‘वर्षा डोंगरे’ एक ऐसी दलित जेलर जिन्होंने उड़ा दी रमन सरकार की नींद

‘वर्षा डोंगरे’ एक ऐसी दलित जेलर जिन्होंने उड़ा दी रमन सरकार की नींद

रायपुर। वर्षा डोंगरे.. जो रायपुर सेंट्रल जेल में डिप्टी जेलर के पद पर कार्यरत थीं जिन्हें अब छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने फेसबुक पर कथित सरकार विरोधी पोस्ट के लिए निलंबित कर दिया है। स्वास्थ्य कारणों से अवकाश पर गईं वर्षा डोंगरे के बंद पड़े मकान पर सरकार ने इस संबंध में सूचना चस्पा कर दी है। राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने उन पर फ़ेसबुक और सोशल मीडिया पर बस्तर में आदिवासियों पर सुरक्षाबलों के कथित अत्याचार को लेकर सरकार की गंभीर और तीखी आलोचना के आरोप लगाए हैं। बहरहाल वर्षा डोंगरे बस्तर में सुरक्षाबल के जवानों द्वारा आदिवासियों पर किए जा रहे कथित अत्याचार संबधी अपने पोस्ट के लिए चर्चा में है।
देश भर में उनके निलंबन को लेकर बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण उनके पक्ष में खड़े दिखते है तो छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी भी। मानवाधिकार कार्यकर्ता तो वर्षा के पक्ष में बयान दे ही रहे हैं। सोशल मीडिया में भी वर्षा डोंगरे छाई हुई हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल साफ़ कहते हैं, “वो एक दलित की बेटी हैं, इसलिये उन्हें निलंबित होना पड़ा। भूपेश ने यह तक लिखा कि यहां सरकारी अफ़सर फेसबुक पर क्या-क्या नहीं लिखते। लेकिन सरकार और किसी पर कार्रवाई नहीं करती। न ही सरकार छत्तीसगढ़ में हो रहे भ्रष्टाचार पर कुछ बोलती है।

आइए आपको बताते हैं कौन हैं ये दलित बेटी जिन्होंने रातों-रात उड़ी दी रमन सरकार की नींद-
छत्तीसगढ के कबीर धाम ज़िले के एक दलित परिवार में जन्मी 35 साल की वर्षा डोंगरे ने जीव विज्ञान में स्नातक की पढाई की है। उनकी मां शिक्षिका के पद से सेवानिवृत हुई हैं और पिता वकालत के पेशे में रहे हैं। परिवार में दो बहनें और एक भाई शिक्षक हैं, जबकि एक भाई सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं। पढ़ाई में हमेशा अच्छे अंक लाने वाली वर्षा ने 2003 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी थी, लेकिन तब उनका चयन नहीं हुआ था। वर्षा डोंगरे पहली बार तभी चर्चा में आई थीं जब उन्होंने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की 2003 की परीक्षा में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। वर्षा ने इस मामले में लंबी अदालती लड़ाई लड़ी है।
उनकी याचिका पर सुनाए गये हाईकोर्ट के एक फ़ैसले से राज्य के डेढ़ सौ से अधिक अफ़सरों की नौकरी प्रभावित हो सकती है। इनमें बड़ी संख्या में डिप्टी कलेक्टर और सहायक पुलिस अधीक्षक शामिल हैं। इनमें से कई की नौकरी भी जा सकती है, लेकिन फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित होने के कारण इस मामले में कार्रवाई नहीं हो सकी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि कई सालों तक चले इस मामले में वर्षा डोंगरे ने खुद ही अपने मामले की पैरवी की थी।

हाईकोर्ट ने पिछले साल अगस्त में वर्षा डोंगरे द्वारा पेश सबूतों के आधार पर लोक सेवा आयोग के काम को आपराधिक कृत्य की संज्ञा दी थी और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार पर कड़ी टिप्पणी की थी। इसके अलावा हाईकोर्ट ने यह भी माना था कि वर्षा समेत कई प्रतियोगियों को अधिक नंबर मिलने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं दी गई। अदालत ने राज्य सरकार के ख़िलाफ़ आदेश दिया था कि सरकार फिर से 2003 में हुई परीक्षा के परिणाम की स्केलिंग करे और उस आधार पर फिर से साक्षात्कार करे। अदालत ने वर्षा डोंगरे को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया था।
इसके बाद महाधिवक्ता और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने वर्षा डोंगरे को अदालत में ही पुलिस उपाधीक्षक के पद की पेशकश की थी। लेकिन वर्षा डोंगरे ने इससे इनकार कर दिया था और हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में वर्षा डोंगरे का केस लड़ रहे हैं। बिना किसी परिचय के प्रशांत भूषण इस मामले में निःशुल्क पैरवी कर रहे हैं।

वर्षा का कहना था कि वे अदालत में केवल पद या अपने हिस्से का न्याय लेने के लिये नहीं गई थीं। लोक सेवा आयोग की गड़बड़ियों की जांच हो, सभी प्रतियोगियों को न्याय मिले और दोषियों को सज़ा मिले, इसलिये उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
वर्षा सिर्फ एक डिप्टी जेलर नहीं थीं बल्कि दलित समुदाय में ऐसा एक नाम हैं जिन्होंने न सिर्फ छत्तीसगढ़ के जंगलों में सरकार का अत्याचार झेल रहे आदिवासी समाज को न्याय दिलाने की कोशिश की बल्कि छत्तीसगढ़ में राज्य लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा में हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है। आज वर्षा डोंगरे इन सबके बीच एक जाना पहचाना नाम बन चुकी हैं।

Courtesy: National Dastak

Categories: India

Related Articles