पटेल -नेहरु मतभेद को ‘ताड़’ बनाने वाले वाजपेयी -आडवाणी विवाद को क्यों भूल जाते हैं ?

पटेल -नेहरु मतभेद को ‘ताड़’ बनाने वाले वाजपेयी -आडवाणी विवाद को क्यों भूल जाते हैं ?

बीते कुछ सालों से एक सिलसिला सा चल पड़ा है कुछ मुद्दों पर पटेल और नेहरु के मतभेदों को उछालकर नेहरु को नीचा दिखाने का . पटेल से नेहरु के मतभेदों की बुनियाद पर नेहरु को विलेन साबित करने की कोशिशों और साजिशों के बीच ये बात दब जाती है कि दोनों के बीच लोकतांत्रिक रिश्ते थे . दोनों एक दूसरे की कद्र करते थे . कभी नेहरु की बातों के सामने पटेल झुकते थे , तो कभी पटेल के दबाव में नेहरु उनकी बात मान लेते थे . ऐसे संवादों और हालातों को समझने की जरुरत है . दोनों कद्दावर नेताओं में कई मुद्दों पर मतभेद बावजूद सारे बड़े फैसले में दोनों साथ थे .यहां तक बंटवारे के लिए एक बड़ा वर्ग नेहरु को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करता है , जबकि लॉर्ड माउंटबेटन के साथ होने वाली हर बैठक में नेहरु के साथ पटेल भी होते थे . अगर पटेल से असहमतियां ही नेहरु को कमतर करने और नीचा दिखाने का आधार है तो वाजपेयी और आडवाणी के मतभेदों के किस्से कम नहीं हैं . 1998 से 2004 के बीच कई ऐसे मौके आए , जब पीएम वाजपेयी और गृह मंत्री आडवाणी के बीच जबरदस्त मतभेद की खबरें आई . दोनों के बीच मतभेद का एक किस्सा फिर से …

जब सीएम मोदी को हटाना चाहते थे वाजपेयी और बचाने पर अड़े आडवाणी

वो तारीख थी 12 अप्रैल 2002 . गुजरात दंगे के बाद गोवा में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही थी . दिल्ली से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी एक ही विमान से गोवा जाने वाले थे . उन दोनों के अलावा विदेश मंत्री जसवंत सिंह को उस जहाज में जाना था . दिल्ली से प्रधानमंत्री के विशेष विमान के रवाना होने से कुछ घंटे पहले विनिवेश मंत्री अरुण शौरी के पास प्रधानमंत्री से सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा का फोन आया .

मिश्रा ने शौरी से पूछा – ‘क्या आपने गोवा का टिकट करवा लिया है ? ‘

शौरी ने जवाब दिया -‘ हां 

बृजेश मिश्रा ने कहा – ‘ आप अपना टिकट तुरंत कैंसिल करा लीजिए . आपको पीएम के प्लेन में जाना है . ‘

वजह पूछने पर बृजेश मिश्रा ने अरुण शौरी से कहा कि अगर आप साथ नहीं जाएंगे तो वाजपेयी जी और आडवाणी जी आपस में एक शब्द भी बात नहीं करेंगे . अरुण शौरी भी दोनों के बीच कई दिनों से चली आ रही संवादहीनता से परिचित थे . एक दिन पहले ही शौरी सिंगापुर और कंबोडिया की यात्रा से लौटे थे . प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इस सरकारी यात्रा में भी अरुण शौरी वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य और बृजेश मिश्रा के कहने पर ही गए थे . जब अरुण शौरी तय वक्त पर प्रधानमंत्री को लेकर जाने वाले विशेष विमान में दाखिल हुए तो वहां पहले से वाजपेयी , आडवाणी और जसवंत सिंह अपनी -अपनी सीटों पर बैठे थे . बकौल शौरी विंडो की एक सीट पर वाजपेयी बैठे थे . सामने वाली विंडो सीट पर आडवाणी थे . दूसरी तरफ जसवंत सिंह . जैसे ही प्लेन ने टेक ऑफ किया , वाजपेयी ने सामने रखे टेबल से एक अखबार उठाया और पूरे पन्ने को इस तरह से खोलकर पढ़ना शुरु किया कि सामने बैठे आडवाणी से नजरें भी न मिल पाए . फिर आडवाणी ने भी एक अखबार उठाया और पढने लगे . प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री आमने -सामने बैठकर भी एक दूसरे से बचने की कोशिश कर रहे थे . जसवंत सिंह और अरुण शौरी को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे उन दोनों के बीच संवादहीनता खत्म कराई जाए . कुछ सोचने के बाद अरुण शौरी ने वाजपेयी के हाथ से अखबार ले लिया और कहा – ‘ वाजपेयी जी , न्यूज पेपर तो बाद में भी पढ़ा जा सकता है . आप आडवाणी जी वो जो कहना चाहते हैं , वो कह क्यों नहीं रहे हैं ? ‘ अरुण शौरी के मुताबिक वाजपेयी ने कहा दो चीजें बहुत जरूरी हैं . एक तो वेंकैया नायडू को जेना कृष्णमूर्ति की जगह बीजेपी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए . दूसरा – मोदी को इस्तीफा देना चाहिए ‘ आडवाणी ने कहा कि इससे राज्य में अस्थिरता जैसी स्थिति हो जाएगी लेकिन वाजपेयी के मूड को देखते हुए ये तय हो गया कि गोवा पहुंचकर नरेन्द्र मोदी को इस्तीफे के लिए कहा जाएगा .

आगे क्या हुआ , जानने से पहले लाल कृष्ण आडवाणी ने विमान या्त्रा में हुए संवाद का अपनी किताब MY COUNTRY , MY LIFE में जो जिक्र किया है , उसे भी जान लें . आडवाणी ने लिखा है – दो घंटे की यात्रा के दौरान शुरु में हमारी चर्चा गुजरात पर ही केन्द्रित रही . अटल जी ध्यानमग्न थे . थोड़ी देर के लिए निस्तब्धता छाई रही . तभी जसवंत सिंह द्वारा प्रश्न पूछने के बाद चुप्पी टूटी – ‘ अटल जी आप क्या सोच रहे हैं ? ‘ अटल जी ने जवाब दिया – ‘कम से कम इस्तीफे का ऑफर तो करते ‘ तब मैंने कहा – यदि नरेन्द्र के पद छोड़ने से गुजरात की स्थिति में सुधार आता है तो मैं चाहूंगा कि उन्हें इस्तीफे के लिए कहा जाए . लेकिन मैं नहीं मानता कि इससे कोई मदद मिल पाएगी . मुझे विश्वास नहीं है कि पार्टी की राष्ट्रीय परिषद या कार्यकारिणी इस प्रस्ताव को स्वीकार करेगी ‘ विमान के लैंड करने से पहले ही मोदी के इस्तीफे की पृ्ष्ठभूमि तैयार हो गई . वाजपेयी निश्चिंत हो गए .

गोवा पहुंचने के बाद नरेन्द्र मोदी को वाजपेयी की राय से अवगत करा दिया गया . बकौल आडवाणी , मोदी इस्तीफे के लिए सहमत भी हो गए . कार्यकारिणी शुरु हुई . कई नेताओं के बोलने के बाद जब मोदी बोलने के लिए उठे तो उन्होंने गुजरात में बीते सालों के दौरान हुए दंगों का जिक्र करते हुए सांप्रदायिक तनाव की ऐतिहासिक वजहें गिनाई . अंत में कहा कि गुजरात में होने वाले इस कांड की जिम्मेदारी लेते हुए मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं . मोदी का इतना कहना था कि कई राज्यों से आए बीजेपी नेता शोर मचाने लगे . मोदी के इस्तीफे का विरोध करने लगे . इस्तीफा मत दो, इस्तीफा मत दो के नारे लगने लगे . प्रमोद महाजन तक ने कहा कि मोदी के इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता .

वाजपेयी हतप्रभ थे . उन्हें अपनी हार होती दिख रही थी . तभी अरुण शौरी ने माइक लेकर विमान में वाजेपेयी और आडवाणी के बीच हुई बातचीत और सहमति के बारे में सबको जानकारी दी . शोर तब भी नहीं थमा . मोदी का इस्तीफा नहीं होगा , जैसे नारे वाजपेयी को मुंह चिढा रहे थे . माहौल भांप पर वाजपेयी ने कहा – ‘ठीक है , इसका फैसला बाद में कर लेंगे .’

तब भीड़ से आवाज आई -‘ बाद में नहीं , आज ही करिए फैसला . मोदी का इस्तीफा नहीं होगा . ‘ फिर सब इसी तरह का शोर मचाने लगे . आडवाणी सब कुछ चुपचाप देख रहे थे . उन्होंने एक शब्द नहीं कहा . नारे लगाने वालों को रोकने की भी कोशिश नहीं की . वाजपेयी को जिंदगी में पहली बार अपनी पार्टी के सैकड़ों जूनियर और युवा नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा था . उनके चेहरे पर तनाव और अपनी हार की कसक साफ दिख रही थी . इसी शोर में वाजपेयी की हार हुई . आडवाणी और मोदी की जीत हुई . बकौल अरुण शौरी गोवा में हुई जलालत को ताउम्र नहीं भूल पाए . उन्हें लगा कि विमान में सब तय होने के बाद भी मोदी के बचाव में इस नाटक की पटकथा पार्टी नेताओं ने ही लिखी थी .

गोवा जाने से पहले करीब एक सप्ताह पहले वाजपेयी गुजरात होकर आए थे . उन्होंने अहमदाबाद के शाह आलम कैंप का भी दौरा किया था , जहां करीब नौ हजार दंगा पीडितों ने शरण ले रखी थी . वहां एक मुस्लिम महिला ने वाजपेयी ने ये कहकर झकझोर दिया था कि अब एक मात्र आप ही हैं , जिसका सहारा है . जो इन नरक से बचा सकता है . उसी के बाद वाजपेयी ने अहमदाबाद के प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान सीएम नरेन्द्र मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी . बगल में बैठे नरेन्द्र मोदी ने कहा था – हम भी तो वही कर रहे हैं साहेब. फिर वाजपेयी ने थोड़ा नरम होते हुए कहा था – ‘ उम्मीद है कि नरेन्द्र भाई भी वही कर रहे होंगे . ‘

गुजरात से लौटने के बाद से ही वाजपेयी लगातार परेशान थे . विरोधी दलों का भी उन पर जबरदस्त दवाब था . वो चाहते थे कि मोदी इस्तीफा दे दें लेकिन इसके लिए उन्हें उप प्रधानमंत्री और नरेन्द्र मोदी के सबसे बड़े पक्षधर आडवाणी को तैयार करना था . वाजपेयी भीतर ही भीतर घुंट रहे थे लेकिन आडवाणी से अपने दिल की बात कह नही पा रहे थे . इसका जिक्र उनके बेहद करीब रहे अरुण शौरी ने कई साल पहले एक इंटरव्यू और लेख में किया था . गुजरात से लौटने के तीन बाद वाजपेयी को सिंगापुर और कंबोडिया की सरकारी यात्रा पर जाना था . उन्हें इस बात की चिंता सता रही थी कि अगर वहां मीडिया ने गुजरात के मुद्दे पर उनसे सवाल पूछा तो क्या मुंह दिखाएंगे . यही बात उन्होंने गुजरात में कही भी थी . तब अरुण शौरी ने उन्हें सलाह दी कि आप क्यों नहीं आडवाणी जी से इस मुद्दे पर बात लेते हैं . वाजपेयी ने कहा जरुर कि मैं बात करुंगा लेकिन की नहीं . सिंगापुर यात्रा पर उनके साथ अरुण शौरी बृजेश मिश्रा के कहने पर सिर्फ इसलिए साथ गए ताकि उन्हें कहीं असहज स्थितियों का सामना करना पड़े तो शौरी उनके साथ रहें . लौटकर आए तो फिर शौरी को उनके साथ भेजा गया . इसके बाद की कहानी आप पढ़ चुके हैं .

अरुण शौरी ने इस विमान यात्रा का विवरण 2009 में Alice in Blunderland नामक लेख में लिखा . उसके बाद भी समय -समय पर शौरी अपने इंटरव्यू में वाजपेयी -आडवाणी संवाद और मतभेद का जिक्र करते रहे हैं . शौरी ने इस बात पर हर बार जोर दिया है कि वाजपेयी उन दिनों बहुत दुखी थे और मोदी के इस्तीफे के पक्ष में थे . गुजरात के दंगा पीड़ित इलाकों से लौटने के बाद उन्हें विदेश जाते हुए इसी बात की चिंता थी कि अगर उन्हें वहां दंगों के दौरान सरकार की भूमिका पर सवाल पूछे गए तो वो क्या जवाब देंगे .

वाजपेयी पर ULLEKH N.P की किताब THE UNTOLD VAJPAYEE में भी इस वाजपेयी की चिंता और परेशानियों का जिक्र किया गया है . आडवाणी ने अपनी किताब में वाजपेयी से इस मुद्दे पर अपने मतभेद का जिक्र करते हुए लिखा है कि वाजपेयी ने उनसे कहा – ‘कम से इस्तीफे का ऑफर तो करते ‘ , यहां वाजपेयी उतने तल्ख भले नहीं नजर आते हैं लेकिन आडवाणी ने भी माना तो है ही कि वाजपेयी मोदी का इस्तीफा चाहते थे

अब वक्त का पहिया काफी घूम चुका है . गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी का इस्तीफा चाहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी लंबी बीमारी से जूझते हुए बोलने ,सुनने और समझने की झमता तक खो चुके हैं . मोदी को हर हाल में बनाए -बचाए और बढ़ाए रखने की हमेशा पैरोकारी करने वाले बुजुर्ग पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी हाशिए पर हैं . न उनकी कोई सुनता है , न कोई पूछता है .

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