हवा हुए मोदी सरकार के दावे, भारत में 22 फीसदी से ज़्यादा आबादी बेहद ग़रीब जो सौ रुपये रोज़ से कम पर गुज़ारा करती है।

हवा हुए मोदी सरकार के दावे, भारत में 22 फीसदी से ज़्यादा आबादी बेहद ग़रीब जो सौ रुपये रोज़ से कम पर गुज़ारा करती है।

ज़ैग़म मुर्तज़ा

विश्व बैंक बता रहा है कि हम फ्रांस को पछाड़ कर पांचवी या छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। आर्थिक मोर्चे पर परेशानियों से घिरी सरकार को इस ख़बर में उम्मीद की किरण नज़र आई। हर तरफ सफलता के ढोल पीट दिए गए। भाट और चारणों ने भी विजय घोष कर दिया। मगर आम आदमी की समझ में नहीं आ रहा कि ये इतनी बड़ी बात है तो वो परेशानी में क्यों है?

आगे बढ़ने से पहले विश्व बैंक के हित तलाश लें। विश्व बैंक 2013-14 में भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बता चुका है। विश्व बैंक ये गणना करते समय बाज़ार के हालात और आर्थिक गतिविधियों के अलावा जिन कारकों को गिनता है उनमें आइएमएफ से लोन लेने और उस लोन को चुकाने की क्षमता भी मापता है।

हालांकि उसका तमाम ज़ोर ज़्यादा से ज़्यादा लोन देने पर रहता है क्योंकि उसका धंधा यही है। ये भी ग़ौरतलब है कि स्पेन और ग्रीस के आर्थिक दिवालिया होने पहले विश्व बैंक उनको तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताता रहा। हालांकि भारत अगर विकसित अर्थव्यवस्था नहीं भी है तब भी लोगों का आर्थिक योगदान, श्रम और लोगों की बचत इसके आकार को बड़ा बनाते हैं। तमाम घाटे के बावजूद किसान और बदहाली के बावजूद श्रमिक इसे ठोस आधार देते हैं।

देश तरक़्क़ी करे ये सभी की कामना है लेकिन जिस तरक़्क़ी का ढोल पीटा जा रहा है उसमे आम लोग नहीं हैं। आंकड़े, अनुपात और औसत हमेशा सच नहीं होते। मान लीजिए एक श्रमिक ने दिनभर में सौ रुपये कमाए और एक सेठ जी ने लाख रुपये कमाए। तो प्रति व्यक्ति औसत आमदनी निकली पचास हज़ार पचास रुपये। इसी तरह देश की जिस कथित प्रगति का ढोल पीटा जा रहा है उसमें सामान्य जन कहां हैं? हमने जिस फ्रांस को कथित तौर पर पछाड़ा है वहां प्रति व्यक्ति औसत आय 42,380 डॉलर है। भारत में ये 6,490 डॉलर है जबकि हिंसा से बेहाल इराक़ में प्रति व्यक्ति आय 17,240 डॉलर है।

चूंकि फ्रांस की जनसंख्या महज़ साढ़े छह करोड़ है तो आय में असमानता भी कम ही होगी। जो विश्व बैंक हमारी प्रगति के दावे कर रहा है वही बता रहा है कि हमारी 22 फीसदी से ज़्यादा आबादी बेहद ग़रीबी में है और सौ रुपये रोज़ से कम पर गुज़ारा कर रही है। ये संख्या क़रीब तीस करोड़ है और फ्रांस की कुल आबादी से चार गुना ज़्यादा है। फ्रांस में बीपीएल लोगों की तादाद कुल आबादी का 6 फीसदी से कम है। सब कुछ उल्टा नहीं है। देश के कुछ औद्योगिक घरानों की आय में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। हो सकता है इस आमदनी को विकास का सूचकांक मान लिया गया हो। आख़िर वो प्रगति भी इसी देश के नागरिक की है।

क्या है रास्ता

समस्या असमान प्रगति की है। अगर दो या तीन लोग एक अरब रुपये प्रतिदिन कमाएं और एक अरब लोग सौ रुपये से नीचे आ जाएं तो आंकड़ों में तो विकास होगा लेकिन सम्मिलित और सतत विकास नहीं होगा। इनमें अगर दो तीन अरबपति देश छोड़ने का फैसला कर लें तो विश्व बैंक हमें ग्रीस ये स्पेन की जमात में रखने में देर नहीं लगाएगा। इसलिए हमें विश्व बैंक के आंकड़ों पर नहीं अपने आस पड़ोस पर निगाह दौड़ानी होगी। देखना होगा मनरेगा और असंगठित क्षेत्र के कामगार किन हालात में हैं? हमें देखना होगा कि हमारे किसानो की आमदनी कितनी है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि सौ रुपये से कम पर गुज़ारा करने वाले ग़रीब पांच सौ रुपये वालों की जमात में आएं।

कार, स्कूटर की बिक्री बढ़ना विकास का पैमाना नहीं हो सकता। लोग ज़मीन बेच कर और दहेज़ में देने के लिए भी वाहन ख़रीदते हैं और बदहाल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर निर्भरता कम करने के लिए भी। बैंक जमा इसलिए पैमाना नहीं हो सकती क्यों कि में पैसा लोगों की स्वेच्छा से नहीं है सरकार की ज़बरदस्ती से है। अर्थव्यवस्था की मज़बूती का पैमाना रोज़गार सूचकांक और समानता दर होना चाहिए। लेकिन ये दो ऐसे मुद्दे हैं जिनपर कभी भी कोई सरकार बात नहीं करेगी।

Courtesy: nationalspeak.

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