भाजपा और उसकी केंद्र सरकार के वे तीन हालिया राजनीतिक फैसले जिनमें सियासी सूझबूझ कम दिखती है

भाजपा और उसकी केंद्र सरकार के वे तीन हालिया राजनीतिक फैसले जिनमें सियासी सूझबूझ कम दिखती है

भारतीय जनता पार्टी के नेता अक्सर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर यह कहकर निशाना साधते हैं कि वे मौसमी नेता हैं और अक्सर चुनावों के आसपास ही सक्रिय दिखते हैं. उधर, अपने नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के बारे में वे कहते हैं कि ये दोनों दिन-रात राजनीतिक तौर पर सक्रिय रहते हैं. लेकिन इतनी सक्रियता के बावजूद भाजपा और उसकी केंद्र सरकार कई ऐसे राजनीतिक निर्णय लेती दिखती है जिनमें राजनीतिक सूझबूझ का स्पष्ट अभाव दिखता है.

2014 में सरकार बनने के बाद से लगातार ऐसे कई निर्णय दिखते हैं. लेकिन अगर 2018 की भी बात करें तो कम से कम तीन निर्णय ऐसे हैं जिनमें राजनीतिक सूझबूझ का स्पष्ट अभाव दिखता है और इस वजह से भाजपा और मोदी सरकार दोनों मुश्किलों में फंसते दिखते हैं.

कर्नाटक में सरकार

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था. जब नतीजे आए तो भाजपा सबसे बड़ी पार्टी तो बनकर उभरी लेकिन बहुमत से दूर रह गई. जब तक वह बहुमत जुटाने की कोशिश करती तब तक कांग्रेस और जनता दल सेकुलर (जेडीएस) का गठबंधन हो गया. उनके पास बहुमत का आंकड़ा था. इसके बावजूद राज्यपाल ने भाजपा को वहां सरकार बनाने का न्यौता दे दिया और बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बन गए.

इसके बाद न सिर्फ कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला की आलोचनाएं हुईं बल्कि केंद्र सरकार और भाजपा की भी काफी आलोचना हुई. यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी इस बात पर नाराजगी रही कि अगर भाजपा के पास संख्या बल नहीं था तो उसे राज्यपाल के पद का दुरुपयोग करके सरकार बनाने की आतुरता नहीं दिखाना चाहती थी. इससे आम लोगों में यह संदेश गया कि भाजपा सरकार बनाने और कांग्रेस को रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. बहुत सारे लोग जो न तो भाजपा समर्थक हैं और न ही कांग्रेस समर्थक हैं, उन्हें भी लगा कि अगर कांग्रेस और जेडीएस का पास बहुमत था तो फिर भाजपा को ऐसी कोशिशें नहीं करनी चाहिए थीं.

अंत में यही हुआ कि भाजपा संख्या जुटा नहीं पाई और येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने से पहले ही इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा. संख्या बल नहीं होने के बावजूद कर्नाटक में सरकार बनाने की आतुरता से भाजपा की छवि न सिर्फ आम लोगों में खराब हुई बल्कि संघ के अंदर भी पार्टी के प्रति नाराजगी बढ़ी.

अरविंद केजरीवाल से तकरार

2015 में अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 सीटों पर जीत हासिल करके मुख्यमंत्री बने. लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से लगातार दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच टकराव चल रहा है. उपराज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि हैं इसलिए दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी बार-बार कहती है कि यह टकराव दिल्ली की चुनी हुई सरकार और केंद्र सरकार के बीच है.

दिल्ली में कई मौके ऐसे आए जब यह लगा कि केंद्र सरकार दिल्ली की चुनी हुई सरकार के साथ अपेक्षित सहयोग नहीं कर रही है. हाल ही में जिस तरह से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल उपराज्यपाल के यहां भूख हड़ताल पर बैठे रहे और यह मांग करते रहे कि आईएएस अधिकारियों को काम पर वापस लौटने का निर्देश केंद्र सरकार दे, उससे भी आम लोगों में यह संदेश गया कि मोदी सरकार केजरीवाल सरकार के साथ सहयोग नहीं कर रही.

लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से गलत व्यवहार किया है तो उसके लिए इन पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन दिल्ली की जनता के द्वारा चुने गए मुख्यमंत्री के तौर पर जो अधिकार केजरीवाल के पास होने चाहिए, वे उन्हें मिलने चाहिए. दिल्ली के बहुत सारे लोगों को यह लग रहा है कि अरविंद केजरीवाल सरकार दिल्ली में काफी कुछ करना चाहती है लेकिन, मोदी सरकार उसे ऐसा नहीं करने दे रही है. भाजपा को लगता है कि अगर केजरीवाल सरकार नाकाम होगी तो वह दिल्ली में मजबूत होगी लेकिन आम आदमी पार्टी भी दिल्ली के लोगों में सक्रियता से यह संदेश पहुंचा रही है कि मोदी सरकार ने केजरीवाल सरकार का काम करना मुश्किल कर दिया है. केंद्र सरकार द्वारा इस मामले में जरूरी हस्तक्षेप नहीं किए जाने का निर्णय दिल्ली में भाजपा के लिए चुनावी तौर पर नुकसानदेह साबित हो सकता है.

पेट्रोल डीजल की कीमतों पर नकार की मुद्रा

कच्चे तेल की कीमतों में वैश्विक बाजारों में लगातार तेजी दिख रही है. इससे भारत के बाजार में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं. ऐसे में विपक्षी पार्टियां सरकार से लगातार यह मांग कर रही हैं कि पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले टैक्स को वह कम करे ताकि आम लोगों का बोझ कम हो. केंद्र सरकार इस मामले में गेंद राज्य सरकारों के पाले में डाल दे रही है. लेकिन जब कुल करों में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी का सवाल उठा तो मोदी सरकार के मंत्री और भाजपा नेताओं के सुर बदल गए.

अब केंद्र सरकार के मंत्री और भाजपा नेता यह कह रहे हैं कि अगर पेट्रोल-डीजल पर केंद्र सरकार ने कर कम किया तो इससे विकास की प्रक्रिया बाधित होगी कि और गरीबों के कल्याण के लिए चल रही कई योजनाओं पर नकरात्मक प्रभाव पड़ेगा. लेकिन यह बात हर सामान्य व्यक्ति समझता है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर उसकी जेब पर पड़ता है. जो लोग सीधे पेट्रोल-डीजल नहीं खरीदते उन्हें भी इनकी कीमतें बढ़ने से बढ़ने वाली महंगाई की मार झेलनी पड़ती है. पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं तो माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है और ऐसे में फल-सब्जी से लेकर हर क्षेत्र में महंगाई बढ़ जाती है.

पेट्रोल-डीजल पर कर कम नहीं करने की वजह से विपक्ष को आम लोगों के बीच यह संदेश पहुंचाने में सहूलियत हो रही है कि मोदी सरकार आम लोगों की चिंता नहीं करती. वहीं अगर मोदी सरकार ने करों में कमी की होती तो राज्य सरकारों पर भी कम करने का दबाव बढ़ता और ऐसे में इसका राजनीतिक फायदा भाजपा को मिलता. क्योंकि तब भाजपा यह कहती कि राज्यों में भाजपा के अलावा जिन दूसरी पार्टियों की सरकारें हैं, वे आम लोगों का भला नहीं चाहतीं. सौजन्य: सत्याग्रह 

 

Categories: Opinion