यूपी चुनाव: शुरुआती चरणों में ज्यादा, बाद में कम मतदान दे रहा क्या संकेत?

लखनऊ
यूपी चुनाव में अब तक हुए पांच चरणों में मतदान का गिरता प्रतिशत चुनावी पंडितों के लिए एक संकेत है कि हवा इस बार किस ओर बह रही है। पश्चिमी यूपी से शुरू हुए चुनाव के पहले चरण में मतदान का जो आंकड़ा 64% था, वह पूर्वी यूपी में पांचवां चरण आते आते 57% तक गिर गया। चुनाव को लेकर जनता का यह रुझान बड़े राजनीतिक दलों का गणित बिगाड़ सकता है। दरअसल, कुल मतदान का प्रतिशत भले गिरा हो, पर जिन जिलों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 30% से ज्यादा है, वहां वोटिंग ज्यादा हुई है।

यूपी चुनाव के पहले चरण में जिन जिलों में वोटिंग हुई उनमें मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ और गाजियाबाद भी शामिल थे। इन सभी जिलों में जाटों और मुसलमानों की संख्या काफी ज्यादा है। यहां मतदान का प्रतिशत 64.2% रहा, जिससे साफ हो गया कि 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के जख्म लोगों को अब भी दर्द देते हैं। गौतमबुद्ध नगर के दादरी में कथित तौर पर घर में ‘बीफ’ रखने को लेकर हुई अखलाख की हत्या 2015 में देशव्यापी मुद्दा बना जिससे दो समुदायों के बीच खाई और चौड़ी हो गई। मतदान का यह आंकड़ा इसी बात की ओर इशारा कर रहा है।

दूसरे चरण में बरेली, मुरादाबाद, सहारनपुर, बदायूं और रामपुर जिलों में मतदान हुआ। इस चरण में वोट प्रतिशत 65.2% रहा। इन जिलों में भी मुसलमानों की संख्या अच्छी खासी है जिन्होंने बड़ी संख्या में वोटिंग की। राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष मिश्रा कहते हैं, ‘इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि 80 लोकसभा सीटों वाले प्रदेश में एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है। यह एक बड़ी वजह हो सकती है कि मुसलमानों ने बीजेपी को यूपी की सत्ता में आने से रोकने के लिए बड़ी संख्या में वोट डाला हो।

मतदान जब मध्य और पूर्वी यूपी की ओर बढ़ा तो वोटरों के रुख में कुछ बदलाव देखने को मिला। 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां 57% लोगों ने वोट दिया था। 2017 में यह आंकड़ा 57.4% रहा। पूर्वी यूपी प्रदेश का सबसे पिछड़ा इलाका है और यहां से बड़ी संख्या में रोजगार के लिए पलायन होता है। छोटी खेती-किसानी के अलावा रोजगार के साधन यहां सीमित हैं।

लोगों को लगता है कि चुनाव से कुछ नहीं बदलने वाला और वे इससे दूर ही रहना ठीक समझते हैं। यही वजह है कि लोगों को चुनाव से जोड़ने के लिए सभी पार्टियों ने जाति और धर्म की भावनाओं को उकसाने की कोशिश की, बार-बार उसका जिक्र किया गया। पूर्वी यूपी के गोंडा में पीएम मोदी में जब कानपुर रेल हादसे के टेरर लिंक का जिक्र किया तो इसे साफ तौर पर ध्रुवीकरण की कोशिश के तौर पर देखा गया। लेकिन फिर भी लोगों पर इसका कोई असर होता नजर नहीं आया और महज 57% लोगों ने ही वोट डाले।

अब ऐसे में लोगों को मन में यही सवाल है कि शुरुआती चरणों में बेहतर रहा मतदान प्रतिशत बाद में कम होने का नुकसान किसको सबसे ज्यादा होगा और किसे इसका फायदा मिलेगा।

Courtesy: NBT
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