श्रीदेवी की तरह अगर ‘गोदी मीडिया’ जज लोया की हत्या पर भी इतने कयास लगाती तो अबतक ‘हत्यारा’ पकड़ जाता

श्रीदेवी की तरह अगर ‘गोदी मीडिया’ जज लोया की हत्या पर भी इतने कयास लगाती तो अबतक ‘हत्यारा’ पकड़ जाता

पिछले दो दिनों से तमाम जरूरी मुद्दों को दबाने के लिए मीडिया ने एक फिल्म स्टार की मौत का तमाशा बना रखा है। न्यूज़ चैनल उनके अंतिम पलों का कुछ ऐसे वर्णन कर रहे हैं जैसे वो साथ ही रहे हो।

मौत दुबई में हुई लेकिन खबरों का पोस्टमार्टम भारतीय मीडिया कर रही है, वो भी खुद के ग्राऊंड रिपोर्टिंग के दम पर नहीं बल्कि किसी-किसी न्यूज एजेंसी के हवाले से। ये वही मीडिया है जिसने जज लोया मामले में सिर्फ एक नाम जुड़े होने के डर से उस पूरे मामले को दबा दिया।

जज लोया की मौत पर रिपोर्टिंग हो सकती है। करोड़-अरबों में खेलने वाली मेनस्ट्रीम मीडिया के पास इतना तो संसाधन और सामर्थ्य तो है ही कि वो इस मौत की जांच के लिए सरकार को मजबूर कर सके। मगर वो ऐसा नहीं कर कर रही है।

ज्यादातर मेनस्ट्रीम मीडिया का आचरण ही भ्रष्ट हो चुका है। भारतीय मीडिया हमारी कुंठित सामाजिक संरचना का जमकर फायदा उठा रही है।

मीडिया सिर्फ उन मुद्दों को उठाने लगी है जिससे उन्हें टीआरपी मिले, वो उन मुद्दों को चिमटे से भी नहीं छूती जिससे उनका आर्थिक नुकशान हो।

गत शनिवार सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने सोहराबुद्दीन शेख़ फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले की सुनवाई करने वाले जज बीएच लोया की मौत की न्यायिक जांच या विशेष जांच दल द्वारा जांच कराए जाने की मांग उठाया।

उन्हें सुनने के लिए तो हर मीडियाकर्मी पहुंचा मगर जज लोया मौत कैसे हुई मीडिया ने इस मामले की चर्चा तक नहीं की एक दो अपवादों को छोड़ दें तो जज लोया का मामला सिर्फ खबरियां चैनल की वेबसाइट पर एक लाइन में सीमित होकर रह गया। वो हैडलाइन थी जज लोया केस की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट में होगी।

जज लोया मामले पर सोशल मीडिया पर लोग लिखते रहे लाइव वीडियो करते रहे मगर मीडिया लोया मामले को ऐसे नज़रअंदाज़ करता रहा जैसे वो रोजगार और समाज के अन्य अहम मुद्दों को करता है।

इसमें कोई शक नहीं है फिल्म स्टार की मौत कैसे हुई इसकी जांच नहीं होनी चाहिए या उसपर रिपोर्टिंग नहीं होनी चाहिए मगर जिस देश में हजारों करोड़ के घोटाले हो रहे हो घोटाला करने वाला बैंक को चिट्टी लिखकर ये कह रहा हो की मैं पैसे नहीं लौटा सकता हूँ आम भाषा में कहें तो उसका कहना है ये है जो करते बने कर लो।

वहां यही मीडिया इस बात की फर्जी ख़बर चलाने में व्यस्त है की इतने करोड़ की चल और अचल संपति जब्त हुई है हालाकिं सच्चाई कुछ और थी। घोटाला इतना बड़ा है जैसे कोई 100 रूपया ले और 5 रूपया जब्त कर बोले की हमने पैसे वसूल लिए।

मीडिया हर मुद्दे को जोर शोर से उठाता है ऐसा कहना गलत है। दिल्ली में बैठा मीडिया स्टूडियो में बैठकर उन्ही मुद्दों को उठता है जिससे उसे नुकसान न हो।

मीडिया संस्थान में बैठे संपादकों को ये डर है की अगर वो जज लोया मामले पर रिपोर्टिंग करवाते है तो उनके चैनल को मिलने वाले उस फायदे को गवां बैठेंगे जिससे वो नंबर वन होने का दावा करते है।

Courtesy: boltaup

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