कीमतों में वृद्धि और आम आदमी की परेशानी…

कीमतों में वृद्धि और आम आदमी की परेशानी…
कीमतों में वृद्धि और आम आदमी की परेशानी…

– आमना मिर्जा

वक्त अब निकल रहा है और फिर भी ‘अच्छे दिन’ के अधिकांश वादे अभी तक पूरा नहीं हुए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में सरकार के विमौद्रिकरण के प्रयास के आंकड़ों को जारी किया है। रिपोर्ट में पता चला है  कि 98.9 6 प्रतिशत- या 15.44 लाख करोड़ रुपये में से 15.28 लाख करोड़ रुपये-अमान्य मुद्रा नोट जून 2017 के अंत तक बैंकिंग प्रणाली में वापस आ गए थे। भारत की अर्थव्यवस्था, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी,  विमौद्रिकरण के बाद काफी धीमी हो गई है। 2019 के लोकसभा चुनावों में, भारत के लोगों को खुद से पूछना चाहिए कि क्या वे चार साल पहले की तुलना में बेहतर हैं।

रूपये में साफ तौर पर तेज गिरावट के साथ -साथ कच्चे तेल की दरों में वृद्धि की  वजह से  शहरी और ग्रामीण भारत में भारी असर पड़ा है। यह नये डर और मुद्रास्फीति में वृद्धि की ओर ले गया है। हालांकि स्थानीय लेवी के कारण ईंधन की कीमतें में राज्य दर राज्य फर्क पड़ता है, लेकिन एक बात तय है कि कीमतों और मुद्रास्फीति में वृद्धि से निकलने का कोई रास्ता नहीं है।

राजनीति, अपने आदर्श अर्थ में, चुनावी वादों को पूरा करने और लोगों की चिंताओं का समाधान  निकलने का एक प्रयास  है।
यह लाखों भारतीयों को बताया गया था कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों को कम करने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, अब  जब लोग इससे तंग हैं, तब पेट्रो-उत्पादों की  कीमतों में की गई रिकॉर्ड-ब्रेकिंग वृद्धि को न्यायसंगत बनाने के लिए तर्क दिए गए हैं। अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन के साथ, पेट्रोल, डीजल और गैस सिलेण्डरों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।

बढ़ती डीजल और पेट्रोल की कीमतों का सीधा असर सामान दूरी की यात्रा के लिए ईंधन पर  हर महीने जो आप खर्च करते उस पर पड़ता है। लंबे समय तक उच्च ईंधन की कीमतें परिवारों को संसाधनों को फिर से व्यवस्थित करने के लिए मजबूर कर सकती है। चूंकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, अपने आप  हम बाहरी खाते पर दबाव देखते हैं और  आयात की लागत बढ़ती हैं, घाटा बढ़ता है और रुपया पर दबाव बढ़ता है।

साथ ही, मूल्य निर्धारण व्यवस्था बाजार-निर्धारित दरों से जुड़े होने के बावजूद, केन्द्र और राज्यों द्वारा उत्पाद शुल्क और बिक्री कर या वैट के रूप में करों में तेज वृद्धि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, जिससे सुधार का रास्ता गर्त की ओर जा रहा है। केंद्रीय उत्पाद शुल्क के अलावा, राज्य वैट ईंधन मूल्य निर्धारण में जोड़ा जाता है। चूंकि प्रत्येक राज्य की अपनी कर संरचना होती है, कीमतें एक से दूसरी जगह  में भिन्न होती हैं।

मौजूदा हालातों  में, जीएसटी में पेट्रोलियम उत्पादों को शामिल करना एक जरूरत है। आगे सरकार को यह भरोसा दिलाना होगा कि राज्यों को संबंधित प्रावधानों के कारण उनके नुकसान के लिए मुआवजे के बारे में चिंता करने की कोई जरूरत  नहीं है। इसके अलावा यह तर्क दिया गया कि जीएसटी के तहत ईंधन लाने से इसकी कीमतों में एकरूपता कायम होगी। हालांकि आलोचकों ने ध्यान दिलाया  है कि यह तय नहीं है कि कीमतें घट जाएंगी क्योंकि यह जीएसटी की दर पर निर्भर करता है।

देश में एक गंभीर हालात  मौजूद है जहां पिछले कुछ दिनों में वैश्विक तेल की कीमतों में वृद्धि के चलते और रुपए का तेज मूल्य ह्रास के कारण  पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत में कोई कमी होने से पहले उपभोक्ताओं को एक और महीने का इंतजार करना पड़ सकता है।

जीएसटी उत्पादन वितरण शृंखला के प्रत्येक चरण में जोड़े गए मूल्य पर लगाया गया कर है और इसे सामान्य रूप से पूरी दुनियाभर में वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) के रूप में जाना जाता है। जीएसटी को कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा राजस्व की कमी का सामना करने वाली सभी अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक रामबाण नुस्खे के तौर पर भी निर्धारित किया गया है।

जीएसटी कर का प्रबंधन एक मुश्किल काम है सुचारू रूप से कार्यान्वित किए जाने से पहले पर्याप्त मात्रा में तैयारी जरूरी है। यद्यपि भारत ने जीएसटी की विविधताएं लागू की हैं, लेकिन कुशलता से नहीं और जिन जटिलताओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है या अभी भी सामना कर रहे हैं, उसे अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से कोई प्रचार नहीं प्राप्त हुआ है जो इस जीएसटी को नकद से भरे सरकारों को बेचने की कोशिश करती हंै।

इसके अलावा, व्यवसाय जीएसटी के बोझ को सहन नहीं करता क्योंकि यह कर को बोझ उपभोक्ताओं के सर पर डाल सकता है। जो  दिख रहा है वह यह है कि सरकार ने तर्क दिया था जीएसटी के लाभों में से एक लाभ यह होगा कि कीमतें नीचे आ जाएंगी, लेकिन अंजाम उलटा हुआ है। एक रेस्तरां में भोजन पर अठारह प्रतिशत जीएसटी लगाया जाता है। इसने खाने की लागत बढ़ा दी है। यह छोटी सी मिसाल दिखलाती है कि कैसे हमारी वित्तीय रूप से गैर-जिम्मेदार सरकार के हाथों में जीएसटी का कार्यान्वयन एक प्रमुख जिम्मेदारी बन गया है।

वैश्विक घटनाओं का भी घरेलू राजनीति पर असर पड़ता है। वैश्विक तेल बाजार की स्थिति नवंबर से बदतर हो सकती है जब अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ईरान के पर्याप्त उत्पादन बाजार से गायब हो सकते हैं। यह देखना है कि भारत वर्तमान व्यापार युद्ध संकट में चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के दो महाशक्तियों को कैसे संतुलित करता है।

भारत अपनी 85 प्रतिशत तेल आवश्यकताओं को आयात करता है और किसी भी तरह से इस प्रवाह में क्षणिक तब्दीली  का मतलब है उच्च आयात बिल और उच्च घरेलू कीमतें। अगर सरकार आम आदमी को कीमतों में बढ़ोतरी से बचाने के बारे में गंभीर है तो ड्यूटी कट अब तात्कालिक जरूरत बन गया है। केंद्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे  राज्य जहां सरकार सत्ताधारी पार्टी द्वारा चलाई जा रही है, पहले मूल्य वर्धित कर (वैट) दरों को कम करने की जिम्मेदारी ले। दूसरे इसका निश्चित रूप से पालन करेंगे।

महत्वपूर्ण मुद्दा डीजल की कीमतों की वृद्धि रोकना है जो मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ावा दे सकता है और अर्थव्यवस्था के विकास की संभावनाओं पर दबाव डाल सकता है। वक्त अब निकल रहा है और फिर भी ‘अच्छे दिन’ के अधिकांश वादे अभी तक पूरा नहीं हुए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में सरकार के विमौद्रिकरण के प्रयास के आंकड़ों को जारी किया है। रिपोर्ट में पता चला है  कि 98.9 6 प्रतिशत- या 15.44 लाख करोड़ रुपये में से 15.28 लाख करोड़ रुपये-अमान्य मुद्रा नोट जून 2017 के अंत तक बैंकिंग प्रणाली में वापस आ गए थे। भारत की अर्थव्यवस्था, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी,  विमौद्रिकरण के बाद काफी धीमी हो गई है। 2019 के लोकसभा चुनावों में, भारत के लोगों को खुद से पूछना चाहिए कि क्या वे चार साल पहले की तुलना में बेहतर हैं।
अच्छे  दिन  क्या है? लोग न्यूनतम पैसे के साथ अपनी जरूरतों को पूरा करने और उनके साथ अतिरिक्त पैसे रखने में सक्षम होते हैं। उनके जीवन स्थिर होना चाहिए और उनका जीवन स्तर बढ़ना चाहिए।  पिछले चार वर्षों में सरकार ने, इनमें से, हमें  क्या दिया है?

 

(ये लेखक की निजी विचार हैं)

Courtesy: Deshbandhu

Categories: Finance, Opinion
Tags: noteban, Opinion, RBI