गढ्ढे से पानी भरने के जुर्म में सवर्ण अफसर ने दलित को पहुंचाया जेल, सदमे से मौत

गढ्ढे से पानी भरने के जुर्म में सवर्ण अफसर ने दलित को पहुंचाया जेल, सदमे से मौत

इलाहाबाद। कहने को तो भारत विश्वगुरू बनने की रेस दौर रहा है लेकिन एक जमीनी हकीकत यह है कि आज भी देश में दलितों के साथ भेदभाव और छुआछुत की जाती है। आजादी के 70 साल बाद जब सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं तब शहर से मात्र 50 किलोमीटर दूर डेराबारी गांव के दलित कुंजन लाल (50) को पानी के लिए जेल जाना पड़ता है।

 

50 वर्षीय कुंजन लाल दलित है, इनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने वन विभाग के खदान (गड्ढों) से पानी ले लिया था। ऐसा करना सरकारी अफसरों को नागवार गुजरा और कुंदन पर दर्ज करा दिया लकड़ी चोरी का मुकदमा। कुंजन जेल चला गया और लौटा तो सदमे में प्राण त्याग दिए।

 

 

अमर उजाला कि रिपोर्ट के मुताबिक, कुंदन के बेटे सुभाष चंद्र का कहना था कि उनके पिता कुंजनलाल और पुरुषोत्तम यादव के खिलाफ तीन महीने पहले वन विभाग ने मुकदमा दर्ज कराकर गैर जमानती वारंट जारी करा दिया था। यह जानकारी पिछले सप्ताह थाना लालापुर से आए दीवान ने दी। कहा कि वह अदालत से जमानत करा लें।

 

 

16 मई को कुंजनलाल गांव के ही पुरुषोत्तम यादव के साथ इलाहाबाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां हाजिर हुए। गैर जमानती वारंट होने के कारण अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया। अगले दिन जमानत पर दोनों गांव आएं। जेल जाने से कुंजन गहरे सदमे में थे। उनकी हालत बिगड़ी और अस्पताल ले जाते समय रास्ते में उनकी मौत हो गई।

 

 

करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव में जल स्तर गिरने के कारण सरकारी हैंडपंप बेदम हो गए हैं। करीब आधा दर्जन लोगों ने अपने निजी हैंडपंप लगा लिए हैं। गरीब और पिछड़े तबके के लोगों को यहां पानी नहीं भरने दिया जाता। कई साल से यहां के करीब तीन सौ परिवार पीने के पानी के लिए दर-दर भटकते हैं। ये परिवार आसपास की नहर और वन विभाग के खदान (गड्ढों ) में भरे हुए पानी पर ही आश्रित रहते हैं। जरूरत के अनुसार इस पानी को उबालकर पी रहे हैं।

 

 

सरकारी तौर पर खदानों से पानी लेने पर वन विभाग की ओर से कोई रोक नहीं है लेकिन वन कर्मी उनको पानी भरने नहीं देते। ग्रामीणों का आरोप है कि इस पानी की एवज में वह महीनेदारी मांगते हैं। उन्हें हर महीने पानी के बदले कुछ रुपये न दें तो लकड़ी चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा दी जाती है। तीन महीने पहले गांव के पुरुषोत्तम यादव और कुंजन के साथ भी ऐसा ही हुआ।

 

 

23 फरवरी को पीने के पानी की मांग और वन विभाग के उत्पीड़न के खिलाफ ग्रामीणों ने यूपी विधानसभा चुनाव में मतदान का बहिष्कार भी किया था। उस दिन करीब तीन घंटे बाद एसडीएम, बीडीओ तथा अन्य अधिकारी ग्रामीणों के पास आए और मांग पूरी करने का आश्वासन दिया था। उसी के बाद वहां के लोगों ने मतदान किया। लेकिन तीन महीने बाद भी उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों का उत्पीड़न हो रहा है और आज कुंजन लाल की सदमे से मौत हो गई।

Courtesy: nationaldastak.

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