क्या शरद यादव भूल पाएंगे लालू के दिए ‘घाव’, क्या माया भूल जाएंगी 1995 का गेस्ट हाउस कांड…?

क्या शरद यादव भूल पाएंगे लालू के दिए ‘घाव’, क्या माया भूल जाएंगी 1995 का गेस्ट हाउस कांड…?

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में अगर ऊपर से सबकुछ शांत दिख रहा हो तो कोई भी बाहरी विश्लेषक धोखा खा सकता है लेकिन इसकी गहराई  पर उतरने से पता चलता है कि ठहरे हुए पानी के अंदर जिस तरह धाराएं एक-दूसरे को काटती रहती हैं, यहां भी कुछ अंदरखाने में वैसा ही होता रहता है. 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर जो पहली तस्वीर ऊभरी वह बिहार विधानसभा चुनाव के समय थी लेकिन वह इतनी धुंधली थी कि कुछ भी साफ नहीं था. फिर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद तस्वीर बिलकुल साफ हो गई कि लोकसभा चुनाव में अगर पीएम मोदी का मुकाबला करना है तो समूचे विपक्ष को एकजुट होना होगा. यह बात राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव जातिगत समीकरणों के हिसाब से सबको  समझाते रहते हैं. दरअसल यूपी चुनाव के नतीजे आने के पहले ही अखिलेश यादव मीडिया से बात कर चुके थे कि वह बीएसपी सुप्रीमो मायावती का समर्थन लेने से भी परहेज नहीं करेंगे. उस समय की अटकलों और कयासों के बीच अब बहुत कुछ बदल चुका है. नीतीश कुमार एनडीए में चले गए हैं, शरद यादवबगावत कर चुके हैं, मायावती ने दलितों के मुद्दे पर राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है और अखिलेश यादव करारी हार के बाद लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं. वोटों का जो समीकरण है उस हिसाब से यूपी में बीजेपी को तभी हराया जा सकता है जब अखिलेश और मायावती एक हो जाएं. लेकिन बिहार में अकेले शरद यादव लालू के साथ जाकर भी कुछ खास नहीं कर सकते हैं. फिर भी लालू प्रसाद यादव उनको साथ लेने में हिचक नहीं रहे हैं

…तो दिक्कत कहां है 
1- राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी समीकरणों के हिसाब से बदलती रहती है. लेकिन लालू प्रसाद यादव और शरद यादव के बीच अदावत इतनी भी साधारण नहीं थी. शरद यादव को इस बात का हमेशा अफसोस रहा कि उन्होंने लालू प्रसाद यादव को  कर्पूरी ठाकुर का उत्तराधिकारी बना दिया था. दोनों ही दिग्गज नेता हैं और एक-दूसरे के खिलाफ सीधे चुनाव लड़ना ही सब कुछ कहता है. 1998 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद ने शरद को हराया था तो 1999 के चुनाव में शरद यादव ने लालू को हरा दिया. इसके बाद 2004 के चुनाव में लालू ने फिर से शरद यादव को हरा दिया. लेकिन इस बीच दोनों के बीच जिस स्तर पर जाकर राजनीतिक बयानबाजी हुई वह किसी से छुपी नही है और यह सिलसिला नरेंद्र मोदी के पीएम पद का उम्मीदवार बनने तक जारी रहा.

क्या मायावती भूल पाएंगी 2 जून 1995 की तारीख…
मुलायम सिंह यादव और मायावती के बीच पिछले 22 सालों से बातचीत नहीं हुई. यह राजनीतिक दुश्मनी उस दिन से शुरू हुई जिसे ‘काला दिन’ कहा जाता है.  1993 में मुलायम सिंह यादव की अगुवाई में सपा और मायावती के नेतृत्व में बसपा ने मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ा और जिसमें सपा को 109 और बीएसपी को 67 मिलीं. मुलायम सिंह यादव यूपी के सीएम बने. उस समय उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का हिस्सा था. लेकिन मायावती ने 2 जून 1995 को सरकार से समर्थन वापस ले लिया. मुलायम सिंह सरकार खतरे में आ गई. यूपी में सरगर्मियां तेज थीं.  मायावती 2 जून को ही लखनऊ के मीराबाई मार्ग पर बने सरकारी गेस्ट हाउस के कमरा नं-1 में अपने विधायकों के साथ बैठक कर रही थीं.तभी समाजवादी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और विधायक वहां पहुंचे और कथित तौर पर मायावती के साथ अभद्रता और मारपीट की. इस घटना को गेस्ट हाउस कांड के नाम से जाना जाता है.

Courtesy: NDTV 

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