क्यों मध्य प्रदेश भाजपा को लगने लगा है कि शिवराज के नेतृत्व में वह अगला चुनाव हार भी सकती है

क्यों मध्य प्रदेश भाजपा को लगने लगा है कि शिवराज के नेतृत्व में वह अगला चुनाव हार भी सकती है

ज़्यादा पुरानी नहीं बल्कि अभी बीते मंगलवार (26 दिसंबर) की ही बात है. मध्य प्रदेश का एक विधानसभा क्षेत्र है मुंगावली. यहां के पिपरई गांव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक सम्मेलन किया. प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य सरकारी योजनाओं के हितग्राहियों के लिए. सम्मेलन क्या एक तरह से यह चुनावी सभा थी क्योंकि मुंगावली में जल्द उपचुनाव होने वाले हैं. यहां से विधायक रहे कांग्रेस नेता महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के निधन की वजह से यह सीट खाली हुई है. चूंकि सीट कांग्रेस की है और इलाका पार्टी के दिग्गज ज्योतिरादित्य सिंधिया का. इसलिए यह सीट भाजपा के साथ कांग्रेस के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न तो है ही. इसीलिए उपचुनाव की घोषणा न होने के बावजूद यहां चुनावी तैयारियां भरपूर हैं.

बहरहाल जब पिपरई में चौहान के हितग्राही सम्मेलन का कार्यक्रम बना तो उसकी तैयारियों का जिम्मा जिला प्रशासन को सौंप दिया गया. क्याेंकि कागजों पर तो कार्यक्रम सरकारी ही था. लिहाज़ा अशोकनगर (मुंगावली इसी जिले में आता है) के अपर कलेक्टर के कार्यालय से 25 दिसंबर को एक पत्र जारी हुआ. इसमें अशोकनगर, गुना, सागर, विदिशा, दतिया, रायसेन और भोपाल तक के अफसरों के नाम तय कर उन्हें लक्ष्य दिया गया. बताया गया कि कहां से कितनी संख्या में बसें अधिगृहीत कर ‘हितग्राहियों’ को कार्यक्रम स्थल तक लाना है. इस पत्र के हिसाब से कुल 750 बसों में ‘हितग्राहियों’ को वहां पहुंचना था. इस तरह एक बस से 50 लोग भी मानें तो कम से 37,500 तो होने ही चाहिए थे.

सम्मेलन के लिए पार्टी स्तर पर की गईं तैयारियां इसके अलावा थीं. इस तरह अनुमान था कि सम्मेलन में करीब 50-60 हजार लोग तो पहुंचने ही चाहिए. लेकिन स्थानीय अख़बारों की मानें तो सम्मेलन में भीड़ अनुमानित आंकड़े के आसपास भी नहीं पहुंची. जबकि मुख्यमंत्री खुद इस कार्यक्रम को कितनी गंभीरता से ले रहे थे इसका अंदाजा इसी से हो सकता है कि वे 25 दिसंबर को गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के शपथ ग्रहण समारोह के लिए गांधीनगर में रुके तक नहीं. हालांकि वे वहां पहुंचे जरूर. रूपाणी को बधाई दी. और फिर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से इजाज़त लेकर शपथ समारोह से पहले ही उल्टे पैर लौट लिए. लेकिन उनकी इस गंभीरता पर ‘हितग्राहियों की बेरुख़ी’ भारी पड़ी.

सम्मेलन के अगले दिन अख़बारों में यह ख़बर प्रमुखता से छपी कि पिपरई के ‘हितग्राही सम्मेलन में शिवराज की मौजूदगी और सरकारी मेहनत-मशक्कत के बावज़ूद कम भीड़ पहुंची जबकि इसी गांव में जब 17 दिसंबर को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सभा की थी तो उसमें कहीं ज्यादा (प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेंदी का दावा 50 हजार लोगों का था) लोग पहुंचे थे.’ ख़बर में ‘भीड़ के आंकड़े पर सरकारी अफसरों की चुप्पी’ का भी खास उल्लेख किया गया. और यह लाज़मी था क्योंकि इस तरह के कार्यक्रमों में लोगों की मौज़ूदगी का आंकड़ा अक्सर ही अफसर लोग बढ़-चढ़कर बताया करते हैं. ताकि मुख्यमंत्री की नजर में उनके नंबर बढ़ जाएं. पर इस सम्मेलन को लेकर ऐसा कोई दावा नहीं किया गया.

चिंता तो चित्रकूट ने ही बढ़ा दी थी

पिपरई का सम्मेलन कोई इकलौता उदाहरण नहीं है. इससे पहले नवंबर में चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव में भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा को ऐसे ही कड़वे अनुभव हुए थे. कांग्रेस से यह सीट छीनने के लिए भाजपा और मुख्यमंत्री चौहान ने यहां पूरी ताक़त झोंक दी. पार्टी प्रत्याशी शंकरदयाल त्रिपाठी के समर्थन में 38 सभाएं कीं. कई रोड शो किए. चुनाव प्रचार की आख़िरी दो रातें (पांच-छह नवंबर की) मुख्यमंत्री ने तुर्रा और सरभंगा गांवों मे बिताईं. लेकिन नतीजा? कांग्रेस के नीलांशु चतुर्वेदी ने बड़ी आसानी ने भाजपा उम्मीदवार त्रिपाठी को हरा दिया. हालांकि इस नतीजे से ज़्यादा दिलचस्प यह रहा कि जिन गांवों में मुख्यमंत्री ने सभाएं कीं या रात्रि विश्राम किया उनमें से अधिकांश में भाजपा हार गई.

सिर्फ़ मुख्यमंत्री ही नहीं, भाजपा ने भी यहां पूरा जोर लगा रखा था. बताते हैं कि पार्टी ने चित्रकूट में प्रचार के लिए एक दर्जन से अधिक मंत्रियों, 45 विधायकों, सात सांसदों और उत्तरप्रदेश के एक उप-मुख्यमंत्री को लगाया था. प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के नेतृत्व में संगठन के नेताओं की भारी-भरकम टीम अलग थी. फिर भी चित्रकूट ने शिवराज और भाजपा की चिंता बढ़ाने में कसर नहीं छोड़ी. यही वजह है कि अब मुंगावली और कोलारस सीटों (शिवपुरी जिले की यह सीट भी कांग्रेस की रही है. पार्टी विधायक रामसिंह यादव के निधन से यह खाली हुई है.) पर आगामी उपचुनाव शिवराज और प्रदेश भाजपा के लिए किसी अग्नि-परीक्षा से कम साबित नहीं हो रहे हैं.

घोषणावीर होना सबसे बड़ी मुश्किल

दरअसल शिवराज सिंह चौहान को लेकर भाजपा की चिंता यह है कि वे जहां भी जाते हैं धुआंधार घोषणाएं कर देते हैं. मगर अफसर उनमें से आधी-चौथाई घोषणाओं को भी अमलीज़ामा नहीं पहनाते. इसके बावज़ूद शिवराज अफ़सरों पर बंद आंखों से भरोसा करते हैं. शायद इसीलिए अगस्त में जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तीन दिन की यात्रा पर भोपाल आए थे तो वे भी शिवराज को इसके लिए टोक गए थे कि उनके राज में अफ़सरशाही बेलगाम है.

मगर इस टोका-टोकी का कोई असर हुआ हो ऐसा लगता नहीं. इसकी एक मिसाल अमति शाह के मध्य प्रदेश दौरे के समय ही सुर्ख़ियों में आ गई थी. शाह उस वक़्त भोपाल के वॉर्ड-26 के निवासी एक आदिवासी कार्यकर्ता कमल सिंह उइके के घर पर दोपहर के भोजन के लिए गए थे. कमल के घर शौचालय नहीं था. इसके लिए उनके आवेदन पर छह महीने से कोई सुनवाई नहीं हो रही थी. लेकिन जैसे ही उनके घर अमित शाह के दौरे का कार्यकम बना तो आनन-फानन में वहां ‘शौचालय प्रकट हो गया’. या यूं कहें कि प्रकट कर दिया गया. यहां तक तो फिर भी ठीक था. पर जैसे ही अमित शाह ने कमल के घर से पीठ फेरी वह ‘शौचालय भी अंतर्धान’ हो गया. उतनी ही फुर्ती से जैसे प्रकट हुआ था. सो ऐसी अद्भुत घटना सुर्ख़ियों में आनी ही थी.

एक फैक्टर गुजरात भी

प्रदेश भाजपा की चिंता का एक फैक्टर गुजरात चुनाव भी है. वहां प्रधानमंत्री नरेंद मोदी, उनके मंत्रिमंडल के तमाम सदस्य, भाजपाशासित राज्यों के क़रीब-क़रीब सभी मुख्यमंत्री, पार्टी पदाधिकारियों और आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की फौज़ के मैदान में उतरने पर भी अपेक्षित नतीजे नहीं मिले. पार्टी का लक्ष्य 150 सीटों का था. पिछली बार 115 सीटें जीती थीं. लेकिन इस बार न तो लक्ष्य हासिल हुआ और न पिछला प्रदर्शन दोहराया जा सका. बल्कि पार्टी 99 सीटों पर सिमट गई.

भाजपा को इस ‘गति’ तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई कांग्रेस की रणनीति ने. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हार्दिक पटेल (पाटीदार नेता), अल्पेश ठाकोर (पिछड़े वर्गों के अगुवा) और जिग्नेश मेवानी (दलितों के झंडाबरदार) को साथ लेकर ऐसा चक्रव्यूह बनाया कि भाजपा नेताओं के हाथ-पांव फूल गए. कांग्रेस के इसी व्यूह की आशंका मध्य प्रदेश भाजपा को भी सता रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस की राज्य इकाई में जोश भर रहा है. सूत्र बताते हैं कि प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दीवक बावरिया की अगुवाई में विभिन्न सीटों के जातीय गणित को ध्यान रखते हुए अगले विधानसभा के लिए रणनीति बनाई जा रही है. दूसरी तरफ युवा चेहरे के तौर पर सिंधिया हैं ही. यानी युवा अपील और जातीय समीकरणों का जो फॉर्मूला कांग्रेस ने गुजरात में लागू किया उसे वह मध्य प्रदेश में भी अमल में ला सकती है.

तो क्या भाजपा अब शिवराज का विकल्प सामने ला सकती है?

संभावना 50-50 सी है. हालांकि भाजपा नेता ऊपरी तौर पर कह तो यही रहे हैं कि पार्टी प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी. लेकिन राज्य की राजनीति समझने वाले इसके उलट संभावना को भी ख़ारिज़ नहीं करते. यानी शिवराज का कोई विकल्प भी देर-सवेर सामने लाया जा सकता है. चुनाव से पहले या उसके बाद. कभी भी. ऐसे में अगर यह संभावना बनी तो जानकारों के मुताबिक मौजूदा केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सशक्त दावेदार हो सकते हैं. भाजपा ने पिछले दो चुनाव बतौर पार्टी अध्यक्ष उन्हीं के नेतृत्व में जीते हैं. संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ है. सत्ता का अनुभव (तोमर प्रदेश में भी मंत्री रह चुके हैं.) है. और पार्टी के मौजूदा राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ उनकी पटरी भी अच्छी बैठती है.

तोमर के बाद एक नाम पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल का लिया जा रहा है. पार्टी के मौजूदा राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी दावेदारों में हैं. हालांकि तमाम दावेदारों में से किसी के लिए भी संभावना तभी बनेगी जब शिवराज सिंह चौहान कमजोर हों. और यह काफी हद तक मुगावली तथा कोलारस के उपचुनाव में भाजपा का प्रदर्शन तय कर सकता है.

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