एकजुट विपक्ष के अलावा अपनी खामियां भी भाजपा पर भारी, समझिए कैराना के संकेत

एकजुट विपक्ष के अलावा अपनी खामियां भी भाजपा पर भारी, समझिए कैराना के संकेत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुनाव जीताऊ जोड़ी को टक्कर देने के लिए एकजुट हो रहे विपक्ष के लिए कैराना और नूरपुर उपचुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। सपा-रालोद के गठबंधन ने दोनों सीटों पर भाजपा को मात देकर 2019 के सियासी समीकरण मजबूत किए हैं। योगी के राज और मोदी की रैली के बावजूद भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण लामबंद हुए विपक्ष को माना जा रहा है। विपक्ष के इस अंकगणित का भाजपा के पास फिलहाल कोई तोड़ नहीं दिख रहा है। योगी की सभाओं लेकर मोदी की रैली, जिन्ना से लेकर 2013 के दंगों की याद, भाजपा के चुनाव प्रबंधन से लेकर संघ का समर्थन और मंत्रियों-सांसदों की दिन-रात मेहनत कैराना-नूरपुर में भाजपा को जीत नहीं दिला पाई।

कैराना के नतीजों पर गौर करें तो विपक्ष की इस एकजुटता के अलावा भी कई फैक्टर हैं जो भाजपा के खिलाफ गए। सबसे अहम बात है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले उसके वोट प्रतिशत में गिरावट आई है। 2017 के विधानसभा चुनाव की बढ़त भी भाजपा बरकरार नहींरख पाई है। केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा के वोट प्रतिशत में यह गिरावट सत्ता विरोधी लहर शुरू होने का संकेत दे रही है। किसानों की बेहाली, काम-धंधों में सुस्ती, रोजगार के संकट के बीच हिंदू-मुस्लिम कार्ड का नाकाम होना भाजपा के लिए सबक है तो विपक्ष को भी उपचुनावों के संकेतों को ध्यान से पढ़ना होगा।

भाजपा को 1.30 लाख वोटों का नुकसान

2014 के लोकसभा चुनावों के मुकाबले कैराना उपचुनाव में मतदान का प्रतिशत काफी कम रहा। ईवीएम और वीवीपैट में गड़बड़ी के शिकायतों के बीच 28 मई को संपन्न हुए उपचुनाव में करीब 54 फीसदी मतदान हुआ, जबकि 2014 में यहां 73 फीसदी मतदान हुआ था। वीवीपैट में गड़बड़ी वाले 73 बूथों में दोबारा मतदान भी 61 फीसदी ही रहा। इस तरह कैराना में कुल 9.39 लाख वोट पड़े जो 2014 में पड़े 11.19 लाख वोटों से करीब एक लाख 80 हजार कम हैं।

2014 में भाजपा के हुकुम सिंह को कैराना में 5.66 लाख वोट मिले जबकि इस बार उनकी बेटी मृगांका सिंह को 4.36 लाख वोट मिले। यानी भाजपा प्रत्याशी को एक लाख 30 हजार वोटों का नुकसान हुआ है। इस नुकसान के दो कारण हो सकते हैं। या तो भाजपा के वोटर उससे छिटकने लगे हैं या फिर पहले जैसी तादाद में मतदान के लिए घरों से नहीं निकले। दोनों ही स्थितियां भाजपा के लिए खतरे का संकेत हैं। भाजपा को हुए इन एक लाख 30 वोटों के नुकसान को जाट और कुछ दलित व ओबीसी मतदाताओं के भाजपा से मोहभंग से जोड़कर भी देखा जा सकता है।

विपक्षी दल ही नहीं वोट बैंक भी लामबंद 

दूसरी तरफ, गठबंधन की ओर से रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन को 4.81 लाख वोट मिले। उन्होंने 44,618 वोटों से जीत हासिल की है। 2014 में इस सीट पर सपा, रालोद और बसपा तीनों के उम्मीदवारों को मिलाकर कुल 5.32 लाख वोट मिले थे। रालोद से गठबंधन के चलते तब भी कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था। कम मतदान के चलते गठबंधन इस आंकड़े को तो नहीं छू पाया लेकिन पिछली बार सपा उम्मीदवार को मिले 3.26 लाख वोटों के मुकाबले इस बार सपा-रालोद गठबंधन को करीब डेढ़ लाख वोट ज्यादा मिले।

क्या रालोद का जाट मतदाता मुस्लिम उम्मीदवार को वोट देगा? इसे लेकर उठ रहे सवालों का जवाब भी कैराना ने दे दिया है।

2014 के मुकाबले गठबंधन को करीब 4 फीसदी वोट ज्यादा मिले है। गठबंधन को जीत इसी अंतर से निकली है। यानी सपा-रालोद के साथ आने और कांग्रेस के खुले और बसपा के मौन समर्थन के चलते इन पार्टियों का पुराना वोट बैंक तो एकजुट हुआ ही, करीब चार फीसदी अतिरक्त वोट भी इनके खाते में आए। वह भी तब जबकि मतदान का प्रतिशत काफी कम रहा।

इससे साफ है कि चौधरी चरण सिंह के ‘मजगर’ (मुस्लिम-जाट-गुर्जर-राजपूत) की तरह इस बार ‘मजाद’ (मुस्लिम-जाट-दलित) फार्मूला विपक्षी गठबंधन के लिए संजीवनी साबित हुआ। सिर्फ विपक्षी दल ही लामबंद नहीं हुए, उनसे जुड़े वोट बैंक भी एकजुट हुए और इसमें इजाफा भी हुआ।

4 फीसदी घटा भाजपा का वोट

वोट प्रतिशत के लिहाज से भी कैराना में भाजपा को नुकसान पहुंचा है। 2014 में भाजपा को यहां करीब 50.54 फीसदी वोट मिले थे, जबकि इस बार भाजपा उम्मीदवार मृगांका सिंह के खाते में 46.50 फीसदी वोट आए हैं। इन चार फीसदी वोटों के नुकसान में भाजपा से मोहभंग के बाद रालोद की ओर लौटे जाट मतदाताओं का बड़ा हाथ है।

दूसरी तरफ, गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन को 51.25 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि 2014 में सपा, रालोद और बसपा तीनों को मिलाकर करीब 47.53 फीसदी वोट मिले थे। यानी, भाजपा का करीब 4 फीसदी वोटों का नुकसान गठबंधन के फायदे में तब्दील हो गया। सपा, कांग्रेस और बसपा का वोटबैंक तो रालोद को ट्रांसफर हुआ, अपने जाट वोट बैंक को संजोने में भी रालोद कामयाब रही। किसानों की दुर्दशा और भाजपा से जाटों की निराशा के बगैर यह संभव नहीं था। फिर रालोद का वजूद बचाने के अहसास ने भी जाटों को गठबंधन के पक्ष में लामबंद किया।

यह इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि कांग्रेस ने सपा-रालोद गठबंधन को पर्दे के पीछे से समर्थन दिया था। कांग्रेस का कोई बड़ा नेता वहां प्रचार करने नहीं गया। कांग्रेस उपाध्यक्ष इमरान मसूद भी काफी देर से सक्रिय हुए थे। बसपा ने तो आखिर तक अपने पत्ते नहीं खोले थे। इसके बावजूद इन पार्टियों का वोट बैंक भाजपा के खिलाफ न सिर्फ एकजुट रहा बल्कि इसमें चार फीसदी का इजाफा भी हुआ।

5 से सिर्फ एक विधानसभा में भाजपा जीती, गढ़ नहीं बचा पाए गन्ना मंत्री  

विधानसभा क्षेत्रों के लिहाज से कैराना के नतीजे को देखें तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके गन्ना विकास मंत्री सुरेश राणा के लिए खतरे की घंटी है। कैराना लोकसभा क्षेत्र में आने वाले 5 विधानसभा क्षेत्रों में से भाजपा सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र में आगे रही है। जबकि 2014 में हुकुम सिंह पांचों सीटों पर आगे थे। 2017 के विधानसभा चुनावों भी भाजपा ने पांच से चार सीटों – नकुड़, गंगोह, थानाभवन और शामली पर जीत दर्ज की थी। सिर्फ कैराना विधानसभा सीट पर सपा के नाहिद हसन जीते थे।

इस बार परिणाम एकदम उल्टा रहा। चार विधानसभा क्षेत्रों – नकुड़, गंगोह, थानाभवन और शामली में गठबंधन आगे रहा, जबकि कैराना में भाजपा को बढ़त मिली। गठबंधन को जीत दिलाने में सबसे अहम भूमिका नकुड़, गंगोह और थानाभवन सीटों ने निभाई। इन तीन सीटों पर करीब 80 हजार जाट वोट हैं। विधानसभा चुनाव में जिन चारों सीटों पर भाजपा जीती थी, रालोद उम्मीदवार ने वहां उलटफेर कर जाट-मुस्लिम-दलित गठजोड़ के दमखम को साबित कर दिया है।

नकुड़ विधानसभा

मुस्लिम, दलित और गुर्जर मतदाताओं के प्रभाव वाली नकुड़ सीट पर कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद का काफी असर है। इसके साथ ही यहां करीब 15 हजार जाट वोट है जो एकतरफा रालोद पर गया। पिछले साल विधानसभा चुनावों में इमरान मसूद 90 हजार वोट पाकर 4 हजार वोटों के अंतर से दूसरे स्थान पर रहे थे। इस बार उपचुनाव में नकुड़ से गठबंधन प्रत्याशी को 1.14 हजार वोट मिले हैं, जबकि भाजपा 86 हजार वोट ही जुटा पाई। 28 हजार वोटों के इस अंतर ने गठबंधन की जीत को पुख्ता कर दिया।

गंगोह विधानसभा

गंगोह विधानसभा क्षेत्र से सपा-रालोद गठबंधन ने भाजपा के 96 हजार वोटों के मुकाबले करीब 1.08 लाख वोट हासिल किए। जबकि 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को यहां 99 हजार वोट मिले थे, और वह 38 हजार के भारी अंतर से जीती थी। लेकिन इस बार यहां 12 हजार वोटों से पिछड़ गई। यहां सपा-रालोद को कांग्रेस का समर्थन कारगर साबित हुआ।

नकुड़ और गंगोह दोनों सीटें सहारनपुर जिले में आती है और यहां मुस्लिम मतदाताओं के अलावा दलितों में भीम आर्मी का भी असर है। साथ यहां करीब 15 हजार जाट मतदाता भी हैं जिनका फायदा रालोद को मिला। हालांकि मायावती ने भले ही गठबंधन को खुलकर समर्थन नहीं दिया, लेकिन भीम आर्मी के लोग रालोद प्रत्याशी के साथ थे।

थानाभवन विधानसभा

शामली जिले में पड़ने वाली थानाभवन सीट पर भी रालोद प्रत्याशी की बढ़त रही। यूपी के गन्ना मंत्री और मुजफ्फरनगर दंगों में आरोपी रहे भाजपा के सुरेश राणा यहीं से चुनकर आए थे। उपचुनावों में यहां रालोद को करीब 92 हजार और भाजपा को 77 हजार वोट मिले हैं। 15 हजार का यह अंतर गठबंधन की जीत में निर्णायक साबित हुआ। इस जीत में करीब 45 हजार जाट वोट निर्णायक साबित हुआ। जिनका अधिकांश हिस्सा रालोद  को गया। जबकि मंत्री सुरेश राणा के ठाकुर वोट करीब 15 हजार ही हैं और उनकी जीत की असली वजह हिंदू-मुसलिम के बीच ध्रुवीकरण रहा था।

 

गौरतलब है कि 2017 में भाजपा के सुरेश राणा को थानाभवन में करीब 91 हजार वोट मिले थे और वे करीब 16 हजार वोटों से जीते थे। यह बढ़त अब भाजपा के हाथ से निकल चुकी है। थानाभवन जाटों के प्रभाव वाला क्षेत्र है। गन्ना भुगतान की समस्या और सुरेश राणा से लोगों की नाराजगी को थानाभवन में हुए उलटफेर की प्रमुख वजह है। हर छोटे-बड़े चुनाव में मोदी-शाह के भरोसे रहना भी भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। जबकि सुरेश राणा सरीखे क्षेत्रीय नेता अपनी पकड़ बनाए रखने में नाकाम हो रहे हैं।

शामली विधानसभा

भाजपा का गढ़ माने जाने वाले शामली विधानसभा क्षेत्र में गठबंधन ने बढ़त बनाकर चौंका दिया है। यहां रालोद उम्मीदवार को 82 हजार तो भाजपा को 80 हजार वोट मिले। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा शामली सीट पर 69 हजार वोट पाकर करीब 29 हजार के अंतर से जीती थी। लेकिन विपक्ष के एकजुट होने से इस बार शामली में भी भाजपा पिछड़ गई। शहरी आबादी वाले शामली में पिछड़ना भाजपा के लिए इसलिए भी चिंताजनक होगा क्योंकि इस क्षेत्र में पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने काफी मेहनत की थी।  यहां मतदान में कभी से भाजपा को भी नुकसान हुआ। वैसे, बालियान को मंंत्री पद से हटाने को लेकर भी जाट समुदाय में नाराजगी है। इसलिए वे इस बार बहुत हक से वोट नहीं मांग पाए।

कैराना विधानसभा

कैराना लोकसभा की पांच सीटों में से भाजपा केवल कैराना विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाने में कामयाब रही है। यहां गठबंधन को 83 हजार वोट जबकि भाजपा को 96 हजार वोट मिले। 2017 के विधानसभा चुनाव में तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद हसन कैराना सीट पर 98 हजार वोट पाकर जीते थे, तब भाजपा की मृगांका सिंह को 77 हजार वोट मिले थे। यानी, तबस्सुम हसन का परिवार विधानसभा चुनाव में हासिल बढ़त को उपचुनाव में कायम नहीं रख पाया।

कैराना भाजपा सांसद रहे हुकुम सिंह का गढ़ रहा है। यहां हिंदू और मुस्लिम गुर्जर मतदाता का काफी असर है। हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण भी इसी इलाके में सबसे ज्यादा है। खास बात यह है कि कैराना सीट में जाट मतदाताओं की संख्या बाकी चार सीटों से कम है। कैराना विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के मतों में इजाफे को मृगांका के प्रति सहानुभूति, नाहिद और उनके परिवार से लोगों की नाराजगी और कई जगह ईवीएम-वीवीपैट में खराबी के चलते मतदान में कमी से जोड़कर देखा जा सकता है। अपने गढ़ में भाजपा प्रत्याशी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा है।

 

Courtesy: .outlook

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