जब ईवीएम से हारे और बैलट पेपर से जीते थे कांग्रेसी नेता

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ईवीएम मशीनों में घोटलों की खबरों को लेकर रोज नये खुलासे हो रहे हैं। ईवीएम मशीन के साथ छेड़छाड़ को लेकर बीएसपी सुप्रीमो मायावती, समाजवादी पार्टी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अब उत्तराखंड के कार्यकारी मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।

आपको बता दें कि मायावती ने तो बकायदा चुनाव आयोग से दोबारा चुनाव कराने की मांग तक कर डाली। वहीं केजरीवाल दिल्ली के एमसीडी चुनावों में मत पत्र के ज़रिए वोटिंग कराने की मांग कर चुके हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या वाकई ईवीएम मशीनों पर भरोसा नहीं किया जा सकता?

ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल भारत में पहली बार 1982 में केरल विधानसभा चुनाव के दौरान हुआ। अब तक भारत में आरपी एक्ट, 1951 के तहत केवल मत पत्र और मतपेटी के ही इस्तेमाल की अनुमति थी। वहीं, 1982 में चुनाव आयोग ने भारत सरकार से कानून में संशोधन का आग्रह किया।

आपको बता दें कि चुनाव आयोग ने कानून में संशोधन होने तक का इंतज़ार नहीं किया और अनुच्छेद-324 के तहत इमरजेंसी शक्तियों का इस्तेमाल कर केरल के एरनाकुलम जिले की पारावुर विधानसभा में 84 में से 50 पोलिंग स्टेशन पर वोटिंग मशीनों का पहली बार उपयोग किया। इस विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी ए सी जोस और सीपीआई के सिवन पिल्लेई के बीच मुकाबला था।

वोटिंग होने से कुछ दिन पहले सीपीआई प्रत्याशी पिल्लेई ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर कर ईवीएम की उपयोगिता और इस्तेमाल के तरीके पर सवाल उठाया था। चुनाव आयोग ने कोर्ट के समक्ष मशीन के इस्तेमाल का तरीका दिखाया तो कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। चुनावों में पिल्लेई ने महज़ 123 वोटों से जीत दर्ज़ की। अब कांग्रेस के जोस ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

उन्होंने आरपी एक्ट, 1951 और कंडक्ट ऑफ इलेक्शन्स रूल्स, 1961 का हवाला देते हुए कहा कि ये ईवीएम के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देते। हाईकोर्ट ने फिर चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन देश के सर्वोच्च अदालत ने इसे ख़ारिज़ करते हुए 50 पोलिंग स्टेशनों में दोबारा पारंपरिक मत पत्र और मत पेटियों से वोटिंग कराने का आदेश सुनाया।

बताया जा रहा है कि चुनाव आयोग ने इसके बाद ईवीएम के इस्तेमाल पर रोक लगा दिया था। वहीं, 1988 में संसद ने पहली बार आरपी एक्ट में संशोधन किया और ईवीएम का इस्तेमाल वैध हो गया। इसके बाद नवंबर 1998 में प्रयोग के तौर पर 16 विधानसभा सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया। मध्य प्रदेश और राजस्थान में 5-5 जबकि दिल्ली में 6 सीटों पर ईवीएम का प्रयोग हुआ। 2004 लोकसभा चुनाव में पहली बार पूरे देश ने ईवीएम के ज़रिए अपना वोट दिया।

Courtesy: nationaldastak

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