है। लेकिन चीजें जितनी आसान दिखती है, उतनी है नहीं।

कैपिटल को तरजीह क्यों दी जाती है? आपको बता दूं कि उधारी पर होनेवाली इंटरेस्ट इनकम पर सैलरी जितने रेट से टैक्स लगता है। इक्विटी कैपिटल को प्रॉपर्टी और गोल्ड से उलट तरजीही दर्जा दिया गया है।

इसके लिए कम से कम तीन दलीलें दी जा सकती हैं। पहली, ब्याज खर्च होता है जो कंपनी टैक्स देने से पहले उसे अपने रेवेन्यू से घटा लेती है। जो कंपनी रेवेन्यू जेनरेशन के लिए कैपिटल यूज करके एसेट क्रिएट करती है, वह प्रॉफिट तय करने से पहले इनकम से डेप्रिसिएशन, एक्सपेंस और इंटरेस्ट घटा लेती है। कंपनी प्रॉफिट पर कॉरपोरेट इनकम टैक्स चुकाती है। टैक्स लगने से पहले लेंडर्स को ब्याज चुकाया जाता है। लेकिन डिविडेंड पोस्ट पेड होता है। यह टैक्स चुकाने के बाद हासिल प्रॉफिट डिविडेंड के तौर पर बांटा जाता है या रख लिया जाता है। यहां कंपनियों को डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स देना होता है। ऐसे में डिविडेंड पर टैक्स एक ही इनकम पर डबल टैक्स होता है।

दूसरा, सैलरी इनकम पर चुकाया गया टैक्स आमदनी पर कर जैसा होता है। लेकिन जब आप कैपिटल एसेट जैसे रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी या इक्विटी शेयरों में पैसा लगाते हैं तो निवेश आज और टैक्स पेमेंट सेल पर होता है। हम टैक्स एसेट की नॉमिनल वैल्यू पर देते हैं जिसमें इनफ्लेशन के चलते हुआ एप्रिसिएशन शामिल होता है। इसलिए कैपिटल गेंस पर इंडेक्सेशन बेनेफिट लिया जा सकता है। इसमें इनवेस्टर को CBDT के कॉस्ट ऑफ इनफ्लेशन इंडेक्स के हिसाब से कॉस्ट निकालने की सुविधा होती है। इससे टैक्स देनदारी घटती है।

तीसरा, इनकम के साथ दो ऑप्शन मिलते हैं। आज पूरी रकम खर्च कर दें या बाद के लिए बचाकर रखें। देश के पॉलिसी मेकर्स को लगता है कि कमाने वालों की इस क्षमता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। अगर कोई इनकम तुरंत खर्च नहीं करके बचत करता है और देश की आर्थिक तरक्की के वास्ते उसको एसेट क्रिएशन के लिए पूंजी के तौर पर मुहैया कराता है तो उसको बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

निकासी के वक्त टैक्स
कैपिटल गेंस पर कम टैक्स रखकर रिस्की वेंचर, अनजाने बिजनेस, बिना परख वाले प्रॉडक्ट्स में एंट्री को बढ़ावा दिया जा सकता है। खरीदारी या निवेश को टैक्स फ्री रखने और सेल या रिडेम्पशन पर टैक्स लगाने या कैपिटल गेंस पर टैक्स नहीं लगाने के पीछे आइडिया ये है कि जब पैसा निवेश में लगा रहे उसको बढ़ावा दिया जाए और निकासी के वक्त टैक्स लगाया जाए। लॉन्ग टर्म सेविंग्स के लिए ईईटी व्यवस्था का आधार यही है, जिसमें टैक्स रिडेम्पशन पर लगता है।

Courtesy: NBT

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