सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं के नहीं, इंसानियत के ही ख़िलाफ जुर्म है तलाक़-तलाक़-तलाक़

सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं के नहीं, इंसानियत के ही ख़िलाफ जुर्म है तलाक़-तलाक़-तलाक़

‘जो आग़ लगाई थी तुमने, उसको तो बुझाया अश्कों ने
जो अश्कों ने भड़काई है, उस आग़ को ठण्डा कौन करे’ फ़रन अहसन जज़्बी

हम अड़े हुए क्यों रहते हैं? जब सीधे दिखलाई पड़ रहा है कि एक लफ्ज़ को सिर्फ़ तीन बार बोलने से बरबादी हो जाती है। लेकिन लकीर। इसलिए पीटनी ही है।
शायरा बानो की हिम्मत से आज सारे हिन्दुस्तान में ट्रिपल तलाक़ की खूब बात हो रही है। वो पहली ऐसी महिला बन गई है -जिसने जु़ल्म, चुपचाप न सहा -बल्कि सीधे अदालत पहुंच गई। झटका दिया उस बेजान तौर-तरीके को -जो डराता था। कि जो शौहर ने कह डाला- वही हकीकत है। आखिरी हकीकत। शौहर की हुकूमत सिर झुका कर मानो। शादी में। फिर शादीशुदा ज़िंदगी में। फिर बच्चे पैदा करने में। यानी कौन-से बच्चे-बेटा। फिर बच्चे पैदा होने से पहले उन्हें ख़त्म कर देने में- अबॉर्शन। बल्कि अबॉर्शन अनलिमिटेड। अौर फिर, पति को ग़ुस्सा आ जाए – तो मार खाओ।
ज़लालत। कुल जमा यही एक वो चीज़ है – जो शायरा को शौहर से मिलेगी। बाकी सब कुछ देना ही है। पैसा। दहेज़। गाड़ी-घोड़े।
जिस्म। रूह।
और चूं भी की -तो औरत हो- पलट कर जवाब कैसे दे दिया? इतनी गुस्ताख़ी?
तलाक़-तलाक़-तलाक़
सब कुछ ख़त्म। न शादी बची। न शौहर। न बच्चे।
तब शहनाई थी। अब शोर है। न ख़त्म होने वाला एक ऐसा शोर – जो सिर्फ़ शायरा सुन सकती है। और शायरा ही क्यों?
शगुफ्ता। उसके घाव तो अभी खुले पड़े हैं।
कहीं लड़की न पैदा कर दे। तीसरी बार। ज़ुल्म कहां एलान कर आता है?
शाहबानो तो गुज़ारे के लिए खुलकर हक़ तक न ले सकी थी।
वो तो सुप्रीम कोर्ट है। जिसने कहा – नहीं। मुस्लिम महिला की ज़िंदगी, इज्ज़त और ज़रूरत सब की अहमियत, संजीदगी और हिफ़ाज़त हर हाल में उतनी ही होगी/रखी जाएगी – जितनी कि दूसरे मज़हब की महिलाओं की। सुप्रीम कोर्ट, आप देखिएगा – तारीख़ गवाह है, सिलसिलेवार मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसले देता रहा है।
राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम वीमन प्रोटेक्शन राइट्स लॉ बनाकर चाहे शाहबानो पर आए लैंडमार्क जजमेंट को ख़त्म कर दिया हो -डाइल्यूट तो कर ही दिया था- लेकिन सुप्रीम कोर्ट बावज़ूद इसके इन्साफ करती रही। एक-के-बाद-एक मुस्लिम औरतों के निकाह, तलाक़, गुजारे और कस्टडी के मामलों में उन्हीं के हको-हुकूक में फैसले दिए।
इससे हाई कोर्ट्स को नज़ीर मिल गई। वैसे, पहले से ही कई हाई कोर्ट्स ज़ोर देकर ऐसे ऑब्ज़र्वेशन्स लिखते रहे हैं अपने फैसलों में, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ को इज्ज़त देते हुए भी दो टूक बताया है कि बराबरी का हक, हर किसी का है। कोई पर्सनल लॉ, किसी महिला से, यह छीन नहीं सकता।
बाॅम्बे हाई कोर्ट ने ऐसा ही एक अहम फैसला लातूर की फहीम बी के केस में सुनाया था। दगड़ू छोटे से शादी कर फहीम बी ठगी गई थी। क्योंकि जब इच्छा हुई, दगड़ू ने तलाक़-तलाक़-तलाक़ कह, पीछा छुड़ा लिया। इसलिए कि अब वह कमरुन से शादी कर चुका था। दो-दो ख़र्चे उठाने को तैयार नहीं था। तीन-तीन बच्चे। ख़र्च कहां से चले। लम्बी अदालती लड़ाई चली।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा – नहीं। पर्सनल लॉ की बात ही नहीं। सवाल तलाक़ के सबब का है। हालात का है। एक औरत और तीन बच्चों की ज़िंदगी का है।
दिलवाया गुज़ारा।
और नज़ीर दी।
कलकत्ता हाई कोर्ट, चांद बी को ऐसे ही इंसाफ दिला चुका है।
गुवाहाटी हाई कोर्ट, ज़ीनत फातिमा रशीद को।
और पर्सनल लॉ को चलाने, समझाने और संभालने का जिम्मा जिसके जिम्मे है – ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड – वह अपने ताज़ा हलफ़नामे में सुप्रीम कोर्ट से क्या कहता है? हैरानगी होगी सुनकर।
बोर्ड ने कहा है कि अग़र सुप्रीम कोर्ट ट्रिपल तलाक़ को कहीं ग़लती से खारिज कर देता है – तो यह तो कुरान-ए-पाक को फिर से लिखने जैसी हिमाकत हो जाएगी!!
ऐसा तब कहा जा रहा है – जबकि बीसियों इस्लामिक मुल्क ट्रिपल तलाक़ ख़ारिज कर चुके हैं।
हमारा ख़ास पड़ोसी पाकिस्तान भी।
और कभी उनका अपना रहा बांग्लादेश भी।
सबसे ज़्यादा मुसलमानों वाला इंडोनेशिया भी।
शायद ख़ुद सऊदी अरब भी।
यही नहीं, लॉ बोर्ड ने पिछले साल तो और भी हैरानगी फैलाई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील में यहां तक अंदाज़ा लगा लिया था कि :
अगर मुसलमान अपनी शादी से तंग आ चुका है – और उसे कोई जल्दी, तेज़ी से इससे छुटकारा मिलने का रास्ता नहीं मिलेगा -तो टेंशन, फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन के बाद ग़ुस्से में वो बीवी का कत्ल भी कर सकता है!
इसलिए गुनाह के रास्ते पर न जाए, यह देखना भी हमारी सबकी जिम्मेदारी है। और वैसे – ट्रिपल तलाक़ – तो कुरान शरीफ़ में है। हदीस में साफ़-साफ़ लिखा है।
अब, कठमुल्ला हर बात को इस्लाम से जोड़कर, अपनी मर्ज़ी से मायने तय कर सकते हैं।
उनके पास कहां व़क्त और मिज़ाज कि असग़र अली इंजीनियर जैसे दानिश को सुनते-पढ़ते।
तरक्की पसंद स्कॉलर असग़र अली इंजीनियर ने नफ़ासत से समझाया था कि कोई भी पर्सनल लॉ, मुल्क और क़ौम के असर से अलग होकर नहीं बन सकता।
जैसे कि, इंडियन मुस्लिम पर्सनल लॉ कहां बना? किसने बनाया?
जानना दिलचस्प होगा कि हिन्दुस्तान को ग़ुलाम बनाने वाले ब्रिटिश हुक्मरान ने इंडियन मुस्लिम पर्सनल लाॅ बनाया था। तो जाहिर है, उसमें कहीं न कहीं, उनका ख़ास ‘डिवाइड एंड रूल’ फॉर्मूला फंसाया ही होगा! ख़ैर, न भी हो तो उनका पर्सनल लॉ, इंडियन मुस्लिम उनकी समझ के हिसाब से होगा।
इंजीनियर ने ख़ुलासा किया था कि अंग्रेजों पर ब्रिटिश जजों ने जो फैसले हिन्दुस्तान में सुनाए थे, उसका असर था। उन जजों पर ब्रिटेन के जजों का असर था। ब्रिटेन के जजों पर विक्टोरियन दौर की छाप थी ही। फिर इंडियन सोसाइटी को देखकर बनाया था।
और इससे भी आगे यह कि जब इस्लामिक मुल्क बदल रहे हैं – अपनी क़ौम और बराबरी-खुशहाली के हिसाब लगा रहे हैं – तो हिन्दुस्तानी मुसलमानों के रसूखदार, मजहबी लीडरान और बाकी दानिश नुमाइन्दे क्योंकर कुंए में भीतर, उसी किसी इबारत को बार-बार पढ़-लिख रहे हैं? जो उन्हीं की महिलाओं का दम घोंट रही हैं?
ऐसा नहीं होता तो क्या 50 हज़ार से ज्य़ादा मुस्लिम महिलाएं ट्रिपल तलाक़ को ख़त्म करने की पिटिशन पर दस्तख़त करतीं? ज़किया सोमन को क्या उम्मीद थी जब उन्होंने ‘इंडियन मुस्लिम महिला आन्दोलन’ बनाया था?
क्या कोई सोच सकता था कि उनके सर्वे में 92% मुस्लिम महिलाएं कहेंगी – फौरन ख़त्म करो ट्रिपल तलाक़?
शाइस्ता अम्बर ऑल इंडिया मुस्लिम वीमन पर्सनल लॉ बोर्ड बना देगी – ऐसा कोई इल्म था?
इतना अलग और औरतों के हक़ में, बच्चों के हक़ में, परवरिश के हिसाब से – एक पूरा कानून ड्राफ्ट हो सकेगा – कौन ज़हमत उठाता?
इन पढ़ी-लिखी महिलाओं ने कदम बढ़ाया। और बना दिया नए क़ानून का मसौदा। ‘टेल्स फ्रॉम क़ुरान’ की ऑथर और हिस्टोरियन राना सफ़्वी बहुत नफ़ीस बात लिखती हैं :
अबु याज़िद ने अपनी बेग़म को ग़ुस्से में तीन बार तलाक़ बोल दिया। हो गया तलाक़। फिर रात बीती। ग़म और ग़ुस्से से भर गया। ग़लती का अहसास हुआ। तो लगा – अब क्या? गए सीधे पैग़म्बर के पास। किस्सा सुना दिया। उन्होंने कहा – जाओ- अभी तो दो बार कहना बाकी है। कोई तलाक़ नहीं हुआ! कैसे? मैंने तो तीन बार ज़ोर से बोला था। ‘नहीं, एक बार में कितनी भी बार बोलो – एक ही रहेगा!’
सच है।
तलाक़-तलाक़-तलाक़ – जैसा कि फिल्मों में, किताबों में दिखाया जाता है – वैसा नहीं है। जैसा कि ख़ुदगर्ज़ और ‘मर्द’ बने शौहरों ने तलाक़ देने का ‘तुरत-फुरत’ तरीका अपना रखा है – वह इस्लाम को कुबूल नहीं है।
पूरे 90 दिन चाहिए। यानी 3 महीने।
क्यों? क्योंकि पहली बार ग़लती हुई हो तो ठीक कर लो। फिर अकेले में नहीं, अपने घर पर नहीं, गुपचुप नहीं – काफ़ी लोगों के सामने कहो। फिर दोनों पति-पत्नी की तरफ़ से गवाह होने चाहिए। वो भी, सुलह के रास्ते ढूंढ़ेेंगे। झगड़ा ख़त्म कराएंगे। अमन लाएंगे। फिर, खुदा की ख़िदमत में, अकेले – सॉलिट्यूड – ताकि कोई रोशनी दिख सके।

फिर भी कुछ न हो – तो तलाक़।

मग़र हो ही क्यों?
और हां, मर्द तो ऐसे ही चिल्ला कर तलाक़ दे देगा, औरत को खुला का नोटिस भेजना होगा। काज़ी के चक्कर लगाने होंगे?
और खुला के नोटिस से जीत भी गए तो क्या? महिला तलाक़ दे नहीं सकती – ख़ुदा के वास्ते तलाक़ दे दीजिए – एेसा है!
ग़लत है। धोख़ा है।
मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ़ नहीं, बल्कि इंसानियत के खिलाफ़।
कुदरत ने औरत और मर्द -बराबरी से बनाए हैं। आदम और हव्वा। एडम एंड इव। नारी और नर।

हम होते कौन हैं इनकी बराबरी छीनने वाले?
हम महिलाओं को बराबरी दे सकें, असंभव है। किन्तु देनी ही होगी। वरना क़यामत के दिन जवाब दे सकेंगे। और तब कोई कानून नहीं बचाएगा।
सिर्फ़ इंसानियत होगी – और होगा इन्साफ़।

Courtesy: Bhaskar

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