जस्टिस गोगोई ने एक बार फिर ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ पर उठाया सवाल, कहा- सुधार नहीं ‘क्रांति’ की जरूरत

जस्टिस गोगोई ने एक बार फिर ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ पर उठाया सवाल, कहा- सुधार नहीं ‘क्रांति’ की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक बार फिर से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाया है। दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार पर न्यायपालिका में हस्तक्षेप करने के आरोप लगे हैं।

न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने गुरुवार को रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान में कहा कि न्यायपालिका को आम आदमी की सेवा के योग्य बनाए रखने के लिए ‘सुधार नहीं एक क्रांति’ की जरूरत है।

न्यायमूर्ति गोगोई ने साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायपालिका को और ‘अधिक सक्रिय’ रहना होगा।

न्यायपालिका की आज़ादी और उस पर विशवास की बात करते हुए न्यायधीश ने कहा कि न्यायपालिका ‘उम्मीद की आखिरी किरण’ है और वह ‘महान संवैधानिक दृष्टि का गर्व करने वाला संरक्षक’ है।

इस पर समाज का काफी विश्वास है। उन्होंने समाचार पत्र ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में ‘हाउ डेमोक्रेसी डाइज’ शीर्षक से प्रकाशित एक लेख का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘स्वतंत्र न्यायाधीश और मुखर पत्रकार लोकतंत्र की रक्षा करने वाली अग्रिम पंक्ति हैं।’

‘दो भारत’ के बीच विभाजन और असमानता की स्थिति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि अब न्यायपालिका के उस ‘संवैधानिक क्षण’ की दरकार है, जो अभी तक लंबित है। उन्होंने कहा कि ‘दो भारत’ की मौजूदगी के कारण देश में जो असमानता आई, वह सामने दिख रही है।

व्याख्यान में न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि एक भारत ऐसा है जो इसे एक नई व्यवस्था के रूप में मानता है। और एक दूसरा भारत (इंडिया) ऐसा है जो बेतुके ढंग से खींची गई गरीबी की रेखा के नीचे जिंदगी बसर करता है।

Courtesy: Boltaup

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