पश्चिम उत्तरप्रदेश: चीनी के कटोरे से दंगों का केंद्र तक  का  आंकलन पार्ट-१

पश्चिम उत्तरप्रदेश: चीनी के कटोरे से दंगों का केंद्र तक  का  आंकलन पार्ट-१
  • पश्चमी उत्तर प्रदेश में 15 ज़िलों के 73  विधानसभा सीट पे पहले चरण में मतदान होना है|
  • भाजपा ने पश्चमी उत्तर प्रदेश को सोशल एक्सपेरिमेंट करने के लिए प्रासयोगसाला की तरहप्रयोग किया है|
  • मुस्लिम समुदाय का जनसँख्या 25 फीसदी है जो की यूपी के 17 फीसदी से काफी ज़्यादा है|
  • यहाँ जाट समुदाय 11 फीसदी गुज्जर 13  फीसदी है|

यूपी में चुनावी मौसम है और 11 फवरी को पहले चरण का मतदान होने वाला है| राजनीतिक पार्टिया अपनी सारी  ताकत झोक दी है जनता को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए|  पहले चरण का मतदान पश्चमी उत्तर प्रदेश से शुरू होने वाला है| चलिए हम जानते है पश्चमी उत्तर प्रदेश से जुड़ी कुछ दिलचस्प बाते|

पश्चमी उत्तर प्रदेश में शामिल  है 15 ज़िला- शामली , मुज़्ज़फरनगर, बागपत, मेरठ, ग़ाज़ियाबाद , गौतमबुद्ध नगर , हापुर, बुलंदसहर , अलीगढ, मथुरा, हाथरस, फ़िरोज़ाबाद, इटहा और कासगंज | पश्चिम  उत्तरप्रदेश की जनसंख्या लगभग 7.674  करोड़  है | यहाँ का परकैपिटा आमदनी  15869  रुपये है जो की यूपी के 12136  रूपये  से काफी ज़्यादा है| पश्चमी उत्तर प्रदेश में 15 ज़िलों के 73  विधानसभा  सीट पे पहले चरण में मतदान होना है|

राजनीती के बिसात पे पश्चमी उत्तर प्रदेश का काफी महत्व है|  भाजपा ने इसे 2013  से अपना सोशल एक्सपेरिमेंट करने के लिए प्रासयोगसाला  की तरह प्रयोग किया है| 2013 का साम्प्रदयिक दंगा और उसके बाद का ध्रुवीकरण पश्चमी उत्तर प्रदेश  से ही शुरू हुआ था| 2013 का  सांप्रदायिक दंगा इस इलाके को हमेसा के लिए छतिग्रस्त कर दिया है| इसमें सबसे बड़ा जो नुकसान हुआ है वो ये की दंगा अब गाँव में फ़ैल चुका है| सदियो से आ रहा  सामजिक सद्भाव बिखर गया  है| शायद यही कारण है की मुज़्ज़फ़रनगर से, अख़लाक़ तक और अब करना सबका केंद्र पश्चिमी उत्तर है|

पश्चिम उत्तर प्रदेश एक और कारण से महत्वपूर्ण है| यहाँ मुस्लिम समुदाय का जनसँख्या 25 फीसदी है जो की यूपी के 17 फीसदी से काफी ज़्यादा है| यहाँ जाट समुदाय 11 फीसदी  गुज्जर 13  फीसदी है|  पश्चिम उत्तर प्रदेश में जहा ज़मीन जाट समुदाय के पास है वही बिज़नस और लेबर में  मुस्लमान समुदाय के लोग काफी ज़्यादा है| इन सबमे जो एक बात सामान्य है की पश्चिम उत्तर प्रदेश में खेती सबसे बड़े रोज़गार का जरिया है| पश्चिम उत्तर प्रदेश  को गन्ने का कटोरा भी कहा जाता है| गनी की खेती से लेकर इनके समर्थन मूल्य और मिलो में बकाया पैसा यहाँ का मुख्य मुद्दा रहता है| 2015-16 में अकेली 2276. 97 करोड़ रूपये बकाया है यहाँ के लोगो का मिलो पे|

2014 के लोकसभा चुनाव में दंगा के अलावा जो मुख्य कारन थे वो भाजपा और मोदी के द्वारा किये गए वादे- मोदी ने किसानों से वादा किया था डेढ़ गुना ज्यादा समर्थन मूल्य देने का और 6 महीने के अंदर चीनी मिलो का बकाया भुगतान देने का| तीन साल बीतने को आए  दोनों में से कुछ भी नहीं मिला| लेकिन इस से भी ज़्यादा बार मुद्दा है जाट आरक्षण का, भाजपा ने इसे खूब भुनाया लोकसभा के चुनाव के वक़्त, जाट को आरक्षण का वादा किया गया लेकिन जाट समुदाय के लोग इस पे भी ठगे से हुए महसूश  कर रहे है|

इस बार जाट तबके का झुकाव अजित सिंह की तरफ साफ दिख रहा है। किसान समुदाय केलोग अभी भी भाजपा को  जमीन अधिग्रहण बिल के लिए माफ नहीं किए  है| यहाँ ये बतलाना ज़रूरी हैकी पश्चिम उत्तर प्रदेश से ही २००७ में कांग्रेस उपाध्यक्ष ने ज़मीन अधिग्रहण की खिलाफ आंदोलनशुरू किये थे जिसका अंत मायावती जी के हार पे हुआ| उसके बाद से लेकर अभी तक मायवती जी यूपीकी राजनीती  ज़मीन तलाश रही है|

पश्चिम यूपी की बात हो और अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल की बात नहीं हो तो बात अधूरी होगी|पश्चिम उत्तरप्रदेश में हमेसा से अजित सिंह की पार्टी को जनसमर्थन रहा| २०१४ का चुनाव में उन्हेंमुह की खानी  पड़ी जब जाट उन्हें छोर कर भाजपा का साथ दिया लेकिन इस बार लगता है जाट फिरसे अजित सिंह की तरफ जा रहे है| और यदि ऐसा हुआ तो 11 मार्च को अजित सिंह के पास  यूपी केसत्ता के ताले की चाभी होगी| नोटबंदी के कारण पहले तो कारोबार चौपट हुआ, अब आयकर के नोटिस आने से नींद उड़ गई है। परंपरागत बनिया वोट भाजपा नाराज है। हकीकत तो यह है कि यूपी का यह चुनाव एकदम शांत माहौल में लड़ा जा रहा है। न किसी की आंधी है और न किसी के खिलाफ आंधी।

 

Categories: Opinion