बीजेपी सांसदों ने राज्यसभा से गायब रहकर OBC कमीशन बिल को लटकाया

बीजेपी सांसदों ने राज्यसभा से गायब रहकर OBC कमीशन बिल को लटकाया

नई दिल्ली। पिछले साल संसद के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने स्पष्ट कहा था कि कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) को वह   यह जानकारी केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा दी गई थी।  से ओबीसी सांसद लक्ष्मी नारायण यादव यह जानना चाहा था कि क्या तमाम अन्य आयोगों को जिस तरह संवैधानिक दर्जा प्राप्त है, वैसा ही दर्जा पिछड़ा वर्ग आयोग को दिया जाएगा। इस पर मंत्रालय का जवाब था कि हालांकि सरकार के पास इस संबंध में अनुरोध आए हैं, लेकिन ऐसे अनुरोधों पर विचार करने का सरकार का कोई इरादा नहीं है।

खास बातें-

  1. बीजेपी सांसदों ने गायब रहकर ओबीसी बिल को अटकाया
  2. आधे-अधूरे मन से पास कराना चाहते थे ओबीसी कमीशन बिल
  3. पिछले साल सरकार ने ओबीसी कमीशन बिल को पास न करने की बात कही थी
  4. सरकार के बिल के खिलाफ विपक्ष का बिल राज्यसभा में पास
  5. सरकार की फजीहत के बाद उपसभापति ने वापस भेजा लोकसभा

लेकिन इसी साल अप्रैल में सरकार ने लोकसभा में पिछड़ी जातियों के दबाव के चलते  को संवैधानिक दर्जा देने का बिल पास किया था। तब लोकसभा में सरकार ने बहुमत के कारण तीन सदस्यीय बिल पास करवाया था जबकि न इसमें किसी महिला को जगह दी गई थी और न ही अल्पसंख्यक को।

 

आपको बता दें कि 1993 में गठित पिछड़ा वर्ग आयोग अभी सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ी जातियों को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल करने या पहले से शामिल जातियों को सूची से बाहर करने का काम करता था। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की तर्ज पर पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दिये जाने की बहुत दिनों से मांग चल रही थी। जिसे पहले तो सरकार ने मना कर दिया था लेकिन फिर ओबीसी जातियों के दवाब के चलते उसने आधे-अधूरे मन से लोकसभा में यह बिल पास कर दिया था और राज्यसभा में इस पर बहस चल रही थी।

लेकिन सोमवार 31 जुलाई को सरकार इस बिल के चक्कर में फंस गई। दरअसल संविधान संशोधन के बिल पर हुई वोटिंग के दौरान सरकार हार गई क्योंकि एनडीए के कई सांसद सदन में मौजूद नहीं थे। इसका फायदा विपक्ष को मिला और उसका संशोधन पास हो गया। सामाजिक अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत द्वारा पेश संशोधन विधेयक पर लगभग चार घंटे की बहस के बाद कांग्रेस सदस्य दिग्विजय सिंह, बीके हरिप्रसाद और हुसैन दलवई ने प्रस्तावित आयोग की सदस्य संख्या तीन से बढ़ाकर पांच करने, एक महिला सदस्य और एक अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य को शामिल करने का प्रावधान विधेयक में शामिल करने के संशोधन पेश किए।

 

मतदान में संशोधन प्रस्ताव के पक्ष में 75 और विरोध में 54 मत मिलने पर सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई। सरकार ने जो तीन सदस्यीय आयोग के गठन का बिल लोकसभा में पास कराया था वह विपक्ष ने पांच सदस्यीय करवा लिया। इसके अलावा विपक्ष ने इसमें एक महिला और एक अल्पसंख्यक की भी उपस्थिति सुनिश्चित कर दी। सरकार के सांसदों के गायब रहने के कारण सरकार के उस खेल पर पानी फिर गया और विपक्ष का संसोधित बिल पास हो गया।

पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिये राज्य सभा में पेश 123 वें संविधान संशोधन विधेयक पर विपक्ष के संशोधनों ने न सिर्फ केन्द्र सरकार बल्कि समूचे सदन को गंभीर तकनीकी पेंच में उलझा दिया तथा इसके कारण संसद में कई बार ऐसे नजारे देखने को मिले जो प्राय: देखने को नहीं मिलते।

 

हालांकि इस अप्रत्याशित हालात पैदा होने पर सदन में सत्तापक्ष और विपक्ष के मौजूद नामचीन वकील सदस्यों कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आपसी विचार-विमर्श से बीच का रास्ता निकालने की पुरजोर कोशिश की गई। लेकिन कुछ भी फैसला नहीं निकला और उपसभापति कुरियन ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित संशोधन प्रस्ताव के साथ विधेयक को आंशिक तौर पर पारित मानते हुये इसे फिर से लोकसभा के समक्ष भेजा जाएगा। इस तकनीकी पेंच के कारण राज्यसभा से स्वीकार किए गए संशोधन प्रस्तावों को लोकसभा द्वारा मूल विधेयक में फिर से शामिल कर या नया विधेयक पारितकर फिर से इसे उच्च सदन में पारित कराने के लिए भेजा जाएगा।

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जरूर गायब रहने वाले अपने सांसदों को फटकार लगाई लेकिन एक तरह से बीजेपी और आरएसएस के उस एजेंडे को कुछ दिन और चलाने में मदद मिल गई जिसमें ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा न देना शामिल है। इसमें प्रथम दृष्ट्या यह समझ में आता है कि अगर भाजपा सांसद मौजूद रहते तो शायद विपक्ष के बिल को उन्हें विरोध करना पड़ता और बीजेपी को महिला और अल्पसंख्यक विरोधी करार दे दिया जाता। जिसकी वजह से उन्होंने रणनीतिक रूप से गायब रहना सही समझा।

Courtesy: nationaldastak.

Categories: India