स्टार्टअप योजनाओं के प्रचार में करोड़ों का खर्चा, परन्तु अब इस योजन की डगर बड़ी कठिन है

स्टार्टअप योजनाओं के प्रचार में करोड़ों का खर्चा, परन्तु अब इस योजन की डगर बड़ी कठिन है

संसदीय समिति की ही रिपोर्ट कहती है कि 6 फरवरी 2018 तक डीआईपीपी ने कुल 6981 नए स्टार्टअप चयनित किए लेकिन इनमें से सिर्फ 99 स्टार्टअप को फंड दिया गया, जबकि सिर्फ 82 को कर छूट का सर्टिफिकेट जारी हुआ.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए युवा उद्यमियों से बात की और बताया कि मोदी सरकार स्टार्ट-अप के लिए क्या कर रही है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश में युवा उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी मदद की जरूरत है. ऐसे में स्टार्टअप इंडिया जैसी योजना बहुत से युवा उद्यमियों की किस्मत बदल सकती है. क्योंकि युवा उद्यमियों के सामने पहला संकट ही फंड का होता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या स्टार्टअप योजना लॉन्च होने के बाद से अपने मकसद में कामयाब हुई है?

देश में 90 फीसदी से ज्यादा स्टार्टअप्स अपने पहले पांच साल में ही बंद हो जाते हैं

ये सवाल इसलिए क्योंकि योजना लॉन्च होने के तीन साल बाद के हालात कह रहे हैं कि या तो सरकार की स्टार्टअप इंडिया योजना में दिलचस्पी कुछ कम गई है या सरकार ने स्टार्टअप्स को उनके हाल पर छोड़ दिया है. क्योंकि-संसदीय समिति की नई रिपोर्ट कहती है कि 2017-18 में स्टार्टअप इंडिया के प्रचार के लिए आवंटित 10 करोड़ रुपए की रकम में से डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन यानी डीआईपीपी सिर्फ चार करोड़ रुपए ही खर्च कर सकी.

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यानी एक तरफ सरकारी योजनाओं के प्रचार में करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं लेकिन स्टार्टअप इंडिया के प्रमोशन पर किसी का ध्यान ही नहीं. लेकिन मामला सिर्फ प्रचार भर का भी नहीं है.

संसदीय समिति की ही रिपोर्ट कहती है कि 6 फरवरी 2018 तक डीआईपीपी ने कुल 6981 नए स्टार्टअप चयनित किए लेकिन इनमें से सिर्फ 99 स्टार्टअप को फंड दिया गया, जबकि सिर्फ 82 को कर छूट का सर्टिफिकेट जारी हुआ.

आलम ये कि पहले एक साल में सरकार स्टार्टअप के लिए बनाए 10 हजार करोड़ रुपए में सिर्फ 5.66 करोड़ ही स्टार्टअप को दे पाई थी. सितंबर 2017 तक सिर्फ 70 करोड़ रुपए की स्टार्टअप को मदद की गई.

खास बात यह है कि डीआईपीपी ने खुद अपने लिए मार्च 2019 तक 1000 नए स्टार्टअप्स की मदद का लक्ष्य तय किया है. लेकिन अगर अभी तक बमुश्किल 100-125 स्टार्टअप को ही मदद मिल सकी है तो अगले 9 महीने में क्या चमत्कार हो जाएगा?

हालांकि, सरकार के सामने दिक्कत यह है कि वो इनोवेटिव आइडिया वाले स्टार्टअप को फंडिंग करना चाहती है और जिन स्टार्टअप का प्रस्ताव सरकार के पास आया है, उनमें से ज्यादातर पुरातन या लीक पर चलते दिखते हैं. लेकिन, मसला तो युवा उद्यमियों के सामने के संकट का है क्योंकि आईबीएम की रिपोर्ट कहती है कि देश में 90 फीसदी से ज्यादा स्टार्टअप्स अपने पहले पांच साल में ही बंद हो जाते हैं क्योंकि उन्हें वित्त की कमी से जूझना पड़ता है.

 

तो क्या स्टार्टअप इंडिया का बुलबुला फूटने लगा है या नए युवा उद्यमियों को अपने बूते ही कुछ कमाल करना होगा क्योंकि एक तरफ हर साल नए स्टार्टअप्स खुलने की तादाद में लगातार कमी आ रही है, तो दूसरी तरफ सरकार स्टार्टअप को फंडिंग करने से लेकर बाकी मदद देने में जो तेजी दिखानी चाहिए थी, वो नहीं दिखाई गई. फिर नए स्टार्टअप को वेंचरफंडिंग मिल नहीं रही या कहें वेंचर कैपिटलिस्ट उन परियोजनाओं में पैसा लगाना पसंद कर रहे हैं, जो पहला जोखिम अपने बूते ले चुके हैं और एक स्तर पर अपने पैर पर खड़े हो चुके हैं.

 

इतना ही नहीं, स्टार्टअप उद्यमियों के लिए आने वाला वक्त और मुश्किल है. इन्नोवेन कैपिटल इंडिया स्टार्टअप आउटलुक रिपोर्ट 2018 कहती है कि साल 2018 में स्टार्टअप्स को फंड जुटाने में पहले सालों की तुलना में और मेहनत करनी होगी.

स्टार्टअप के लिए आने वाले दिन चुनौतीपूर्ण हैं- ये साफ है. ऐसे में सरकार नए स्टार्टअप को मदद में होने वाली देरी को कैसे कम कर पाती है- नए उद्यमियों की नजर इस पर ही होगी.

Courtesy: Firstpost

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