मनरेगा की मजदूरी में एक रुपये की बढ़ोतरी मजाक नहीं सच है

मनरेगा की मजदूरी में एक रुपये की बढ़ोतरी मजाक नहीं सच है

केंद्र ने मनरेगा की मजदूरी में बढ़ोतरी की है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कई राज्यों में इसका आंकड़ा एक रु है जबकि ओडिशा में दो और पश्चिम बंगाल में महज चार रु

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गारंटी देने वाली योजना की दैनिक मजदूरी में सालाना बढ़ोतरी हैरान करने वाली है. द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत कई राज्यों में दैनिक मजदूरी महज एक रूपये ही बढ़ाई है. यह मनरेगा के तहत बीते 11 साल की सबसे कम बढ़ोतरी है जो एक अप्रैल से लागू हो जाएगी.

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार मनरेगा के तहत असम, बिहार, झारखंड, उत्तरखंड और उत्तर प्रदेश में दैनिक मजदूरी एक रुपये, ओडिशा में दो रुपये और पश्चिम बंगाल में चार रुपये बढ़ाई गई है. अन्य राज्यों की तुलना में केरल और हरियाणा में सबसे ज्यादा 18 रुपये की बढ़ोतरी की गई है. इसके तहत मनरेगा मजदूरों को अब असम में 183, बिहार और झारखंड में 168, ओडिशा में 176, उत्तराखंड में 175 और पश्चिम बंगाल में 180 रु मिलेंगे.

एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस बार मनरेगा की दैनिक मजदूरी 2.7 प्रतिशत बढ़ाई गई है, क्योंकि महंगाई दर खास तौर पर पूर्वोत्तर राज्यों में काफी कम रही है. हालांकि, केवल महंगाई दर के आधार पर वेतन बढ़ोतरी की इस दलील पर सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि सरकार अपने कर्मचारियों के मामले में इस दलील को नहीं मानती जिसने सातवें वेतन आयोग की सिफारिश के आधार पर मंहगाई भत्ते के रूप में अपने कर्मचारियों का वेतन 20 फीसदी बढ़ाया है.

समस्या मनरेगा के तहत दैनिक मजदूरी में कम बढ़ोतरी की ही नहीं है, बल्कि इसमें और राज्यों द्वारा तय की जाने वाली न्यूनतम मजदूरी में अंतर भी लगातार बढ़ रहा है. उदाहरण के लिए असम में न्यूनतम मजदूरी 240 रुपये है, जबकि मनरेगा की नई मजदूरी 183 रुपये ही पहुंच पाई है. इसी तरह बिहार में न्यूनतम मजदूरी 181 रुपये है, जबकि मनरेगा की दैनिक मजदूरी 168 रुपये पर अटकी है. यह अंतर मनरेगा की मजदूरी को ‘राज्यों के कृषि मजदूरों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ (सीपीआईएएल) से जोड़ने के बाद पैदा हुआ है.

मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यक्रता निखिल डे का कहना है कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ है, जिसमें किसी श्रमिक को राज्य की न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान बंधुआ मजदूरी जैसा बताया गया है. उनके मुताबिक केंद्र सरकार ने 2014 में महेंद्र देव समिति की सिफारिश के आधार पर मनरेगा मजदूरी और न्यूनतम मजदूरी के अंतर को घटाने की बात मानने के बाद कोई कदम नहीं उठाया है. निखिल डे का यह भी कहना है कि महेंद्र देव समिति ने 2014 को आधार वर्ष मानकर मजदूरी की दो तरह की दरें लाने और इनकी समीक्षा ‘ग्रामीण मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ के आधार पर करने की सिफारिश की थी जो सीपीआईएएल से ज्यादा होता है.

अधिकारियों का कहना है कि समिति की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था, क्योंकि वित्त मंत्रालय ने आधार वर्ष के आधार पर मनरेगा मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी के बराबर लाने की सिफारिश पर सवाल उठाया था. इसके लागू होने पर पहले ही साल राजकोष पर कम से कम 3,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आता. हालांकि, मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक अतिरिक्त सचिव नागेश सिंह के नेतृत्व में एक समिति न्यूनतम मजदूरी तय करने की एक समान प्रक्रिया लाने के लिए राज्यों से बात कर रही है. अगर इसमें सफलता मिलती है तो मनरेगा की मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी के बराबर लाया जा सकता है.

Courtesy: Satyagrah

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