नोटबंदी ने मारा, खेत उदास, करघा ठप और कपड़ा उद्योग के उतर गए रंग

नोटबंदी ने मारा, खेत उदास, करघा ठप और कपड़ा उद्योग के उतर गए रंग

मुंबई, भिवंडी और अहमदाबाद: एक समय में एशिया का मैनचेस्टर कहा जाने वाला शहर अब पुराना पड़ गया है। गंदा दिखता है और हर तरफ उदासी पसरी हुई है। शहर की जिंदगी में कोई उत्साह नहीं दिखता। कपड़े के स्टार्च, कचरे और सीवेज की बदबू से माहौल और भी खराब लगता है।

 

सदी के इस मोड़ पर मुंबई से 30 किलो की दूरी पर बसा भिवंडी शहर बांग्लादेश और वियतनाम से प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ गया है। अप्रैल 2016 के ‘इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 65 लाख बिजली चालित करघों में से छठा हिस्सा भिवंडी में लगा हुआ है।  बिजली चालित करघे से यहां मतलब उस मशीन से है, जिससे सूत के कपड़े का निर्माण होता है। 15 लाख की आबादी के साथ यह शहर एक समय में भारत में कपास अर्थव्यवस्था का एक मजबूत खिलाड़ी था। वर्ष 2015 की इस सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, यह शहर अकेले 25 लाख श्रमिकों को रोजगार दे रहा था। यानी यह शहर कृषि के बाद रोजगार देने वाला दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता था।

 

8 नवंबर 2016 के बाद से जब देश में 86 फीसदी नोटों को अमान्य घोषित किया गया, भिवंडी की स्थिति और बद्तर हो गई है। भारतीय कपड़ा उद्योग पहले से ही निर्यात में हुए गिरावट, कम उत्पादकता और बढ़ती कीमतें जैसी चुनौतियों का सामना कर रही थी, उपर से यह नोटबंदी। कपड़ा उद्योग का संकट और बढ़ गया। जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है। मजदूर ठेकेदार 65 वर्षीय असद फारूकी पिछले 30 वर्षों से कपड़ा उद्योग से जुड़े हैं। लगभग 100 से ज्यादा बिजली करघों को चलाने का अनुभव है। असद कहते हैं, “नोटबंदी ने हमको पांच साल पीछे फेंक दिया है।”

 

असद का 34 वर्षीय बेटा आफताब अपने पिता के साथ काम करता है। आफताब अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि उनका समय कितने समृद्धि में बीता है। वह बताते हैं कि उस समय एक खेप के लिए 20,000 रुपए की कमाई मामूली सी बात थी।

 

चेहरे पर फीकी मुस्कान के साथ आफताब कहते हैं, “पिछले महीने, हमने अपने सभी करघे के कारोबार से 17,000 रुपए की कमाई की है।” 6.5 फीसदी की औसत मुद्रास्फीति की दर के अनुसार 1996-97 के 20,000 रुपए का मतलब आज की तारीख में 70,000 रुपए हुआ।

 

विकेन्द्रीकृत बिजली करघे और बुनाई, कपड़ा उद्योग के ये दो सबसे बड़े घटक हैं। इन दोनों का भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 2 फीसदी का योगदान है। 11 लाख बिजली करघे के साथ, महाराष्ट्र भारत के सबसे बड़ी बिजली करघा राज्यों में से एक है। यह भिवंडी, मालेगांव, धुले, सांगली और शोलापुर में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है।भिवंडी टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष, मन्नान सिद्दीकी कहते हैं, “भिवंडी के बिजली करघों में से  अभी केवल 20 फीसदी ही चल रहे हैं।” मन्नान सिद्दीकी, 20 से अधिक वर्षों से भिवंडी के करघों को पुनर्जीवित करने के प्रयास में जुटे हैं।

 

मुबंई से 270 किमी उत्तर पूर्व बसा मालेगांव भी इसी तरह बिजली के करघे चलाने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 में विस्तार से बताया है।

 

इंडियास्पेंड ने खेत से लेकर करघों तक नोटबंदी के प्रभावों की जांच करने के लिए जिन भी इलाकों का दौरा किया है, उनमें भारत में कपड़ा आपूर्ति श्रृंखला में भिवंडी का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि, ऐसा कोई समेकित आंकड़ा नहीं है, लेकिन पहले से संघर्ष कर रहे इस क्षेत्र में हमने उत्पादन में कटौती, नौकरी नुकसान और राजस्व में गिरावट पाया।

 

इस आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण भाग है नकद। किसान से लेकर सूत कारखाना, सूत व्यापारी, बिजली करघे के कपड़ा निर्माता, थोक व्यापारी और फुटकर बिक्री से उपभोक्ता तक। रंगरेज, ज़िप और बटन लगाने वाले और रोजाना कपड़ों की गांठ उठाने वाले दिहाड़ी मजदूर इस श्रृंखला के सबसे गरीब लोगों में से हैं, जिनपर नोटबंदी का सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है। हमने उपभोक्ताओं के बीच डेबिट कार्ड का इस्तेमाल और निर्यात सौदों के लिए काफी हद तक बैंक के माध्यम से लेन-देन देखा  है, लेकिन यह बहुत कम है।

 

कपड़ा क्षेत्र ने विशेष रूप से महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है।

 

वितनाम, बंगलादेश से प्रतिस्पर्धा में वृद्धि

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Source: International Trade Centre

 

पिछले तीन वर्षों में 499,000 के आंकड़े जोड़ने के साथ कपड़ा उद्योग भारतीय औपचारिक क्षेत्र में नौकरियों के लिए सबसे बड़ा क्षेत्र रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है। कुछ मजबूत अंतरराष्ट्रीय प्रमाण हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा करने और मजदूरी-आय में वृद्धि में निर्यात हमेशा मदद करते हैं।

 

बाजार की मांग में गिरावट

 

मुबंई के सबसे बड़े कपड़ा बाजार, मंगलदास बाजार के एन चंद्रकांत ने कहते हैं कि नवंबर से फरवरी तक चलने वाले सर्दियों और शादी के खरीदारी के मौसम में व्यापार सामान्य से 20 फीसदी कम हुआ है। नोटबंदी के पहले सप्ताह के दौरान कोई व्यवसाय नहीं हुआ था।

चंद्रकांत कहते हैं, “ग्राहक साधारण और सादे माल खरीद रहे हैं और महंगी वस्तुओं के मांग में गिरावट हुई है। लोग काफी किफायती हो गए हैं।”

 

कृपेश भयानी मंगलदास बाजार के एक और कपड़ा और परिधान के खुदरा विक्रेता हैं। भयनी परिधान निर्माता भी हैं, जो मुंबई के उपनगरीय इलाके में 17 आयातित कपड़े-बुनाई मशीन चलाते हें। वह कहते हैं कि विनिर्माण पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा है, लेकिन कपड़ों को पूरी तरह पूरा करने में जैसे कि बटन और जिप लगाने जैसे काम पर इसका असर हुआ है। भयानी इन कामों को बाहर के लोगों से कराते हैं, जहां नकद ही चलता है।

 

 

इंडियास्पेंड से बात करते हुए कुछ व्यापियों ने बताया कि कपड़ों की मांग में 30 फीसदी की गिरावट हुई है, जबकि थोक मांग में 50 फीसदी की गिरावट देखी गई है।

 

प्रीमियम कपड़ा फुटकर बिक्रेता, मुकेश पंचामत्य उन कुछ व्यापारियों में से हैं, जिन्हें कोई शिकायत नहीं है। वह कहते हैं कि, “मांग में तत्काल कमी के बाद अब हम काफी हद तक ट्रैक पर हैं। हमारी आधे से ज्यादा बिक्री डेबिट कार्ड के माध्यम से होती है। ” हालांकि अन्य लोगों की स्थिति ऐसी नहीं है।

 

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मुकेश पंचामत्य के यहां डेबिट कार्ड के माध्यम से होने वाली बिक्री में वृद्धि हुई है, जबकि मोबाईल के माध्यम से भुगतान अब भी नहीं हो रहे हैं।

 

‘मंगलदास बाजार क्लॉथ मर्चेंट्स एसोसिएशन’ के सचिव भरत ठक्कर कहते हैं, “ आमतौर पर नवंबर से फरवरी के मौसम के दौरान हमारे बाजार में पूरे दिन भीड़ रहती है। आमतौर पर हरेक ग्राहकों को देखने में बिक्रेताओं के बीच भागदौड़ मची रहती है। लेकिन आज ये खाली दुकानें ही आपको पूरी कहानी बताएंगे।”

 

ठक्कर कहते हैं, 500 रुपए की कमी भी एक बड़ी समस्या थी। मार्केट एसोसिएशन के सचिव, राजेश अग्रवल के अनुसार, अहमदाबाद के न्यू क्लॉथ मार्केट में 80 फीसदी व्यापार की गिरावट हुई है। उन्होंने बताया कि कैसे नोटबंदी के बाद उनके 80 में से 60 कढ़ाई श्रमिक अपने गांव लौट गए । निर्यात को छोड़कर, बिक्री में गिरावट के बाद उनके पास भी नकद की कमी हुई। जिससे वे श्रमिकों को भुगतान नहीं कर सकते थे। उन्होंने बताया कि बैंकों के भीड़-भाड़ में खाते खुलवाने की बजाय श्रमिकों ने कुछ दिन बेरोजगार रहना स्वीकार किया।

 

“नोटबंदी के तत्काल असर के रुप में उपभोक्ताओं के खर्च करने की धीमी गति का असर परिधान और वस्त्र उद्योग एवं अन्य उत्पादों की घरेलू मांग में मंदी के रुप में हुआ है” जैसा कि ‘द फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ ने 3, दिसंबर 2016 की इस रिपोर्ट में बताया है।

 

नतीजतन  खुदरा विक्रेताओं ने थोक व्यापारियों को दिए कपड़े के आर्डर से रद्द कर दिए । थोक व्यापारी सुधीर पारेख बताते हैं कि किस प्रकार नवंबर के आस-पास जब त्योहारों की खरीदारी, सर्दियों और शादी की खरीदारियों का  मौसम आता है तो बाजार में तेजी आ रही थी और 8 नवंबर के बाद बाजार धीमा हो गया।

 

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सुधीर पारिख 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा से पहले कपड़े ले कर आए थे और अब तक उसकी बिक्री नहीं हुई है।

 

मुंबई के मुलजी जेठा थोक कपड़ा बाजार में काम करने वाले पारेख कहते हैं, “मेरे दुकान पर अब बेचे जाने वाले सामानों की सूचियों का भंडार है, बस। मेरे पूंजी ठहर गई है।कोई खुदरा या परिधान निर्माता मुझ से सामान खरीद नहीं रहा है। मेरे कपड़े पड़े हुए हैं और मेरे पास कपड़ा मिल से और कपड़ा खरीदने के लिए कोई रास्ता नहीं है। मैं फंस गया हूं।”

 

वस्त्र आपूर्ति श्रृंखला का यह भाग पूरी तरह से नकदी है। उपभोक्ता खुदरा विक्रेताओं को नकद में भुगतान करते हैं, जो थोक विक्रेताओं को भी नकद में ही भुगतान करते हैं। क्योंकि नकद में लेन-देन करना उनके लिए सुविधजनक है। ऐसे थोक विक्रेता जो कपड़ा मिल को बड़े ऑडर देते हैं, वे चेक या अन्य तरीकों द्वारा बैंक के माध्यम से भुगतान करते हैं। वर्तमान में नकदी की कमी के कारण ऐसा नहीं हो रहा है।

 

इसके अलावा  नकदी का उपयोग कई खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं के लिए करों से बचने का साधन भी बनता है। पारिख कहते हैं कि वे कैशलेस काम करने के लिए तैयार थे लेकिन उनकी यह क्षमता उनके खुदरा विक्रेताओं और ग्राहकों पर निर्भर करता है। हालांकि, बिना नकद लेन-देन से  कपड़ा मिलों से बनने वाले कपड़ों की खरीद बड़ा मात्रा में प्रभावित हो रही हैं। चाहे वह महाराष्ट्र की मिलें हों, गुजरात की मिलें हों या फिर तमिलनाडू की मिलें हों।

 

श्रमिकों पर धीमे व्यापार का असर, काम खोजना हुआ मुश्किल

 

भिवंडी में जब हमने 40 वर्षीय सुलेमान राहिल और सैयद नासर अली से मुलाकात की तो उनके पास कोई काम नहीं था। दोनो मजदूर करघा चलाते हैं। दोनों उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से हैं, और दोनों के ही पांच-पांच बच्चे हैं।

 

नोटबंदी से पहले राहिल और अली दोनों प्रति माह 15,000 रुपए कमा लेते थे। लेकिन नोटबंदी की घोषणा के बाद दोनों की कमाई में एक-तिहाई का नुकसान हुआ है। इनके पास फिलहाल काम नहीं हैं। इनका ज्यादातर समय काम की तलाश में ही बीतता है । दोनों खेती और छोटे-मोटे काम कर गुजारा कर रहे हैं।

 

अली कहते हैं, “पहले जेब में 400-500 रुपए होते थे। अब चाय-पानी भी मुश्किल हो गया है। छह बच्चों के सथ परिवार का गुजार 500 रुपए में कैसे हो पाएगा।’

 

भिवंडी के श्रम ठेकेदार अशोक आहूजा 60 बिजली करघे के मालिक हैं। आहूजा बताते हैं कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के विभिन्न ग्रामीण जिलों से उनके आधे से अधिक मजदूर काम की कमी के बाद अपने गांव लौट गए हैं।

 

हालांकि कुछ मजदूर वापस आ रहे हैं। आहूजा ने 2 जनवरी, 2017 को भिवंडी में अपने करघे को पुनः आरंभ किया है। आहूजा ने नोटबंदी की घोषणा के बाद थोक विक्रेताओं द्वारा ऑडर रद्द करने के बाद अपना करघा बंद कर दिया था।

 

बिजली करघा मालिकों के लिए  नोटबंदी के पहले कीमतों में उतार-चढ़ाव, अब स्थिति बद्तर

 

भिवंडी में सिद्दीकी का मानना है कि चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश की नीतियों से उनके वस्त्र उद्योग को लाभ हुआ है, जबकि भारत की नीतियों ने उनके जैसे करघा मालिकों को कमजोर कर दिया है, जिन्हें केवल कम मांग ही नहीं बल्कि पिछले चार सालों से रोज हो रहे कीमतों में बदलाव से भी निपटना पड़ता है।

सिद्दीकी कहते हैं कि, सूत जो वे मुबंई से खरीदते हैं, उसकी कीमत दिन में बदलती है, “जैसे की शेयर बाजार”, जैसा कि सूत व्यापारी दैनिक मांग के अनुसार कीमत बढ़ाते या कम करते हैं।

 

श्रम ठेकेदार आहूजा कहते हैं, “20 दिसंबर, 2016 को नोटबंदी के प्रभाव से उबरने के बाद जब हम अपना काम दोबारा शुरु करने की सोच रहे थे, तब सूत की कीमत प्रति किलो 156 रुपए थी। 4 जनवरी 2016 को यह कीमत 178 रुपए हो गई थी।”

 

जब सिद्दीकी के परिवार ने सूत खरीदा तो इसकी कीमत 200 रुपए प्रति किलो थी। सिद्दीकी कहते हैं, “करीब 10 किलो सूत 100 मीटर कपड़ा बनाने के लिए पर्याप्त होता है,जो आम तौर पर 30 रुपए प्रति मीटर पर बेचा जाता है।”

 

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खुद के कारखाने में तैयार कपड़ों के साथ मन्नान सिद्दीकी

जिस दिन हमने बाजार का दौरा किया उस दिन, 100 मीटर कपड़ा उन्होंने 3,000 रुपए में बेचा। उसमें से 2,000 रुपए सूत खरीदने में चले गए। बचे हुए 1,000 रुपए में सिद्दीकी को अपने मजदूरों, बिजली और मशीन के रखरखाव के लिए भुगतान करना था।

 

सिद्दीकी जो कपड़े 30 रुपए प्रति मीटर पर बेचते है, वह कारखानों द्वारा रंगे और प्रसंस्कृत किए जाते हैं। फिर इसकी कीमत खुदरा दुकानों पर 150 से 200 रुपए प्रति मीटर हो जाती है। वह पूछते हैं, “तो पैसा कौन बनाता है?” वह कहते हैं, “नोटबंदी के पहले भी मेरा कारोबार कठिन परिस्थिति से गुजर रहा था। और इस नोटबंदी ने कमर तोड़ दी है।”

 

बहुत हद तक निर्यात ने बचाया है सूत निर्माताओं को

 

सूती कपड़े बनाने में मुख्य कच्चा माल है सूत। यह शायद कपड़ा आपूर्ति श्रृंखला का एकमात्र चरण है, जिस पर नोटबंदी का असर नहीं हुआ है। क्योंकि सूत निर्माण का 33 फीसदी कपड़ा बनाने वाले अन्य देशों जैसे कि चीन और बांग्लादेश के निर्यात किया जाता है। ये सौदे बैंक हस्तांतरण के माध्यम से होते हैं और नकद का इसमें कोई लेना देना नहीं है।

 

सूत कंपनियां अपना पूर्ण उत्पाद केवल व्यापारियों को ही भेजती हैं जो फिर उसे घरेलू कपड़े निर्माताओं को बेचते हैं। इस लेन-देन में मध्यवर्ती व्यापारी शामिल होते हैं, जो नकद और चेक दोनों में थोक मात्रा में खरीदते हैं। अहमदाबाद, गुजरात, कोयंबटूर और तमिलनाडु से कंपनियां कहती हैं कि उनकी बिक्री पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा है क्योंकि विदेश सहित विभिन्न खरीददारों को वे माल बेच रहे हैं।

 

सुपर स्पिनिंग मिल, कोयम्बटूर के प्रबंधक के कृष्णमूर्ति ने टेलीफोन पर बात करते हुए कहा “नोटबंदी के बाद हमारे कुल मांग में कमी आई है, लेकिन हमारे व्यापार पर खास फर्क नहीं पड़ा ह। कपड़ा आपूर्ति श्रृंखला में सबसे पहला बिंदू किसान द्वारा ओटाई मिल को अपना उत्पाद बेचना है और अंतिम बिंदू खुदरा विक्रेता द्वारा ग्राहकों को कपड़े बेचना है जो मुख्य रुप में नकद में होता है।”

 

कृष्णमूर्ति कहते हैं, “किसानों के साथ-साथ आपूर्ति श्रृंखला, जो बहुत छोटे या घरेलू स्तर पर काम करते हैं उन पर नोटबंदी का प्रभाव पड़ा है।”

 

अहमदाबाद, गुजरात  से 50 किमी पश्चिम कड़ी में  पशुपति कताई और ओटाई मिल का जब हमने दौरा किया तो तो वहां इसका प्रभाव नजर नहीं आया। यह 24 घंटे काम करता है और प्रतिदिन 13,000 किलो सूत का उत्पादन करता है।

 

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गुजरात के अहमदाबाद से 50 किमी पश्चिम कड़ी के कारखाने में एक कताई मशीन द्वारा अच्छी क्वालिटी वाले सूत का उत्पादन। इन सूतों का यहां से निर्यात होता है।

 

कताई डिवीजन के प्रबंध निदेशक ए पी पटेल कहते हैं, “हम जो भी सूत का उत्पादन करते हैं, वे सब निर्यात किए जाते हैं। नोटबंदी का कोई प्रभाव हम पर नहीं हुआ है।”

 

हालांकि,उसी मिल में ओटाई सुविधा (जहां सफाई की जाती है और कच्चे कपास से बीज-मुक्त कपास निकाला जाता है) अपनी आधी क्षमता पर काम कर रहा था। नवंबर और जनवरी के बीच की मंदी के कारण कपास किसान बिना नकद भुगतान माल देने के लिए राजी नहीं हो रहे थे।

 

पशुपति मिल्स में ओटाई सुविधा चलाने वाले मुकेश पटेल कहते हैं, “मिल पर हर दिन करीब 30 गाड़ी भर के कपास आते हैं। 6 जनवरी को कपास बेचने के लिए हमारे पास केवल पांच गाड़ियां आई थी। नोटबंदी के बाद गाड़ियों की सबसे बड़ी संख्या हमने 15 देखी है।”

 

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A ginning unit (in the yarn factory in Kadi, Ahmedabad) has been shut as farmers were not accepting cheques for selling cotton.

 

किसानों द्वारा चेक स्वीकार नहीं किए जाने के बाद अहमदाबाद के कड़ी में धागा फैक्टरी के एक ओटाई इकाई को बंद करना पड़ा था।

 

पटेल कहते हैं, “किसान केवल नकद ही स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें अपने खेतों पर श्रमिकों को नकद में ही भुगतान करना होता है। कैशलेस यहां काम नहीं करेगा।”
अनुसंधान एजेंसी, आईसीआरए की दिसंबर 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, “8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा सो बाजार में कपास आने में देरी हुई है। इसका कारण किसानों को नकद भुगतान का व्यापक प्रसार होना है।”

किसानों को नकदी का इंतजार,  खेत मजदूरों का इंतजार और भी लंबा

 

पशुपति मिल्स को एक किसान वासुदेवभाई चावड़ा ने अपना कपास बेचा था। चावड़ा को नकद में भुगतान के लिए मिल के बाहर दो दिन तक इंतजार करना पड़ा है। उन्होंने हमें बताया कि वह चेक स्वीकार क्यों नहीं करते हैं।

 

चावड़ा कहते हैं, “मेरे सहकारी बैंक में चेक को क्लियर होने में एक सप्ताह का समय लगता है। और उसके बाद ही मैं नकद निकाल सकता हूं। जो मजदूर मेरे खेत पर काम करते हैं, उन्हे यदि मैं चेक में भुगतान करुं तो शायद वे काम बंद कर सकते हैं। मैं यह जोखिम नहीं ले सकता हूं। और उनके पास बैंक खाते नहीं हैं तो इसका सवाल भी नहीं उठता है।”

 

पटेल चिंतित हैं क्योंकि उनका कारखाना, जो चार महीनों के लिए 24 घंटे चलता था, वो अब आठ महीनों के लिए 12 घंटे ही चलेगा क्योंकि अब काफी समय तक उसे किसानों से धीमी गति से कपास मिलेगा।

 

पटेल कहते हैं, “इस वर्ष मेरी श्रम लागत दोगुनी हो जाएगी और कारखाने को चलाने की लागत में भी वृद्धि होगी। इस वर्ष हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है…है क्या? ”

 

(पहले इंडियास्पेंड में प्रकाशित )

 

 

 

 

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