चीन ना हो जाए नाराज़ इसलिए भारत नहीं करेगा ऑस्ट्रेलिया के साथ संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास

चीन ना हो जाए नाराज़ इसलिए भारत नहीं करेगा ऑस्ट्रेलिया के साथ संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास

नई दिल्ली: चीन के साथ जारी तनातनी के बीच भारत ने अमेरिका और जापान के साथ संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास में शिरकत करने के ऑस्ट्रेलिया के अनुरोध को खारिज कर दिया है, क्योंकि चीन ने युद्धाभ्यास के इलाके में फैलाव करने के खिलाफ चेताया था. यह बात नौसेनाधिकारियों तथा राजनयिकों ने समाचार एजेंसी रॉयटर से कही है.

ऑस्ट्रेलिया ने इस साल जनवरी में भारतीय गृह मंत्रालय को औपचारिक रूप से पत्र लिखकर पूछा था कि क्या भारत जुलाई के युद्धाभ्यास में अपने नौसैनिक पोतों को पर्यवेक्षक के रूप में भेज सकता है, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों की नज़र में यह पूर्ण भागीदारी की दिशा में उठा हुआ कदम ही साबित होता.

भारत, ऑस्ट्रेलिया तथा जापान के चार अधिकारियों ने समाचार एजेंसी रॉयटर को बताया कि भारत ने इस अनुरोध को रोक दिया और सुझाव दिया कि बंगाल की खाड़ी में होने वाले तीन देशों के युद्धाभ्यास की निगरानी के लिए ऑस्ट्रेलिया अपने अधिकारियों को भेजे. चारों अधिकारियों ने कहा कि अमेरिका और जापान ने युद्धाभ्यास में ऑस्ट्रेलिया की शिरकत का स्वागत किया है, क्योंकि वे चीन की बढ़ती ताकत के साथ संतुलन बनाने की कोशिशों में ऑस्ट्रेलिया को स्वाभाविक साझीदार के रूप में देखते हैं.

रॉयटर के कुछ अनाम सूत्रों के अनुसार, भारत को इस बात की चिंता है कि श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान में बुनियादी ढांचा तैयार कर रहा चीन इसके बाद हिन्द महासागर में भी गतिविधियां बढ़ा देगा, जिससे भारत की चारों ओर से घिर जाने की चिंताएं बढ़ जाएंगी.

भारतीय नौसेनाधिकारियों का कहना है कि वर्ष 2013 से अब तक चीन कम से कम छह पनडुब्बियों को हिन्द महासागर में तैनात कर चुका है, और वे सभी श्रीलंका और उसके पुराने सहयोगी देश पाकिस्तान में रुकी हुई हैं.

नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में समुद्री अध्ययन विभाग के प्रमुख तथा भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी अभिजीत सिंह ने कहा, “भारत दरअसल चीन को लेकर सावधानी बरत रहा है…”

अभिजीत सिंह के मुताबिक, “भारत जानता है कि चीन ने दुनिया के इस हिस्से के समुद्र में अपनी गतिविधियां बढ़ा रखी हैं, और वे इसके बाद अपनी पनडुब्बियों की तैनाती को लेकर और ज़्यादा बेझिझक हो जाएगा… हम ऐसा नहीं होने देना चाहते…”

पिछले कुछ महीनों में कई मुद्दों को लेकर भारत तथा चीन के संबंधों में खटास बढ़ी है, जिनमें अत्याधुनिक परमाणु तकनीक तथा सामग्री की खरीद-फरोख्त को नियंत्रित करने वाले 48 देशों के संगठन न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में भारत की सदस्यता का चीन द्वारा विरोध किया जाना शामिल है.

चीन का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार भारत के धर्मशाला शहर में रह रहे निर्वासित तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की हालिया सार्वजनिक गतिविधियों के पीछे है, और गौरतलब है कि चीन उन्हें (दलाई लामा को) खतरनाक अलगाववादी नेता मानता है.

बंगाल की खाड़ी में होने वाले वार्षिक संयुक्त युद्धाभ्यास वर्ष 1992 में भारत और अमेरिका के बीच शुरू हुए थे, लेकिन ‘मालाबार युद्धाभ्यास’ कहे जाने वाली इस गतिविधि में वर्ष 2014 से हर साल जापान भी शिरकत करता रहा है.

इस युद्धाभ्यास में दर्जनों युद्धपोत, पनडुब्बियां तथा विमान हिस्सा लेते हैं, और इसका मकसद तीन शक्तिशाली नौसेनाओं को मिलकर काम करने का अभ्यास करवाना है. अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि इससे भविष्य के ऑपरेशनों में मदद मिलेगी, जिनमें हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर में संयुक्त गश्त जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं.

अब यह युद्धाभ्यास हिन्द महासागर के साथ-साथ पूर्वी तथा दक्षिणी चीन सागर के निकट भी होने लगा है. दक्षिणी चीन सागर के अधिकतर हिस्से पर दावा करने वाले चीन ने युद्धाभ्यास के इस फैलाव का विरोध किया है.

ऑस्ट्रलिया के रक्षामंत्री मरीसे पेन के एक प्रवक्ता ने मालाबार युद्धाभ्यास को लेकर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया, लेकिन मामले की संवेदनशीलता की वजह से नाम न छापे जाने की शर्त पर एक अन्य ऑस्ट्रेलियाई अधिकारी ने रॉयटर को बताया कि हालांकि ऑस्ट्रेलिया इस युद्धाभ्यास में शिरकत का इच्छुक है, लेकिन शिरकत करने की संभावना नगण्य है… अधिकारी का कहना था कि ऑस्ट्रेलिया आमतौर पर चीन को नाराज़ नहीं करना चाहता, क्योंकि वह उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है.

Courtesy:NDTV 

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