आपको (श्रीश्री रविशंकर) बोलने की आज़ादी है तो क्या कुछ भी बोल देंगे: एनजीटी

आपको (श्रीश्री रविशंकर) बोलने की आज़ादी है तो क्या कुछ भी बोल देंगे: एनजीटी

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने गुरुवार को आर्ट ऑफ लिविंग (एओएल) के संस्थापक श्री श्री रविशंकर के उस बयान को स्तब्ध करने वाला बताकर एनजीओ को लताड़ लगाई जिसमें उन्होंने यमुना के डूबक्षेत्रों को हुए नुकसान के लिए केंद्र एवं हरित पैनल को दोषी बताया है.

एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘आपको जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है. आपको बोलने की आज़ादी है तो क्या आप कुछ भी बोल देंगे? यह स्तब्ध करने वाला है.’

याचिकाकर्ता मनोज मिश्रा की ओर से पेश हुए वकील संजय पारिख ने पीठ को सूचित किया था कि रविशंकर ने हाल में एक बयान देकर उनके एनजीओ को यमुना नदी के डूबक्षेत्रों में विश्व संस्कृति उत्सव आयोजन की अनुमति देने के लिए सरकार और एनजीटी को ज़िम्मेदार ठहराया है जिसके बाद पीठ ने यह बात कही.

पारिख ने हरित पीठ को बताया कि आध्यात्मिक गुरु ने एनजीटी के ख़िलाफ़ आरोप लगाए हैं. वकील ने कहा कि श्री श्री ने आर्ट ऑफ लिविंग की वेबसाइट, अपने फेसबुक पेज पर यह बयान पोस्ट किया है और उन्होंने इस बात पर लिखित बयान देकर मीडिया को संबोधित किया.

हालांकि एओएल फाउंडेशन के लिए पेश हुए वकील ने विशेषज्ञ पैनल के निष्कर्ष का विरोध किया और कहा कि उन्हें समिति के निष्कर्ष को लेकर कुछ आपत्तियां हैं और उन्होंने रिपोर्ट को दरकिनार किए जाने की अपील की.

इसके बाद पीठ ने फाउंडेशन और अन्य पार्टियों को इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया और आपत्ति दो सप्ताह में दायर कराने को कहा और मामले की आगे की सुनवाई के लिए नौ मई की तारीख तय की.

रविशंकर ने यमुना के डूब क्षेत्र पर एओएल की ओर से विश्व सांस्कृतिक महोत्सव के आयोजन की अनुमति दिए जाने के लिए 18 अप्रैल को सरकार और एनजीटी पर ठीकरा फोड़ा था और कहा था कि यदि पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचा है तो इसके लिए सरकार और एनजीटी को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

एओएल के प्रमुख ने कहा था कि फाउंडेशन ने एनजीटी सहित सभी संस्थाओं से सभी ज़रूरी अनुमतियां ले ली थीं और यदि यमुना नदी इतनी ही सुकुमार और पवित्र है तो कार्यक्रम शुरू में ही रोक देना चाहिए था.

पिछले वर्ष 11 से 13 मार्च 2016 के बीच दिल्ली के यमुना तट पर श्री श्री रविशंकर के आर्ट ऑफ़ लिविंग (एओएल) द्वारा विश्व सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित किया गया था. इस आयोजन के चलते यमुना, उसके तट और नदी के आसपास की पारिस्थितिकी को ऐतिहासिक नुकसान की बात कही गई थी.

हाल ही में एक विशेषज्ञ समिति ने नुकसान का आकलन करते हुए बताया है कि नुकसान की भरपाई के लिए 10 साल का वक़्त लगेगा और जिसमें कुल 42.02 करोड़ रुपये का ख़र्च आएगा. विशेषज्ञों द्वारा 31 पन्नों की रिपोर्ट राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) को सौंपी गई है.

विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार भौतिक नुकसान की भरपाई के लिए 28,69,14,240 रुपये की लागत लगनी है, जबकि जैविक नुकसान पर 13,28,10,102 रुपये की लागत 10 वर्षों में लगनी है. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि भौतिक नुकसान की भरपाई 2 वर्षों में हो सकती है पर जैविक नुकसान की भरपाई के लिए 10 वर्ष लगने हैं.

Categories: Politics

Related Articles

Write a Comment

Your e-mail address will not be published.
Required fields are marked*