बैंक डिपॉजिट सेफ्टी पर आग से खेल रही है सरकार?

बैंक डिपॉजिट सेफ्टी पर आग से खेल रही है सरकार?

नई दिल्ली
केंद्र सरकार की नौकरी से रिटायर्ड राजाराम शिंदे अपना डिपॉजिट एसबीआई से निकाल कर कोटक में डाल रहे हैं, क्योंकि उनको लगता है कि अगर सरकारी बैंक में उनका पैसा सेफ नहीं है तो फिर उसे किसी मजबूत प्राइवेट बैंक में क्यों न शिफ्ट कर दें। फिलहाल हम बस शिंदे की बात कर रहे हैं लेकिन देश में इनके जैसे बहुत से लोग हैं जो इनके जैसा ही सोच रहे होंगे।

शिंदे यह फैसला करने पर इसलिए मजबूर हुए कि नए FRDI बिल के हिसाब से कथित तौर पर बैंकों के मुसीबत में पड़ने पर कस्टमर्स डिपॉजिट फ्रीज हो सकता है और कुछ मामलों में कस्टमर्स को डिपॉजिट के बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ सकता है। FRDI बिल का यह पहलू सोशल से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक में जोर-शोर से उछला, लेकिन अरसे तक सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।

वैसे तो इस बात की पूरी संभावना है कि यह बिल अपने मौजूदा स्वरूप में संसद से पास नहीं हो पाएगा लेकिन अगर हुआ तो? क्या फाइनैंशल रिजॉलूशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस यानी FRDI बिल नोटबंदी 2.0 साबित होगा? 8 नवंबर के आसपास यह बिल अचानक सोशल की सुर्खियों में आ गया और हफ्ते भर बाद मेनस्ट्रीम मीडिया ने इसको लपका। इस बीच सरकार की तरफ से कोई बयान नहीं आया।

यह मुद्दा बैंकरप्सी कोड और गुजरात चुनाव के हो-हल्ले में दबा नहीं, बल्कि ‘क्या आपका डिपॉजिट सेफ है?’ जैसी हेडलाइंस और टिकर्स के साथ अखबारों और न्यूज चैनलों की सुर्खियां बनने लगा। सरकार इस पर पिछले हफ्ते हरकत में आई और वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी किया।

सरकार ने कहा, ‘हमारा FRDI बिल 2017 बेल-इन सिस्टम वाले दूसरे देशों से ज्यादा डिपॉजिटर फ्रेंडली है। बाहर तो बेल इन के लिए क्रेडिटर्स/डिपॉजिटर्स की इजाजत जरूरी नहीं होती।’ बेल-इन का मतलब यह हुआ कि अगर फाइनैंशल इंस्टीट्यूशन डूबा तो उसमें जमा आपका पूरा पैसा वापस नहीं मिलेगा। आपको अपने हिस्से का कुछ नुकसान उठाना होगा।

आप पूछ सकते हैं कि भारत सरकार किन देशों की बात कर रही है? साइप्रस? ग्रीस? विकसित देशों में जहां भी यह कानून है, इसका इस्तेमाल शायद ही कभी हुआ है। वित्त मंत्रालय के बयान का मतलब यह निकाला जा सकता है कि हमारा विधेयक साइप्रस वाले कानून से बेहतर है, जहां कुछ साल पहले बैंकों को जिंदा रखने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया था।

जनता क्या करे? इससे शिंदे और उनके जैसे दूसरे बैंक कस्टमर्स का डर तो नहीं हुआ। आखिरकार सोमवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भरोसा दिलाया कि सरकार फाइनैंशल इंस्टीट्यूशन में जमा पब्लिक डिपॉजिट्स को फुल प्रोटेक्शन देगी। वह कुछ और कर भी नहीं सकते थे, लेकिन उनकी मानें तो संसद में पेश करने से पहले सरकार बिल में बड़े बदलाव करेगी।

भरोसा बड़ी चीज होती है
स्टॉक मार्केट में स्ट्रॉन्ग रैली और तेज जीडीपी ग्रोथ वाली एक स्थिर सरकार के किसी वित्त मंत्री को शायद ही पहले कभी पब्लिक को उनका बैंक डिपॉजिट सुरक्षित होने का भरोसा दिलाना पड़ा होगा। अब ऐसा क्यों हुआ? शायद सरकार को लगा होगा कि बैंकों के (बेल-आउट के बजाय) बेल-इन पर चर्चा कराना जरूरी हो गया है। उसने महसूस किया होगा कि दिवालिया बॉरोअर मैन्युफैक्चरर्स की तरह ही लेंडर्स के रिजॉलूशन के लिए भी एक कानून होना चाहिए। लेकिन वह यह भूल गई कि मॉडर्न इंडियन फाइनैंशल सिस्टम में बैंकों पर भरोसा बहुत बड़ी चीज है। सरकारी सपोर्ट के चलते बुरी से बुरी स्थिति में सरकारी बैंकों पर कस्टमर्स का भरोसा बना रहा है। लेकिन डिपॉजिटर्स के पैसों से बैंकों को बचाना सरकार के लिए मुमकिन नहीं हो पाएगा।

Courtesy: NBT

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