अब्दुल लतीफ ने 30 रुपये महीने से शुरू की थी नौकरी, ‘शराबबंदी’ ने बना दिया ‘रईस’

अब्दुल लतीफ ने 30 रुपये महीने से शुरू की थी नौकरी, ‘शराबबंदी’ ने बना दिया ‘रईस’

शराबबंदी से लोग शराब पीना नहीं बंद कर देते, अब्दुल लतीफ की कहानी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। अक्टूबर 1951 में अब्दुल लतीफ का जन्म हुआ और मई 1960 में गुजरात नया राज्य बना। गुजरात के जन्म के साथ ही राज्य में शराब की खरीद-फरोख्त पर रोक लग गयी। जिस चीज का आदमी सोच-समझकर इस्तेमाल करता है या नहीं करता है उसे नशा नहीं कह सकते। शराब एक नशा है शायद इसलिए उसमें समझदारी ज्यादा दूर तक साथ नहीं देती। शराब बंद होने के बावजूद गुजरात में शराब की मांग खत्म नहीं हुई। इसी मांग को पूरा करके एक मामूली जुआड़ी राज्य का सबसे बड़ा शराब माफिया और फिर गैंगेस्टर बन गया। माना जा रहा है कि शाह रुख खान की आने वाली फिल्म “रईस” अब्दुल लतीफ की जिंदगी पर आधारित है। ये अलग बात है कि खान और फिल्म के निर्देशक राहुल ढोलकिया ने इससे इनकार किया है।

 

अहमदाबाद के दरियापुर के पोपटियावाड़ के तंग इलाके में स्थित एक दो मंजिला इमारत में रहने वाले अब्दुल लतीफ ने अपना जरायम दुनिया में अपना आगाज दूसरों के लिए तस्करी की शराब बेचने से की थी। बहुत जल्द वो समझ गया कि शराब के धंधे में काफी पैसा है और दूसरों के लिए शराब बेचकर वो कभी “रईस” नहीं बन सकता। लतीफ के पुराने साथी बताते हैं कि 1977-78 में लतीफ कालुपुर में जुआ और शराब घर चलाने वाले मंजूर अली के ठेके पर 30 रुपये महीने पर नौकरी करता था। नौकरी के साथ-साथ देसी शराब की थैलियां बेचने से शुरू करके वो अंग्रेजी शराब की बोतलें बेचने लगा। राज्य में शराब की तस्करी का धंधा दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से फैल रहा था। धंधे के साथ ही अवैध शराब के कारोबार  में लतीफ का कद बढ़ रहा था।

पोपटियावाड़ स्थित लतीफ के घर को उसका “क्लब” कहा जाता था। इस घर में आज भी वो तहखाना मौजूद है जिसका इस्तेमाल वो शराब रखने और अपने दुश्मनों को टार्चर करने के लिए “रिमांड रूम” के तौर पर करता था। लतीफ के एक पड़ोसी नाम न देने की शर्त पर कहते हैं, “लतीफ का छोकरा लोग किसी भी बाहरी आदमी को पहचान लेता था। हमें पता ही नहीं था कि वो किस तरह के लोग हैं या कौन लोग उससे शराब लेने आते हैं। उसका इतना खौफ था कि कोई भी ये जानने की कोशिश भी नहीं करता था।” पड़ोसी के अनुसार जब ट्रक के ट्रक शराब उतारी जाती थी तो लतीफ के लोग हर गली के मोड़ पर पुलिस की आमद की निगरानी करते थे। लतीफ के पुराने साथ बताते हैं कि उस समय उसे राजस्थान से तस्करी करके लाए गए हर ट्रक शराब पर उसे करीब डेढ़ लाख रुपये का फायदा होता था।

लतीफ के साथी रहे महबूब सीनियर अब रियल एस्टेट का कारोबार करते हैं। महबूब कहते हैं, “लीकर खुले आम मिलता था। टेबल पर सजाया होता था।” लतीफ के घर के सामने रहने वाले पत्रकार हबीब शेख कहते हैं, “लतीफ शराब का थोकविक्रता था जिसका एक समय गुजरात के लगभग समूचे अवैध शराब कारोबार पर कब्जा था। उसके घर के बाहर शराब के फुटकर विक्रेताओं की लाइन लगती थी।” फुटकर शराब बेचने वाले लतीफ के “क्लब” से शराब खरीद कर ले जाते थे और आम खरीदारों को बेचते थे।

शराब के धंधे में जड़ें जमाने के बाद लतीफ का अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से संबंध बन गया। एक समय उसे गुजरात में दाऊद का एकमात्र आदमी माना जाने लगा। 1992 में गुजरात के पोरबंदर पर दाऊद का हथियारों और विस्फोटकों का बड़ा जखीरा उतरा। पुलिस के अनुसार इस काम को दाऊद के लिए लतीफ ने ही अंजाम दिया और कुछ हथियार और विस्फोटक उसने मुंबई भिजवाए और बाकी अपने गोदाम में रखवा लिया। पुलिस के अनुसार इसी गोला-बारूद और हथियारों का इस्तेमाल 1993 के मुंबई बम धमाकों में किया गया था। 1992 में लतीफ दुबई भाग गया। 1995 में भारत वापस आया। उसी साल गुजरात पुलिस ने उसे दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया। करीब दो साल वो गुजरात के साबरमती जेल में रहा। पुलिस के अनुसार 1997 में एक मामले की जांच के बाद जेल वापस लाए जा रहे लतीफ ने भागने की कोशिश की और मुठभेड़ में मारा गया।

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