मोदी से ट्रम्प तक: मजबूत नेता की मजबूरियाँ  

मोदी से ट्रम्प तक: मजबूत नेता की मजबूरियाँ   

 

ये एक महज संयोग था या आने वाले भविष्य के तरफ इशारा, 8 नवम्बर की शाम में जब  भारत के प्रधानमंत्री 500/1000 के नोटबंदी की घोषणा कर रहे थे, उसके चंद घंटे के बाद विश्व की सबसे बरी लोकतंत्र अमेरिका डोनाल्ड ट्रम्प को चुन कर सभी को भौचक्का कर दिया| मोदी ने अपने टेलीविज़न पर प्रसारित भाषण में 100 करोड़ से ज़्यादा लोगो को संबोधित करते हुए कहे, नोटबंदी से देश का भला होगा, काला धन खत्म  होगा,आतंकवादी गतिविधि पर अंकुश लगेगी | ये अलग बात है नोटबंदी के कारण  बाजार से 86  फीसदी पैसा को वापस करना पड़ा |

 

मोदी सरकार  ने अपने इस फैसले लेने से पहले  कोई  दिशानिर्देश जारी नहीं किया था | यका यक  इस फैसले के पीछे की मंशा बताई गई – काला धन  रखने वाले लोग बचने का रास्ता न खोज पाए| सरकार  बैंक में जनता को पैसा वापस करने दे रही थी लेकिन एक मुश्किल तरीके के अनुरूप| पैसा निकलने और जमा करने पर सख्त कानून थे | अपना ही पैसा निकल नहीं सकते थे | कुछ ऐसा लग रहा था मनो किसी चक्रवर्ती  सम्राट ने एक सुबह अपने राज्य में सभी को रोटी नहीं खाने का आदेश दे दिया हो|

 

उस फैसले के बाद से देश की आर्थिक व्यवस्था में एक अफरातफरी से मची हुई है| इतना ही नहीं सरकार जिस कला धन को ख़त्म करने की बात कर रही थी इन नोटों को बंद करने के बाद, उसी सरकार  2000 लेकर उसको बढ़ावा दिया| नोटबंदी के बाद की प्रक्रिया और सर्कार के एक कदम आगे दो कदम पीछे चलने के रवैये को देखकर सभी नको पता चल गया की सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी| नोटबंदी का आघात  पूरे अर्थव्यवस्था  पर देखा जा सकता है| दिसम्बर के महीने में मोटरसाइकिल के बिक्री में २० फीसदी की गिरावट हुई है|

 

आने वाले शुक्रवार को जब डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति पद की शपथ लगे तो वो मोदी और उनके जैसे विश्व के अनेको राईट विंग पार्टी के मज़बूत नेता कहे जाने वाले लिस्ट में शामिल हो जाएंगे | ये अपने अनूठे तरीके से सरकार चलाने  के लिए जाने जाते है| कभी डर, कभी धमकी, कभी इमोशनल अत्याचार या फिर कभी अपने यका यक लिए फैसले से| भारत के नजरिये से देखे तो ट्रम्प का राष्ट्रपति तक का सफर बड़ा  जाना पहचान सा लगता है| समाज को धर्म, जाती के आधार पर बाट कर, जो लोग खिलाफ है उन्हें देशद्रोही बताकर और झूठे वादे कर के सत्ता पर काबिज  हो जाना | दोनों ही नेता लोगो की ज़मीनी बाते को लेकर अपना भाषण देते है| झूठ और फरेब से उन्हें कोई परहेज़ नहीं, जब तक उनका अपना काम निकलता है| जिस तरह से मोदी ने नोटबंदी की असफलता को आमिर और गरीब के बीच दूरियां ख़त्म करने का जरिया साबित कर दिया वो इसी मानसिकता को दिखता है| गरीब को बताया जाता है आपके पास पैसा था कब जो आप चिंता करते है, मध्यवर्ग को कहा जाता आपका पैसा सुरक्षित है आप टैक्स दे रहे, आप वापस कर सकते है| और यदि तकलीफ है तो उसे सहन कीजिये क्योंकि मोटे धन्ना सेठ और कालाबाज़ारियों को इससे ख़त्म किया जा रहा है|

 

लोकप्रिय राजनीती अक्सर झूठ, ऊँची आवाज़,राष्ट्रभक्ति और लच्छेदार भाषणों में लपेट कर परोसा जाता है| और इस सबसे ऊपर ये सभी के दिलो को छूता है| नोटबंदी जैसे कदम से मोदी ने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सबके मन में अपने लिए एक जानने की उत्सुकता पैदा कर दी | 100 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले देश में ऐसे कितने नेता है जिन्हें हर घर में जाना जाता है| लेकिन नोटबंदी के जरिये मोदी ने वो कर दिखाया जो बहुत ही काम लोग कर सकते|

 

ठीक इसी तरह ट्रम्प अपने ट्विटर अकाउंट से हर रोज़ एक ऐसा ट्वीट करते रहते है जिस से लोग में उन्हें जानने की उत्सुकता बनी रहे| उनके डर को ये आवाज़ देते है और यदि दर नहीं लगता तो डराने का काम करते है| हर सुबह जब अमेरिका उठता है तो डोनाल्ड ट्रम्प अपने ट्वीट से एजेंडा सेट करते हैं, कभी अपनी शेखी बघार के, कभी डरा कर, कभी एक कौम को धमका कर| जब कभी वो फंसते नज़र आते है तो वो अपने ट्वीट के ज़रिये लोगो का ध्यान बंटा देते हैं या उन्हें मुख्य मुद्दे से भटका  देते है|

 

तरीका वही है नोटबंदी वाला |वह मोदी ने नोटबंदी कर सबको अपने पॉकेट में हाथ डालने के लिए मज़बूर किया और अपने होने का एहसास दिलाया, यहाँ ट्रम्प सबको अपने फ़ोन पर उनके ट्वीट को देखने के लिए मज़बूर करते है और अपने होने का एहसास दिलाते है|

 

 

 

अब सवाल ये उठता है क्या मोदी और ट्रम्प जैसे  नेता विश्व  के सबसे बड़े और पुराने डेमोक्रेटिक  व्यवस्था के नियमो में बदलाव लाते  है या उनकी प्रक्रिया के तहत चलते है| मोदी के तीन साल और ट्रम्प के अभी तक के इतिहास को देखे तो अच्छे संकेत नज़र नहीं आ रहे| प्रेस, इंस्टीट्यूशन्स, ज्यूडिशरी सभी में बदलाव लाये जा रहे है| अपने हिसाब से कानून का नया मतलब बनाया जा रहा| संस्थाओ को बिना तोड़े खत्म किये जा रहे| उनके मुख्य और जरूरत के लोगो को नियुक्त नहीं किया जा रहा, संस्था खुद बखुद मर रही है| किस भी विरोध को राष्ट्रविरोधी बता कर दमन की नीति अपनायी जा रही| भय का माहौल कायम किया जा रहा है| अक्सर ऐसे नेता दमन और भय  के सहारे ही अपना गुजर करते हैं| इतिहास पलट कर देखे तो अक्सर ये मजबूत नेता अपने पीछे विध्वंस ही छोड़ कर जाते| शायद इसलिए पुरानी कहावत है- लम्हो ने खता की, सदियों ने सजा पाई |

 

 

 

अविनाश चौधरी-लेखक के ये निजी विचार है|

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