युवाओं को न रोजगार मिला न अच्छे दिन ! पहले राजस्थान हराया फिर पंजाब अब दिल्ली, क्या अब 2019 की बारी है ?

युवाओं को न रोजगार मिला न अच्छे दिन ! पहले राजस्थान हराया फिर पंजाब अब दिल्ली, क्या अब 2019 की बारी है ?

देश में जब-जब युवा क्रांति हुई है तब-तब सत्ता में भूकंप आया है। 1974 का जेपी आन्दोलन इसका उदाहरण है। इस समय जिस तरह विश्वविद्यालयों की राजनीति में ABVP को नकारा जा रहा है वो भी एक सत्ताविरोधी युवाक्रान्ति का आगाज़ लगता है।

पहले राजस्थान के छात्रसंघ चुनावों में ‘आप’ के छात्र संगठन CYSS ने जीत दर्ज की और राज्य में भाजपा की सरकार होते हुए ABVP हारी। कांग्रेस शासित पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस की NSUI अध्यक्ष पद समेत तीन प्रमुख पदों पर जीती। जेएनयू के छात्रसंघ के चुनाव में देश में हाशिए पर पहुंच चुकी लेफ्ट पार्टियों के छात्र ईकाईयों की अलायंस ने अध्यक्ष पद समेत सभी पदों पर जीत का परचम लहराया। अब दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में चार साल बाद कांग्रेस की NSUI ने जीत दर्ज की।

इन छात्रसंघ चुनावों में वो गुस्सा दिख रहा है जो शायद भाजपा के खिलाफ है। क्योंकि इन सभी छात्रसंघ चुनावों को देखे तो ABVP उस राज्य में भी हारी जहाँ भाजपा की सरकार है और उसमे भी जहाँ भाजपा की सरकार नहीं है।

अब सवाल ये है कि जो युवा 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की सत्ता की चाबी बना था क्या उसने अब पार्टी से मुँह मोड़ लिया है? इस बात की संभावनाएं काफी ज़्यादा है क्योंकि जो विकास के सपने दिखाए गए थे और जो वादे किए गए थे वो पूरे होते नही नज़र आ रहे हैं। गौरतलब है कि 2014 में भाजपा ने प्रतिवर्ष 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था लेकिन सत्ता में आने के बाद पार्टी साल में 2 लाख नौकरियां भी नहीं दे पाई।

इसके अलावा भाजपा ने भ्रष्टाचार को भी खूब भुनाया था लेकिन जिस तरह हाल ही में व्यापम से लेकर सृजन घोटाले और पनामा में भाजपा के दिग्गज नेताओं के नाम आए हैं उसने पार्टी की छवि को कमज़ोर किया है। 2014 में भाजपा ने साम्प्रदायिक राजनीति को थोड़ा पीछे रखकर विकास की राजनीति के साथ ‘अच्छे दिन’ लाने का दावा किया था और शायद इसीलिए भाजपा के साम्प्रदायिक इतिहास को भुलाते हुए युवाओं ने समर्थन दिया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा में गाय, मंदिर, लवजिहाद और तथाकथित राष्ट्रवाद की राजनीति शुरू कर दी है।

इस सभी कारणों से यूवा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस तरह अलग-अलग राज्यों में छात्रसंघ चुनावों में ABVP की हार हुई है वो युवाओं के इस गुस्से को साफ़ दिखाती है।

अब बड़ा सवाल ये है कि 2019 में युवाओं का नेता कौन होगा? प्रधानमन्त्री मोदी स्वयं को युवा नेता होने का दावा करते है लेकिन ABVP लगातार हार अब उनके दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।

अगर हालिया माहौल के आधार पर देखा जाए तो ये लगता है कि, जिस तरह छात्रसंघ चुनावों में युवाओं ने किसी एक छात्र इकाई का साथ न देते हुए केवल ABVP से विरोध जताया और अलग-अलग छात्र संगठनों को जिताया। उसी तरह 2019 में भाजपा के विरोध में ये ही यूवा किसी एक दल का साथ न देते हुए एक देशव्यापी महागठबंधन को सत्ता में काबिज़ कर सकते हैं।

Courtesy: boltahindustan

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